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भक्ति: पाप से मुक्ति देता है दशाश्वमेध तीर्थ में स्नान और दशाश्वमेधेश्वर का दर्शन, गर्भदशा से मिलती है मुक्ति

Fri, 07 Jun 2024 03:48 PM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Fri, 07 Jun 2024 03:48 PM IST
सार

Varanasi News: दस अश्वमेध यज्ञों के अंत में अवभृथ स्नान करने से जो फल प्राप्त होता है, दशहरा के दिन इस दशाश्वमेध में एक बार भी स्नान करने से निश्चय ही वह फल मिल जाता है। यहां दशहरा का तात्पर्य है मनुष्य की दस इंद्रियों द्वारा किए गए पाप का जहां नाश हो जाता है।

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liberation After bathing in Dashashwamedha Tirtha in varanasi Dashashwamedheshwar gets liberation from pregnan
वाराणसी गंगा घाट। - फोटो : रोहित सोनकर

विस्तार

तीर्थ शिरोमणि दशाश्वमेध तीर्थ पर स्नान के बाद दशाश्वमेधेश्वर के दर्शन से जीवन के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। दशाश्वमेध तीर्थ पर ब्रह्मदेव ने भगवान शिव के दशाश्वमेधेश्वर स्वरूप को स्थापित किया था। गंगा स्नान की अपनी अलग महिमा है। वहीं, दशाश्वमेध तीर्थ पर स्नान से इसका महत्व बढ़ जाता है। ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा शुक्रवार से दशाश्वमेध तीर्थ का स्नान आरंभ होगा।

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ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा से पूर्णिमा तक दशाश्वमेध तीर्थ स्नान शुरू हो जाएगा। दशाश्वमेध तीर्थ पर मां पार्वती माता शीतला के स्वरूप में और भगवान विश्वेश्वर दशहरेश्वर के रूप में भक्तों का कल्याण करते हैं। मान्यता है कि गंगा के पश्चिम तट पर विराजमान दशहरेश्वर को प्रणाम करने से व्यक्ति कभी दुर्दशा में नहीं पड़ सकता है। दशाश्वमेधेश्वर महादेव का विग्रह दशाश्वमेध घाट पर बड़ी शीतला माता मंदिर के प्रांगण में है।
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काशी महात्म्य के अनुसार ब्रह्मा जी ने दशाश्वमेध तीर्थ स्थान पर दिवोदस का अश्वमेघ यज्ञ किया था और मां गंगा के आने से पूर्व यह क्षेत्र रुद्रवास तीर्थ स्थान के नाम से विख्यात था। शीतला घाट नाम तो मनुष्यों ने रखा है। वास्तव में यही असली दशाश्वमेध तीर्थ या रुद्रवास तीर्थ है। ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी की प्रत्येक तिथियों में क्रम से स्नान करने वाला व्यक्ति हर जन्म के पापों से मुक्त हो जाता है।
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स्कंद पुराण के अनुसार ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे प्राप्य प्रतिपदं तिथिम्। दशाश्वमेधिके स्नात्वा मुच्यते जन्मपातकैः॥ ज्येष्ठे शुक्लद्वितीयायां स्नात्वा रुद्रसरोवरे। जन्मद्वयकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति॥ अर्थात ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को इस दशाश्वमेधतीर्थ में स्नान करने से जन्म भर के संचित पाप दूर हो जाते हैं और उसी जेठ सुदी द्वितीया को इस रुद्रसरोवर तीर्थ में स्नान करने से दो जन्म के संचित पापों से तुरंत छुट्टी मिल जाती है।


मिलती है गर्भदशा से मुक्ति
दशाश्वमेध तीर्थ (घाट) पर स्नान, दान, जप, होम वेदाध्ययन, देवपूजन, संध्योपासन, तर्पण और श्राद्ध आदि पितृकर्म या जो कुछ सत्कर्म किए जाते हैं, वे सब अक्षय कहे गए हैं। इस तीर्थ पर ब्रह्मा जी द्वारा स्थापित भगवान शिव के दशाश्वमेधेश्वर स्वरूप के दर्शन पूजन से मनुष्य समस्त पापों से छूट जाते हैं। जो कोई दशहरा को दशाश्वमेध पर नहाकर दशाश्वमेधेश्वर शिवलिंग का भक्ति से पूजन करता है, उसे गर्भदशा का दुख नहीं झेलना पड़ता। 

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