काशी विश्वनाथ धाम: 24 घंटे में एक से 13 लाख दर्शनार्थियों और ऋतुओं के आधार पर बदलीं मंदिर की व्यवस्थाएं
श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर के सीईओ डॉ. विश्वभूषण का तबादला होने पर मंदिर की एसओपी चर्चा में रही। वहीं सीईओ ने आध्यात्मिक पर्यटन: विरासत प्रबंधन के लिए श्री काशी विश्वनाथ मंदिर का मॉडल नाम की रिपोर्ट तैयार की।
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श्रीकाशी विश्वनाथ धाम के सीईओ डॉ. विश्वभूषण मिश्रा का रविवार को उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग में उपसचिव बनाया गया है। इस तबादले के बाद सोमवार को उनकी एसओपी यानी मानक संचालन प्रक्रिया की चर्चा रही। हाल ही में सीईओ ने धाम के प्रबंधन और सफाई पर एक रिपोर्ट भी तैयार की है। इसका नाम है- आध्यात्मिक पर्यटन: विरासत प्रबंधन के लिए श्री काशी विश्वनाथ मंदिर का मॉडल।
उन्होंने बताया है कि धाम के इंतजाम भक्तों के औसत से नहीं, हर रोज उनकी घटती-बढ़ती संख्या के आधार पर किए जा रहे हैं। धाम में औसतन दो से तीन लाख भक्त रोज आते हैं, लेकिन पिछले 4-5 साल के आंकड़ों में 24 घंटे में न्यूनतम एक लाख से अधिकतम 13 लाख श्रद्धालु मंदिर पहुंचे हैं। ऐसे में दर्शन-पूजन, अनुशासन, कतारों, यूटिलिटी और सांस्कृतिक कार्यक्रम को जरूरत के व्यवस्थाओं को कम से कम समय में बदला जाता रहा।
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ये व्यवस्था किसी अधिकारी, कर्मचारी या सेवा प्रदाता पर निर्भर नहीं थी जिससे किसी कर्मचारी के बदलने से सेवा का कोई मानक नहीं बदला। ये एसओपी संस्थागत प्रणाली पर आधारित थी। एसओपी में पूरे धाम परिसर को अलग-अलग परिचालन क्षेत्रों में बांटना, सफाई की टाइम लाइन, उत्तरदायित्व तय करना, स्वतंत्र निरीक्षण की व्यवस्था और डिजिटल माध्यम से कार्यों को पूरा करना भी प्रमुख रहा। सामान्य दिनों और पर्वों के लिए भी अलग-अलग कार्ययोजना भी होनी चाहिए।
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास की ओर से विकसित एसओपी में स्वच्छता के साथ ही ऋतु के आधार पर भी श्रद्धालुओं की सुविधाओं के लिए भी मानक तय किए गए हैं। वसंत ऋतु में जर्मन हैंगर, वर्षा में छाया की व्यवस्था, ग्रीष्म ऋतु में ग्लूकोज वितरण, शिशुओं को ओआरएस वितरण, पत्थरों पर चलने के लिए मुलायम जूट की मैट्स, इंडस्ट्रियल स्केल कूलर, मिस्ट फैन, शिशु दुग्धपान बूथ इत्यादि एसओपी के बड़े काम रहे।
वहीं उत्तर से दक्षिण तक के तीर्थ स्थलों के अनुष्ठानों को भी साझा किया गया। इसमें काशी रामेश्वरम तीर्थजल योजना, प्रयागराज से संगम का गंगाजल, रामेश्वरम और कोडी तीर्थम का सागर जल श्री विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग को नियमित भेजकर कर अभिषेक करना शामिल रहा। गंगा सप्तमी मनाने की शुरूआत मई 2024 से की गई। 100 से ज्यादा नवाचार वर्ष 2024 से 2026 के बीच किए गए।