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भक्ति हो या आधुनिक काल, हर दौर में हिंदी साहित्य का गढ़ रहा है बनारस

Fri, 14 Sep 2018 10:57 AM IST
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी Updated Fri, 14 Sep 2018 10:57 AM IST
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Kashi made up base of hindi literature in every period
बीएचयू प्रो. अवधेश प्रधान - फोटो : amar ujala
चाहे भक्ति काल हो या आधुनिक काल। हर दौर में हिंदी साहित्य का गढ़ काशी ही बना। कबीरदास, रैदास, तुलसी दास से लेकर आधुनिक युग के भारतेंदु हरिश्चंद्र, कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद्र, जयशंकर प्रसाद ने काशी के साहित्य को समृद्ध किया। यहां साहित्य किताबों के पन्नों में ही नहीं सिमटा, बल्कि मानव जीवन को अंदर तक प्रभावित किया है। काशी हिंदी साहित्य के निर्माण, विकास और नवजागरण का गढ़ बना। ये कहना है बीएचयू के प्रो. अवधेश प्रधान का।
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प्रो. अवधेश प्रधान कहते हैं कि कबीरदास मध्यकाल के साहित्यिक चेतना के शिखर है। उनसे थोड़ा पहले काशी में नामदेव हुए। इन लोगों के पीछे खड़े हैं रामानंद। दक्षिण से उत्तर की ओर साहित्य रामानंद लेकर आए और काशी को गढ़ बनाया। रामानंद मध्य युग के महागुरु थे। उन्हें आकाश धर्मा गुरु भी कहते हैं, जो घास को भी बढ़ने का अवसर देते हैं और वट वृक्ष भी।
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उनके शिष्यों में कबीर, रैदास और तुलसीदास तीनों ही थे। ये अपनी वाणी और तपस्या से सबके पूज्य हो गए। काशी के घाट पर महाकाव्य की रचना करने वाले तुलसीदास ने काशी में ज्ञान और भक्ति की धारा बहाई। विद्वानों से सामान्य जन की कुटिया तक उनकी वाणी का प्रसार हुआ।
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लोगों के बीच भगवान श्रीराम को बैठाया, ये उनके साहित्य का चमत्कार है। अकबर के काल में इसका इतना असर पड़ा कि अकबर ने राम टका सिक्का ढलवाया, जिसमें सिक्के पर राम सीता को अंकित किया गया। बाद के दौर में काशी नरेश के दरबार में समूचे महाभारत का काव्य अनुवाद हुआ। काशी में रामलीला की शुरुआत का और पूरे नगर को थिएटर बनाने का श्रेय भी तुलसीदास को जाता है।

ई-बुक्स के जरिये साहित्य का नया क्षितिज खुल रहा है

Kashi made up base of hindi literature in every period
अवधेश प्रधान - फोटो : amar ujala
आधुनिक युग में भारतेंदु हरिश्चंद्र हिंदी नवजागरण के अग्रदूत हुए। बीसवीं शताब्दी में प्रेमचंद ने उर्दू और हिंदी दोनों के इतिहास में युगांतर प्रस्तुत किया। उस दौर में इकबाल, रविंद्रनाथ टैगोर, वल्लभ कौल का रोमांटिक दौर था, उस युग में यथार्थवाद की धारा प्रेमचंद ने प्रस्तुत की। राजा रानी की बजाय होरी धनिया और गांव को विषय बनाया।

उनके बाद जयशंकर प्रसाद, आचार्य नरेंद्र देव, हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ. केदारनाथ सिंह, नामवर सिंह आदि ने ज्ञान के साहित्य की रचना की। समाजवादी व राजनीतिक चेतना को निखारा। प्रो. प्रधान कहते हैं कि नागरी प्रचारिणी सभा के कायम होने के साथ हिंदी आंदोलन का गढ़ कायम हुआ।

मालवीय जी ने यहीं हिंदी साहित्य सम्मेलन की स्थापना की। 60 के दशक के बाद निराशा व हताशा के दौर में धूमिल जैसा कवि भी उभर कर आया। कहानीकारों में डॉ. काशीनाथ सिंह उभर कर आए। 70 के बाद ज्ञानेंद्र पति, पंडित भोला शंकर जैसे विद्वान हुए, जिन्होंने पांडित्य के साथ रचनात्मक साहित्य में योगदान किया।

आज सोशल मीडिया, इंटरनेट का युग है। लोग कहते भले हों लेकिन स्तरीय साहित्य इससे खास प्रभावित नहीं हुआ। ई-बुक्स के जरिये साहित्य का नया क्षितिज खुल रहा है। हां, ये जरूर है कि वैज्ञानिकों, इतिहासकारों, अर्थशास्त्रियों ने हिंदी में लिखना बंद कर दिया। इससे हिंदी का नुकसान हो रहा है। हम पिछड़ रहे हैं। पढ़े लिखों का ये दायित्व है इस नुकसान से साहित्य को, समाज को बचाएं।
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