Jivitputrika Vrat Katha: जीवित्पुत्रिका व्रत की ये है पूरी कहानी, यहां पढ़ें- महत्व और कब तक रहेगा शुभ मुहूर्त
कथा है कि सतयुग में गंधर्वों के एक राजकुमार थे,जिनका नाम जीमूतवाहन था। वे बड़े ही धर्मात्मा, परोपकारी और सत्यवादी थे। जीमूतवाहन को राजसिंहासन पर बिठाकर उनके पिता वन में प्रभु का स्मरण करने चले गए।
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विस्तार
गुरुवार को शहर से लेकर गांव तक महिलाओं ने सात्विक भोजन के बाद नहाय खाय से जीउतिया व्रत का श्रीगणेश कर दिया। महिलाओं ने शुक्रवार की सुबह जल्दी स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करके व्रत करने का संकल्प लिया। पूजा के लिए जीमूतवाहन भगवान की मूर्ति की स्थापना करके शहर के सभी कुंडों और गंगा के तट पर पूजन हुआ।
आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के लिए बाजार भी सजे थे और देर रात तक महिलाओं ने जीउतिया खरीदी। पूजन की सामग्री के साथ ही देर रात तक खरीदारी चलती रही। महिलाओं ने फल, फूल और जिउतिया के साथ पूजन सामग्री की खरीदारी की। बाजार में सूप, दउरी, पूजन सामग्री आदि के दुकानों पर भी भीड़ रही।
ये है कहानी
कथा है कि सतयुग में गंधर्वों के एक राजकुमार थे,जिनका नाम जीमूतवाहन था। वे बड़े ही धर्मात्मा, परोपकारी और सत्यवादी थे। जीमूतवाहन को राजसिंहासन पर बिठाकर उनके पिता वन में प्रभु का स्मरण करने चले गए। लेकिन उनका मन राज कार्य में नहीं लगा। वे राज-पाट की जिम्मेदारी अपने भाइयों को देकर अपने पिता की सेवा के उदेश्य से उनके पास वन में चले गए। वन में ही उनका विवाह मलयवती नाम की कन्या से हुआ। एक दिन वन में भ्रमण करते हुए उनकी भेंट एक वृद्धा से हुई, जो नागवंश से थी। वह काफी डरी हुई थी और रो रही थी। दयालु जीमूतवाहन ने उससे उसकी ऐसी स्थिति के बारे में पूछा। इस पर वृद्धा ने बताया कि नागों ने पक्षीराज गरुड़ को वचन दिया है कि प्रत्येक दिन वे एक नाग को उनके आहार के रूप में देंगे।
रोते हुए वृद्धा ने बताया कि उसका एक बेटा है, जिसका नाम शंखचूड़ है। आज उसे पक्षीराज गरुड़ के पास जाना है।
इस पर जीमूतवाहन ने वृद्धा को आश्वस्त करते हुए कहा कि डरो मत,तुम्हारे पुत्र के प्राणों की रक्षा मैं करूंगा। आज तुम्हारे पुत्र की जगह स्वयं को लाल कपड़े से ढक कर शिला पर लेटूंगा। नियत समय पर जीमूतवाहन पक्षीराज गरुड़ के समक्ष प्रस्तुत हो गए।लाल कपड़े में लिपटे जीमूतवाहन को गरुड़ अपने पंजों में दबोच कर साथ लेकर चल दिए। उस दौरान उन्होंने जीमूतवाहन की आंखों में आंसू निकलते देखा और कराहते हुए सुना। वे एक पहाड़ पर रुके, तो जीमूतवाहन ने सारी घटना बताई।पक्षीराज गरुड़ जीमूतवाहन के साहस, परोपकार और मदद करने की भावना से काफी प्रभावित हुए। उन्होंने जीमूतवाहन को प्राणदान दे दिया और कहा कि वे अब किसी नाग को अपना आहार नहीं बनाएंगे। इस तरह से जीमूतवाहन ने नागों की रक्षा की।तभी से संतान की सुरक्षा और सुख के लिए जीमूतवाहन की पूजा की शुरुआत हो गई।
ये है शुभ मुहूर्त
काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के सदस्य पं. दीपक मालवीय ने बताया कि जीउतिया का व्रत आश्विन कृष्ण अष्टमी को रखा जाएगा। अष्टमी तिथि का आरंभ छह अक्तूबर को सुबह 6:34 मिनट पर होगा और सात अक्तूबर को सुबह 8:08 मिनट तक रहेगा। जीउतिया का व्रत छह अक्तूबर को रखा जाएगा और सात अक्तूबर को महिलाएं व्रत का पारण करेंगी।