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कारगिल विजय दिवस: युद्ध में लगीं थी आठ गोलियां, डटे रहे, फहराया तिरंगा; पढ़ें- इस सैनिक की बहादुरी भरी कहानी
Fri, 26 Jul 2024 01:46 PM IST
अमन विश्वकर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
Published by: अमन विश्वकर्मा
Updated Fri, 26 Jul 2024 01:46 PM IST
सार
Varanasi News: आज कारगिल विजय दिवस है। इस अवसर पर हम वाराणसी के उस सैनिक की कहानी बताएंगे, जिन्होंने कारगिल युद्ध में अपनी बहादुरी के साथ देश का तिरंगा चोटी पर फहरा दिया। जबकि उन्हें आठ गोलियां लगीं थीं, बावजूद इसके वह रणभूमि में डटे रहे।
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चौबेपुर के अलीम अली।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
चौबेपुर के अलीम अली अखाड़े में पहलवानी के दांव-पेंच लगा रहे थे। देश के लिए पदक जीतने थे, मगर दिल में ख्वाब सेना में जाने का पल रहा था। पहलवानी करते हुए राष्ट्रीय स्तर पर कांस्य और दो बार रजत पदक जीते और राज्य स्तर पर एक बार स्वर्ण और दो बार रजत पदक अपने नाम किया। इसी पहलवानी के रास्ते 1990 में सेना में भर्ती हो गए।
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1999 में कारगिल युद्ध में 22 ग्रेनेडियर टुकड़ी के हिस्सा रहे और दुश्मनों से लड़ते हुए शरीर में आठ गोलियां लगीं। मगर चोटी पर तिरंगा फहराने तक लड़ते रहे और मौत को भी मात दे दी। अलीम अली आज भी 1999 की उस गौरवगाथा को बताते हुए गर्व से भर जाते हैं। वह बताते हुए इस तरह की भाव भंगिमा में चले जाते हैं मानों अभी युद्ध में ही हैं।
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चौबेपुर क्षेत्र के सरसौल गांव निवासी अलीम अली 1990 में सेना में भर्ती हुए थे। जुलाई 1992 से सितंबर 1995 तक कश्मीर में चल रहे ऑपरेशन रक्षक हिस्सा रहे। 1999 में जब युद्ध हुआ तो वह छुट्टी पर थे और दोस्त की शादी में घर आए हुए थे।
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युद्ध के दौरान छुट्टियां रद्द कर दी गईं और वह अपनी हैदराबाद की बटालियन से जुड़ गए और पहुंच गए कारगिल। 40 जवानों की उनकी एक टुकड़ी 21 हजार फीट ऊंचाई जुबेर चोटी पर पहुंची।
दो जुलाई को सूचना मिली कि चोटी पर ऊपर पाकिस्तानी सैनिक बंकर बना रही है। हम लोगों ने निगरानी शुरू की मगर कहीं कोई गतिविधि नहीं दिखाई दी। चोटी की ऊंचाई अधिक थी और हम लोग थोड़ा नीचे की ओर थे।
सभी ने चढ़ाई शुरू की और आधे से अधिक ऊंचाई पर पहुंच गए इसी बीच दुश्मनों ने ऊपर से फायरिंग शुरू कर दी। हमारी टुकड़ी ने भी जवाबी फायरिंग शुरू की और ऊपर चढ़ना भी जारी रखा।
वह ऊपर से फायरिंग कर रहे थे और हमारी टुकड़ी नीचे से ही निशाना बनाकर खुद का बचाव करते हुए दुश्मनों को मार भी रही थी। इसमें हमारे 10 जवान शहीद हो गए थे और 25 बुरी तरह घायल हुए थे। मगर हमारी टुकड़ी चोटी पर पहुंची और 35 पाकिस्तानियों को मारते हुए चोटी पर तिरंगा फहरा दिया। खुद अलिम अली को चेहरे, घुटने, कमर, कंधे और सीने समेत शरीर के आठ हिस्सों में गोली लगी थी।
उन्होंने बताया कि यह गोली अलग-अलग समय में लगीं, गोली लगती रहीं मगर वह लड़ते रहे। वह तब बेहोश होकर खाई में गिरे जब गोली उनके सीने में लगी। चोटी फतह करने के बाद साथी नीचे लाकर आए, जहां इलाज शुरू किया गया।