लाल बहादुर शास्त्री जयंती: सादगी पसंद काशी के लाल ने विश्व पटल पर छोड़ी व्यक्तित्व की छाप, संघर्षों से भरा रहा जीवन
काशी के लाल और देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने अपने कार्यकाल में देश को कई संकटों से उबारा। वह अपनी साफ-सुथरी क्षवि के लिए जाने जाते थे। 2 अक्टूबर को शास्त्री जी की 118वीं जयंती है।
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काशी के लाल और देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री आज भी सादगी की मिसाल हैं। जय जवान जय किसान का नारा देने वाले शास्त्री जी ने प्रधानमंत्री के पद पर मात्र 18 माह के कार्यकाल में ही नैतिक राजनीति को स्थापित किया। संघर्षों से भरा उनका जीवन और उनकी रहस्यमय मृत्यु का राज आज तक भारतवासियों को झकझोरता है। रामनगर में स्थित शास्त्री जी का आवास काशी के लाल की सादगी और सार्वजनिक जीवन की कहानी कहता है।
क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ सुभाष यादव ने बताया कि रामनगर स्थित पूर्व प्रधानमंत्री के आवास पर आने जाने वालों को लाल बहादुर शास्त्री का अक्स आंखों के सामने जरूर नजर आता है। रामनगर स्थित शास्त्री स्मृति भवन संग्रहालय के म्यूजियम में सबसे पहले प्रवेश करते ही उनसे जुड़ी तमाम यादों की फोटो गैलरी सजी हुई हैं।
साहसिक निर्णय बने मिसाल
शास्त्री जी ने रामनगर से अपने जीवन की शुरुआत की। तमाम कठिनाईयों से जूझते हुए देश के प्रधानमंत्री तक का सफर तय किया। राजनीति में उनके द्वारा लिए गए साहसिक निर्णय आज भी लोगों के लिए मिसाल है। चाहे रेल दुर्घटना के बाद रेल मंत्री पद से इस्तीफा हो या 1965 के भारत पाकिस्तान युद्ध में उनका नेतृत्व या फिर उनका दिया जय जवान जय किसान का नारा। ताशकंद में 10 जनवरी 1966 को भारत और पाकिस्तान के बीच समझौते पर दस्तखत किए और उसके अगले ही दिन यानी 11 जनवरी 1966 को उनका निधन हो गया।
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रेलवे कॉलोनी में हुआ था जन्म
अागे की पढ़ाई के लिए उन्हें वाराणसी में चाचा के साथ रहने के लिए भेज दिया गया। उनके बाद की शिक्षा हरिश्चन्द्र हाई स्कूल और काशी विद्यापीठ में हुई। देश के सर्वाधिक सम्मानित नेताओं में देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का नाम भी बहुत आदर से लिया जाता है। वह 9 जून 1964 से 11 जनवरी 1966 को अपनी मृत्यु तक भारत के प्रधानमंत्री रहे।
अपने लाल के निधन से स्तब्ध रह गया राष्ट्र
शास्त्री जी उत्तर प्रदेश सरकार में पुलिस एवं यातायात मंत्री रहे। 1951 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव पद पर शास्त्री जी की नियुक्ति हुई। प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद राष्ट्र को नेतृत्व प्रदान करने का भार लाल बहादुर शास्त्री के कंधों पर आ गया। 2 जून 1964 को उन्हें कांग्रेस संसदीय दल का नेता चुना गया। 9 जून 1964 को प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।
11 जनवरी 1966 को भारत मां का ये महान सपूत ताशकंद में अपनों से बिछड़ गया। अपने प्रिय नेता के निधन का समाचार सुनकर समूचा राष्ट्र स्तब्ध रह गया। भारत सरकार ने उन्हें देश का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न मरणोपरांत दिया।
जब देश ने रखा एक दिन का उपवास
1964 में जब वह प्रधानमंत्री बने थे तब देश खाने की चीजें आयात करता था। उस वक्त देश उत्तरी अमेरिका पर अनाज के लिए निर्भर था। 1965 में पाकिस्तान से जंग के दौरान देश में भयंकर सूखा पड़ा। उन्होंने अपने प्रथम संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि उनकी पहली प्राथमिकता खाद्यान्न मूल्यों को बढ़ने से रोकना है। तब के हालात देखते हुए उन्होंने देशवासियों से एक दिन का उपवास रखने की अपील की। इन्हीं हालात से उन्होंने हमें जय जवान जय किसान का नारा दिया।