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कारगिल विजय दिवसः मिलिए जांबाज अलीम अली से, गोलियां लगने के बाद भी दुश्मनों को करते रहे ढेर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
Updated Thu, 26 Jul 2018 01:07 PM IST
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जांबाज अलीम अली ने कहा, मजहब और जाति से बड़ी मानवता
- फोटो : अमर उजाला
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दोनों तरफ से ताबड़तोड़ गोलियां चल रही थीं, उसी दौरान जांबाज को पैर और हाथ में तीन गोलियां लगीं। फिर भी साहस नहीं छोड़ा और ताबड़तोड़ दुश्मनों पर गोलियां बरसाता रहा और दुश्मन देश के कई जवानों को ढेर कर दिया। हम बात कर रहे हैं कारगिल युद्ध के दौरान अदम्य साहस का परिचय देने वाले जांबाज जवान वाराणसी के चौबेपुर थाना क्षेत्र के सरसौल निवासी अलीम अली की।
अलीम अली आज भी उस दिन को याद कर जोश में आ जाते हैं। अलीम का कहना है कि मजहब और जाति से बड़ी मानवता है। हमें मानवता के धर्म और मर्म को समझना चाहिए। देश की सरहद पर जब कोई सैनिक शहीद होता है तो ऐसा लगता है कि जैसे मैंने आज अपना एक सगा बेटा खो दिया।
कारगिल विजय दिवस की पूर्व संध्या पर बुधवार को वीर सैनिक अलीम अली ने ‘अमर उजाला’ से ऑपरेशन विजय से जुड़ी यादें साझा कीं। कारगिल युद्ध के दौरान 22 ग्रेनेडियर के नायक रहे अलीम अली ने कहा कि ‘सर्वदा शक्तिशाली’ पर भरोसा करने वाली हमारी बटालियन 1999 में हैदाराबाद में थी।
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मई महीने में दोस्त की शादी के लिए छुट्टी पर आया था। इसी बीच कारगिल युद्ध के कारण छ्ट्टी रद्द होने की सूचना मिली। आदेश के बाद 25 जवानों की एक टुकड़ी जुबार हिल पहुंची। दो जुलाई को वहां पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा बंकर बनाने की सूचना मिली लेकिन कोई गतिविधि समझ में नहीं आई।
इसके बाद हम लोग तिरंगा फहराकर सर्वदा शक्तिशाली का नारा लगाने लगे। इसी बीच तीन तरफ से दुश्मनों ने फायरिंग शुरू कर दी। तीन घंटे के आमने-सामने की फायरिंग में पाकिस्तान के कई जवानों को हमने ढेर किया। इसके अगले दिन भोर में पाकिस्तानी सैनिकों के अटैक से सात जवान शहीद हो गए। इसी दौरान पहली बार अलीम अली को पैर और हाथ में तीन गोली लगी लेकिन वे मोर्चे पर डटे रहे। इसके बाद अलीम अली को चार गोली और लगीं।
लहूलुहान अलीम जमीन पर गिर पड़े लेकिन उन्होंने साहस जुटाया और तभी एक गोली उनके सीने के समीप जा लगी और वे खाई में गिर कर बेहोश हो गए। छह जुलाई की शाम सेना की एक टुकड़ी और आ गई और पाकिस्तानियों को खदेड़ दिया। हालांकि तब तक ग्रेनेडियर बटालियन के 10 जवान शहीद हो चुके थे और 15 घायल थे। वहीं, पाकिस्तान के 35 सैनिक मारे गए थे।
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अलीम अली आज भी उस दिन को याद कर जोश में आ जाते हैं। अलीम का कहना है कि मजहब और जाति से बड़ी मानवता है। हमें मानवता के धर्म और मर्म को समझना चाहिए। देश की सरहद पर जब कोई सैनिक शहीद होता है तो ऐसा लगता है कि जैसे मैंने आज अपना एक सगा बेटा खो दिया।
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कारगिल विजय दिवस की पूर्व संध्या पर बुधवार को वीर सैनिक अलीम अली ने ‘अमर उजाला’ से ऑपरेशन विजय से जुड़ी यादें साझा कीं। कारगिल युद्ध के दौरान 22 ग्रेनेडियर के नायक रहे अलीम अली ने कहा कि ‘सर्वदा शक्तिशाली’ पर भरोसा करने वाली हमारी बटालियन 1999 में हैदाराबाद में थी।
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मई महीने में दोस्त की शादी के लिए छुट्टी पर आया था। इसी बीच कारगिल युद्ध के कारण छ्ट्टी रद्द होने की सूचना मिली। आदेश के बाद 25 जवानों की एक टुकड़ी जुबार हिल पहुंची। दो जुलाई को वहां पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा बंकर बनाने की सूचना मिली लेकिन कोई गतिविधि समझ में नहीं आई।
इसके बाद हम लोग तिरंगा फहराकर सर्वदा शक्तिशाली का नारा लगाने लगे। इसी बीच तीन तरफ से दुश्मनों ने फायरिंग शुरू कर दी। तीन घंटे के आमने-सामने की फायरिंग में पाकिस्तान के कई जवानों को हमने ढेर किया। इसके अगले दिन भोर में पाकिस्तानी सैनिकों के अटैक से सात जवान शहीद हो गए। इसी दौरान पहली बार अलीम अली को पैर और हाथ में तीन गोली लगी लेकिन वे मोर्चे पर डटे रहे। इसके बाद अलीम अली को चार गोली और लगीं।
लहूलुहान अलीम जमीन पर गिर पड़े लेकिन उन्होंने साहस जुटाया और तभी एक गोली उनके सीने के समीप जा लगी और वे खाई में गिर कर बेहोश हो गए। छह जुलाई की शाम सेना की एक टुकड़ी और आ गई और पाकिस्तानियों को खदेड़ दिया। हालांकि तब तक ग्रेनेडियर बटालियन के 10 जवान शहीद हो चुके थे और 15 घायल थे। वहीं, पाकिस्तान के 35 सैनिक मारे गए थे।
पोस्टमार्टम के दौरान सांस चलती देख डाक्टर ने भेजा था अस्पताल
जांबाज अलीम अली ने कहा, मजहब और जाति से बड़ी मानवता
- फोटो : अमर उजाला
अलीम अली ने बताया कि जवानों ने खाईं से उन्हें निकालकर शहीद जवानों के पार्थिव शव के साथ उन्हें भी लेटा दिया। पोस्टमार्टम के दौरान एक डॉक्टर की नजर उन पर गई और पैरों को हिलते देखा तो आननफानन में सेना के हेलीकॉप्टर से चंडीगढ़ होते हुए लखनऊ में तीन महीने तक उपचार कराया। इस पल को याद करते हुए डबडबाई आंखों से अलीम अली ने कहा कि मेरा मानसिक संतुलन 22 दिन से ज्यादा समय तक सही नहीं था। हालांकि ऊपर वाले की कृपा से सब सही हुआ और 2001 में अपंगता के कारण पेंशन पर भेज दिया गया।
गंगा-जमुनी तहजीब के परिचायक हैं अलीम
भारतीय सेना के वीर सैनिक अलीम अली गंगा-जमुनी तहजीब के परिचायक भी हैं। गले में रुद्राक्ष और स्फटिक की माला पहनने वाले अलीम कहते हैं कि सभी को एक-दूसरे के दुख-दर्द में काम आना चाहिए। देश की बेहतरी के लिए सोचकर अपने कर्तव्यों का सही तरीके से निर्वहन करना चाहिए।
बिजली का बिल और गृह कर माफ कर दे सरकार
सेना से विशिष्ट सेवा के लिए मेडल पा चुके अलीम अली की मांग है कि देश की सरहद पर लड़कर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले सैनिकों का बिजली का बिल और गृह कर प्रदेश सरकार को माफ कर देना चाहिए। यदि ऐसा हुआ तो प्रदेश और केंद्र सरकार का आभारी रहूंगा। इसके अलावा अन्य कोई अतिरिक्त मांग नहीं है, पेंशन के सहारे जीवन चल रहा है।
गंगा-जमुनी तहजीब के परिचायक हैं अलीम
भारतीय सेना के वीर सैनिक अलीम अली गंगा-जमुनी तहजीब के परिचायक भी हैं। गले में रुद्राक्ष और स्फटिक की माला पहनने वाले अलीम कहते हैं कि सभी को एक-दूसरे के दुख-दर्द में काम आना चाहिए। देश की बेहतरी के लिए सोचकर अपने कर्तव्यों का सही तरीके से निर्वहन करना चाहिए।
बिजली का बिल और गृह कर माफ कर दे सरकार
सेना से विशिष्ट सेवा के लिए मेडल पा चुके अलीम अली की मांग है कि देश की सरहद पर लड़कर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले सैनिकों का बिजली का बिल और गृह कर प्रदेश सरकार को माफ कर देना चाहिए। यदि ऐसा हुआ तो प्रदेश और केंद्र सरकार का आभारी रहूंगा। इसके अलावा अन्य कोई अतिरिक्त मांग नहीं है, पेंशन के सहारे जीवन चल रहा है।