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काशी में संरक्षित होगी क्योटो की 400 साल पुरानी विरासत
ब्यूरो/अमर उजाला वाराणसी
Updated Thu, 17 Mar 2016 02:08 AM IST
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काशी के बुनकरांे को जापान की पारंपरिक रेशम बुनकरी की कला ‘निशिकी’ की जानकारी देते अमाने ताशुमुरा।
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क्योटो (जापान) की चार सौ साल पुरानी पारंपरिक रेशम बुनकरी ‘निशिकी’ की कला का काशी में संरक्षण होगा। जापान की विलुप्त हो रही इस हस्तकला के संरक्षण के लिए जापान ने भारत से मदद मांगी है। काशी-क्योटो करार के तहत बनारस के बुनकर जापान की इस बुनकरी कला को संरक्षण देंगे। जापान सरकार के सहयोग से वाराणसी में एक डिजाइनिंग सेंटर भी खुलेगा।
इंडियन स्किल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के संयोजन में बुधवार को कैंट स्थित एक होटल में ‘निशिकी’ पर सेमिनार हुआ। इसमें जापान से आए इस विधा के जानकार अमाने ताशुमुरा ने बनारस के बुनकरों को इसकी बारीकियों से अवगत कराया। ताशुमुरा ने बताया कि जापान में बुनकर नहीं मिल रहे और वहां मजदूरी बहुत महंगी है। यही कारण है कि वहां की वर्षों पुरानी हस्तकला विलुप्त होने की कगार पर है। इसमें नई जान फूंकने और काशी-क्योटो रिश्ते को प्रगाढ़ बनाने के उद्देश्य से यह प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जापान की तुलना में भारत में बुनकरों का मेहनताना काफी कम है। कार्यक्रम में मौजूद रहे जापानी दूतावास से जुड़े अधिकारियों ने कहा कि काशी के बुनकरों की रुचि को देखते हुए जल्द यहां डिजाइनिंग सेंटर खोला जाएगा। इस सेंटर में ‘निशिकी’ का प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। यहां तैयार होने वाले उत्पाद की ब्रांडिंग और मार्केटिंग का काम जापान करेगा।
सेमिनार में काशी के 80 से अधिक सिल्क बुनकरों ने जापान की इस पेशकश को हाथों हाथ लिया और निशिकी के संरक्षण में पूरा सहयोग देने की बात कही। अमाने ताशुमुरा ने बताया कि एक दौर में ‘निशिकी’ की बुनाई 70 तरीके से होती थी मगर मौजूदा दौर में 10 से 12 तरीकों के जानकार ही बचे हैं। जापानी दूतावास के द्वितीय सचिव सुमोतो निशिकी, इंडियन सिल्क एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के चेयरमैन टीवी मारुति, पूर्व अध्यक्ष विमल भवांडिया, उपाध्यक्ष सतीश गुप्ता, प्रशासनिक सदस्य डॉ. राकेश श्रीवास्तव, विश्वनाथ प्रसाद आदि लोग शामिल रहे।
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इंडियन स्किल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के संयोजन में बुधवार को कैंट स्थित एक होटल में ‘निशिकी’ पर सेमिनार हुआ। इसमें जापान से आए इस विधा के जानकार अमाने ताशुमुरा ने बनारस के बुनकरों को इसकी बारीकियों से अवगत कराया। ताशुमुरा ने बताया कि जापान में बुनकर नहीं मिल रहे और वहां मजदूरी बहुत महंगी है। यही कारण है कि वहां की वर्षों पुरानी हस्तकला विलुप्त होने की कगार पर है। इसमें नई जान फूंकने और काशी-क्योटो रिश्ते को प्रगाढ़ बनाने के उद्देश्य से यह प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जापान की तुलना में भारत में बुनकरों का मेहनताना काफी कम है। कार्यक्रम में मौजूद रहे जापानी दूतावास से जुड़े अधिकारियों ने कहा कि काशी के बुनकरों की रुचि को देखते हुए जल्द यहां डिजाइनिंग सेंटर खोला जाएगा। इस सेंटर में ‘निशिकी’ का प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। यहां तैयार होने वाले उत्पाद की ब्रांडिंग और मार्केटिंग का काम जापान करेगा।
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सेमिनार में काशी के 80 से अधिक सिल्क बुनकरों ने जापान की इस पेशकश को हाथों हाथ लिया और निशिकी के संरक्षण में पूरा सहयोग देने की बात कही। अमाने ताशुमुरा ने बताया कि एक दौर में ‘निशिकी’ की बुनाई 70 तरीके से होती थी मगर मौजूदा दौर में 10 से 12 तरीकों के जानकार ही बचे हैं। जापानी दूतावास के द्वितीय सचिव सुमोतो निशिकी, इंडियन सिल्क एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के चेयरमैन टीवी मारुति, पूर्व अध्यक्ष विमल भवांडिया, उपाध्यक्ष सतीश गुप्ता, प्रशासनिक सदस्य डॉ. राकेश श्रीवास्तव, विश्वनाथ प्रसाद आदि लोग शामिल रहे।
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