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काशी ने भुला दिया चंद्रकाता के रचनाकार देवकीनंद को
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चंद्रकांत के किरदार आज भी लोगों के जेहन में हैं। लेकिन अमर कृति के रचनाकार को शायद काशी ने ही भुला दिया। इसे विडंबना ही कहेंगे कि 21वीं सदी में भी टीवी धारावाहिक के रूप में अपार लोकप्रियता बटोरने वाली चंद्रकांता के रचनाकार बाबू देवकीनंदन को काशी ने वो जगह नहीं दी जिसके वो हकदार थे। 18 जून को उनकी जयंती मनाई जाएगी।
काशी की विभूतियों पर शोध कर रहे नित्यानंद राय ने बताया कि लाहौरी टोला के मकान की कौन कहे पूरा मोहल्ला ही विश्वनाथ कॉरिडोर के अधिग्रहण में खत्म हो गया। राम कटोरा वाले मकान में उनकी तीसरी और चौथी पीढ़ी के लोग रहते हैं। दुख की बात यह है कि रामापुरा स्थित उनकी हवेली जिसे देवकीनंदन की हवेली कहते हैं। इसमें भी उनकी कोई निशानी नहीं बची है।
वरिष्ठ अधिवक्ता नित्यानन्द राय बताते हैं कि देवकीनंदन खत्री के काशी नरेश ईश्वरीप्रसाद नारायण सिंह से बहुत अच्छे संबंध थे। इसी के आधार पर उन्होंने चकिया और नौगढ़ के जंगलों के ठेके लिए। बाद में इन्हीं जंगलों, पहाड़ियों और ऐतिहासिक इमारतों के खंडहरों की पृष्ठभूमि में अपनी तिलिस्म तथा अय्यारी के कारनामों की कल्पनाओं को मिश्रित कर उन्होंने चन्द्रकांता उपन्यास की रचना की।
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उपन्यास पढ़ने के लिए सीखी हिंदी
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा था कि जितने हिंदी पाठक उन्होंने (बाबू देवकीनंदन खत्री ने) उत्पन्न किए उतने किसी और ग्रंथकार ने नहीं। चंद्रकांता उपन्यास इतना लोकप्रिय था कि जिन लोगों को हिंदी लिखना-पढ़ना नहीं जानते थे, उन्होंने केवल इस उपन्यास को पढ़ने के लिए हिंदी सीखी। इसी लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए उन्होंने इसी कथा को आगे बढ़ाते हुए दूसरा उपन्यास चंद्रकांता संतति लिखा जो चंद्रकांता की अपेक्षा कई गुना रोचक था। इन उपन्यासों की भाषा इतनी सरल है कि इन्हें बच्चे भी पढ़ लेते हैं।
चंद्रकांता ने बनाई थी लोकप्रियता
देवकीनंदन खत्री के उपन्यास पर चंद्रकांता नाम से दूरदर्शन ने धारावाहिक भी बनाया, जो बेहद लोकप्रिय रहा। रामायण और महाभारत के बाद यदि किसी सीरियल ने रिकार्ड बनाया तो वह चंद्रकांता ही था। यह धारावाहिक 1994 और 1996 के बीच डीडी नेशनल चैनल पर प्रसारित होता था।
बाबू देवकीनंदन खत्री
जन्म-18 जून 1861 समस्तीपुर बिहार
मृत्यु -1 अगस्त 1913 काशी
रचनाएं-चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, काजर की कोठरी, नरेंद्र-मोहिनी, कुसुम कुमारी, वीरेंद्र वीर, गुप्त गोदना, कटोरा भर, भूतनाथ
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काशी की विभूतियों पर शोध कर रहे नित्यानंद राय ने बताया कि लाहौरी टोला के मकान की कौन कहे पूरा मोहल्ला ही विश्वनाथ कॉरिडोर के अधिग्रहण में खत्म हो गया। राम कटोरा वाले मकान में उनकी तीसरी और चौथी पीढ़ी के लोग रहते हैं। दुख की बात यह है कि रामापुरा स्थित उनकी हवेली जिसे देवकीनंदन की हवेली कहते हैं। इसमें भी उनकी कोई निशानी नहीं बची है।
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वरिष्ठ अधिवक्ता नित्यानन्द राय बताते हैं कि देवकीनंदन खत्री के काशी नरेश ईश्वरीप्रसाद नारायण सिंह से बहुत अच्छे संबंध थे। इसी के आधार पर उन्होंने चकिया और नौगढ़ के जंगलों के ठेके लिए। बाद में इन्हीं जंगलों, पहाड़ियों और ऐतिहासिक इमारतों के खंडहरों की पृष्ठभूमि में अपनी तिलिस्म तथा अय्यारी के कारनामों की कल्पनाओं को मिश्रित कर उन्होंने चन्द्रकांता उपन्यास की रचना की।
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उपन्यास पढ़ने के लिए सीखी हिंदी
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा था कि जितने हिंदी पाठक उन्होंने (बाबू देवकीनंदन खत्री ने) उत्पन्न किए उतने किसी और ग्रंथकार ने नहीं। चंद्रकांता उपन्यास इतना लोकप्रिय था कि जिन लोगों को हिंदी लिखना-पढ़ना नहीं जानते थे, उन्होंने केवल इस उपन्यास को पढ़ने के लिए हिंदी सीखी। इसी लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए उन्होंने इसी कथा को आगे बढ़ाते हुए दूसरा उपन्यास चंद्रकांता संतति लिखा जो चंद्रकांता की अपेक्षा कई गुना रोचक था। इन उपन्यासों की भाषा इतनी सरल है कि इन्हें बच्चे भी पढ़ लेते हैं।
चंद्रकांता ने बनाई थी लोकप्रियता
देवकीनंदन खत्री के उपन्यास पर चंद्रकांता नाम से दूरदर्शन ने धारावाहिक भी बनाया, जो बेहद लोकप्रिय रहा। रामायण और महाभारत के बाद यदि किसी सीरियल ने रिकार्ड बनाया तो वह चंद्रकांता ही था। यह धारावाहिक 1994 और 1996 के बीच डीडी नेशनल चैनल पर प्रसारित होता था।
बाबू देवकीनंदन खत्री
जन्म-18 जून 1861 समस्तीपुर बिहार
मृत्यु -1 अगस्त 1913 काशी
रचनाएं-चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, काजर की कोठरी, नरेंद्र-मोहिनी, कुसुम कुमारी, वीरेंद्र वीर, गुप्त गोदना, कटोरा भर, भूतनाथ