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ख्वाजा को भाती हैं काशी की चादरें
वाराण्ासी, ब्यूरो
Updated Wed, 22 Apr 2015 02:28 AM IST
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वाराणसी। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में पर चढ़ाने के लिए काशी से हर साल सैकड़ों चादरें अजमेर शरीफ जाती हैं। बनारसी बुनकरों की बेहतरीन कारीगरी के कारण देश भर के अकीदतमंद चाहते हैं कि उनकी चादरें यहीं बुनी जाएं। इस समय काशी के कारीगर इन चादरों को बड़ी ही अकीदत के साथ बुनने में लगे हैं।
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ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के उर्स पर देश भर के लोग मन्नतों की चादर लेकर जियारत के लिए अजमेर शरीफ जाते हैं। चांद दिखने के साथ ही ख्वाजा के उर्स की तैयारियां शुरू हो गई हैं।
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इसी समय से काशी में चादरें बनने का सिलसिला शुरू हो जाता है। चादरें भी ऐसी बनती हैं कि लोग देखते रह जाते हैं। इस साल तीन सौ से ज्यादा चादरों के आर्डर यहां के कारीगरों के मिले हैं। दालमंडी, लल्लापुरा, कोयला बाजार, बड़ी बाजार, शिवाला और बजरडीहा में अजमेर शरीफ के लिए खास तौर से अजीम चादरें बनाई जा रही हैं। कई कारीगरों का यह काम अंतिम दौर में है पहुंच गया है।
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दालमंडी के देवली गली में अनवर भाई के कारखाने में छह मीटर चौड़ी और सात मीटर लंबी मखमल की चादर को कारीगरों ने बेहद खूबसूरती से सजाया है। जरदोजी और आरी वर्क के साथ मोतियों व स्टोन से इस चादर पर मक्का मदीना और काबा शरीफ की डिजाइनें बनाई गई हैं। चादर पर कलमे के साथ ही ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह को मोतियों, सितारों के सहारे खूबसूरत तरीके से उकेरा गया है।
शिवाला के कारीगर आसिफ बताते हैं कि बनारस से हर साल बनारस से हर साल सैकड़ों चादरें अजमेर शरीफ जाती रही हैं। उर्स के दो महीने पहले से ही हमारे पास चादरों के आर्डर आने लगते हैं।
आरी और जरदोजी के कारीगर अनवर बताते हैं कि एक बड़ी चादर बनाने में डेढ़ से दो महीने का वक्त लगता है, जिसमें आठ-दस कारीगर लगाने पड़ते हैं। इस चादर की लागत करीब चालीस से पचास हजार रुपये आती है। मदनपुरा के सलीम अंसारी बताते हैं कि यह बनारस की कारीगरी ही है कि अजमेर शरीफ में काशी की चादरों को काफी अहमियत दी जाती है।