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कच्ची रोटियां और पानी में दाल की तलाश
ब्यूरो/अमर उजाला वाराणसी
Updated Sun, 03 Apr 2016 01:57 AM IST
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कच्ची रोटियां दिखाते बंदी।
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जिला जेल में यूं ही बवाल नहीं हुआ। इसकी गहराई में भ्रष्टाचार की एक के बाद एक कई परतें दबी हैं। एक बंदी के पूरे दिन की खुराक पर महज 30 रुपये खर्च का प्रावधान भी महंगाई के इस दौर में किसी नजरिये से पर्याप्त नहीं कहा जा सकता। भला 30 रुपये में किसी के लिए पूरे दिन भरपेट खुराक का प्रबंध कैसे हो सकता है। वो भी तब जब सुबह के नाश्ते से लेकर दो बार के खाने का बंदोबस्त इसी में करना हो। लेकिन शासन के निर्धारित प्रावधानों के तहत एक बंदी की खुराक पर रोजाना का खर्च 25 से 30 रुपये ही है। बंदियों का आरोप है कि जेल प्रशासन इसमें से भी आधी रकम बचा लेता है। भोजन ऐसा मिलता है कि पानी के बीच दाल खोजनी पड़ती है और कच्ची रोटियाें से पेट भरना पड़ता है। भ्रष्टाचार का आलम यह है कि बंदियों को कैं टीन से महंगा खाना खरीदने के लिए विवश किया जाता है। शनिवार को हंगामे के दौरान बंदियों ने जेल में बनने वाली कच्ची रोटियां भी दिखाईं।
जेल के नियमों के मुताबिक सुबह करीब छह बजे बंदियों को नाश्ते में चना दिया जाता है। इसके बाद दिन में करीब ग्यारह बजे और शाम को करीब पांच बजे खाना दिया जाता है। दो बार के खाने में एक बार अरहर की दाल देना जरूरी है। सब्जी दोनों बार देने का नियम है। एक बार के खाने में चार से पांच रोटियां दी जाती हैं। पूरे दिन में एक बंदी को 115 ग्राम सब्जी, दाल 45 ग्राम, आटा 270 ग्राम देना होता है। पूरे खाने पर करीब 30 रुपये खर्च आता है। अगर चावल देंगे तो रोटी कम कर देते हैं। मेस में सामूहिक रूप से बंदियों का खाना बनता है। जेल प्रशासन इस खाने में कटौती कर देता है। वहीं जेल में ही कैंटीन भी चलती हैं। नियमत: कैंटीन का सामान दस प्रतिशत के लाभ पर दिया जाता है। लाभ बंदी कल्याण निधि में जाता है लेकिन यहां मनमाने दाम पर सामान बेचे जाते हैं।
बंदियों ने बवाल के दौरान बताया कि कैंटीन का खाना इतना महंगा है कि बड़े-बड़े होटल फेल हो जाएं। बताया कि 300 रुपये में एक मग खिचड़ी मिलती है तो एक उबला अंडा 25 रुपये का। इसी तरह से एक रसगुल्ला 30 रुपये का मिलता है। चार पीस पूड़ी और एक चम्मच सब्जी 50 रुपये में मिलती है। सामानों की गुणवत्ता भी अच्छी नहीं होती लेकिन कैंटीन से खरीदने के अलावा कोई और विकल्प ही नहीं। सामानों की गुणवत्ता भी अच्छी नहीं होती लेकिन कैंटीन से खरीदने के अलावा कोई और विकल्प नहीं।
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बंदियों को जैसी सहूलियत चाहिए होती है उसके लिए वैसी रकम चुकानी पड़ती है। हालांकि अदालत में पेशी पर ले जाने से पहले जिस प्रोफाइल का बंदी होता है उससे उस हिसाब से पैसे वसूले जाते हैं। किसी से दो हजार तो किसी से दस हजार रुपये तक लिए जाते हैं। बंदियों से पैसे उन्हें विशेष सुविधा देने की खातिर लिए जाते हैं लेकिन सुविधा न चाहने वाले बंदियों का भी बिना कुछ दिए गुजारा नहीं होता। पैसे देने के बाद बंदी पेशी के दौरान अपने घरवालों और दोस्तों से मिलते हैं।
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जेल के नियमों के मुताबिक सुबह करीब छह बजे बंदियों को नाश्ते में चना दिया जाता है। इसके बाद दिन में करीब ग्यारह बजे और शाम को करीब पांच बजे खाना दिया जाता है। दो बार के खाने में एक बार अरहर की दाल देना जरूरी है। सब्जी दोनों बार देने का नियम है। एक बार के खाने में चार से पांच रोटियां दी जाती हैं। पूरे दिन में एक बंदी को 115 ग्राम सब्जी, दाल 45 ग्राम, आटा 270 ग्राम देना होता है। पूरे खाने पर करीब 30 रुपये खर्च आता है। अगर चावल देंगे तो रोटी कम कर देते हैं। मेस में सामूहिक रूप से बंदियों का खाना बनता है। जेल प्रशासन इस खाने में कटौती कर देता है। वहीं जेल में ही कैंटीन भी चलती हैं। नियमत: कैंटीन का सामान दस प्रतिशत के लाभ पर दिया जाता है। लाभ बंदी कल्याण निधि में जाता है लेकिन यहां मनमाने दाम पर सामान बेचे जाते हैं।
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बंदियों ने बवाल के दौरान बताया कि कैंटीन का खाना इतना महंगा है कि बड़े-बड़े होटल फेल हो जाएं। बताया कि 300 रुपये में एक मग खिचड़ी मिलती है तो एक उबला अंडा 25 रुपये का। इसी तरह से एक रसगुल्ला 30 रुपये का मिलता है। चार पीस पूड़ी और एक चम्मच सब्जी 50 रुपये में मिलती है। सामानों की गुणवत्ता भी अच्छी नहीं होती लेकिन कैंटीन से खरीदने के अलावा कोई और विकल्प ही नहीं। सामानों की गुणवत्ता भी अच्छी नहीं होती लेकिन कैंटीन से खरीदने के अलावा कोई और विकल्प नहीं।
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बंदियों को जैसी सहूलियत चाहिए होती है उसके लिए वैसी रकम चुकानी पड़ती है। हालांकि अदालत में पेशी पर ले जाने से पहले जिस प्रोफाइल का बंदी होता है उससे उस हिसाब से पैसे वसूले जाते हैं। किसी से दो हजार तो किसी से दस हजार रुपये तक लिए जाते हैं। बंदियों से पैसे उन्हें विशेष सुविधा देने की खातिर लिए जाते हैं लेकिन सुविधा न चाहने वाले बंदियों का भी बिना कुछ दिए गुजारा नहीं होता। पैसे देने के बाद बंदी पेशी के दौरान अपने घरवालों और दोस्तों से मिलते हैं।