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भारतीय संस्कृति में भोगी नहीं योगी की होती है पूजा
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भारतीय संस्कृति में भोगी नहीं योगी की होती है पूजा
त्याग के बिना कोई धर्म जीवित नहीं रह सकता
दशलक्षण पर्वाधिराज के आठवें दिन उत्तम त्याग धर्म पर हुआ व्याख्यान
अमर उजाला ब्यूरो
वाराणसी। दशलक्षण महापर्व में घरों में ही सभी परंपराएं निभाई जा रही हैं वहीं भक्त मंदिरों में होने वाले अनुष्ठान को घर बैठे ऑनलाइन देख रहे हैं। रविवार को आठवें दिन प्रात: जैन मंदिरों में भक्तों ने रत्नत्रय पूजन के साथ अनंतनाथ भगवान का पूजन भी प्रारंभ किया। भगवंतों का पूजन और अभिषेक भी सविधि संपन्न हुआ। सायंकाल जिनेंद्र भगवान की आरती, जिनवाणी पूजन और देवी पद्मावती जी की आरती की गई।
रविवार को सायंकाल फेसबुक पर लाइव व्याख्यान करते हुए पं. सिद्धांत शास्त्री सांगानेर ने उतम त्याग धर्म पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति भोग की नहीं त्याग की रही है। भारतीय संस्कृति में भोगी नहीं योगी की पूजा हुई है। संयमी का त्याग साधना वृद्धि के लिए होता है और असंयमी का त्याग रोगों की निवृत्ति के लिए होता है। ग्रहण में नहीं त्याग में सुख मिलता है। प्रकृति ने हमें त्यागना सिखाया है। संस्कृति ने हमें त्याग सिखाया है। त्याग से पाप का मूलधन समाप्त होता है और दान से पाप का ब्याज समाप्त होता है। त्याग जीवन के सौंदर्य को निखारता है और दान जीवन को संवारता है। त्याग की नींव पर ही धर्म की इमारत खड़ी हुई है। त्याग के बिना कोई धर्म जीवित नहीं रह सकता। त्याग करो सब जड़ वस्तु का। यह साथ नहीं जाएगा। त्याग जीवन को महान बनाता है। जैन धर्म में संपूर्ण पूजा तप-त्याग का ही फल है। संग्रह के साथ त्याग ना किया तो जीवन का संतुलन बिगड़ जाएगा। त्याग के बिना कुछ भी पाना संभव नहीं है क्योंकि एक सांस लेने के लिए भी पहली सांस छोडनी पड़ती है। उतम त्याग करके प्राणी अपने जीवन का उद्धार करके आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।
भादो माह है सम्राट के समान
जैन धर्म में भादो माह को सम्राट के समान माना गया है। इस दौरान प्रत्येक गृहस्थ के मन में सहज ही त्याग, तपस्या, व्रत, दर्शन, पूजन और भजन की भावना उत्पन्न होती है। - सुधीर पोद्दार, पूर्व मंत्री जैन समाज
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जल्द दूर होगी महामारी
कोरोना महामारी के कारण दशलक्षण महापर्व के सभी आयोजन ऑनलाइन किए जा रहे हैं। महाप्रभु से यही प्रार्थना है कि वह जल्द ही इस वैश्विक महामारी को हम सबसे दूर करें। - सौरभ जैन, मंत्री
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त्याग के बिना कोई धर्म जीवित नहीं रह सकता
दशलक्षण पर्वाधिराज के आठवें दिन उत्तम त्याग धर्म पर हुआ व्याख्यान
अमर उजाला ब्यूरो
वाराणसी। दशलक्षण महापर्व में घरों में ही सभी परंपराएं निभाई जा रही हैं वहीं भक्त मंदिरों में होने वाले अनुष्ठान को घर बैठे ऑनलाइन देख रहे हैं। रविवार को आठवें दिन प्रात: जैन मंदिरों में भक्तों ने रत्नत्रय पूजन के साथ अनंतनाथ भगवान का पूजन भी प्रारंभ किया। भगवंतों का पूजन और अभिषेक भी सविधि संपन्न हुआ। सायंकाल जिनेंद्र भगवान की आरती, जिनवाणी पूजन और देवी पद्मावती जी की आरती की गई।
रविवार को सायंकाल फेसबुक पर लाइव व्याख्यान करते हुए पं. सिद्धांत शास्त्री सांगानेर ने उतम त्याग धर्म पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति भोग की नहीं त्याग की रही है। भारतीय संस्कृति में भोगी नहीं योगी की पूजा हुई है। संयमी का त्याग साधना वृद्धि के लिए होता है और असंयमी का त्याग रोगों की निवृत्ति के लिए होता है। ग्रहण में नहीं त्याग में सुख मिलता है। प्रकृति ने हमें त्यागना सिखाया है। संस्कृति ने हमें त्याग सिखाया है। त्याग से पाप का मूलधन समाप्त होता है और दान से पाप का ब्याज समाप्त होता है। त्याग जीवन के सौंदर्य को निखारता है और दान जीवन को संवारता है। त्याग की नींव पर ही धर्म की इमारत खड़ी हुई है। त्याग के बिना कोई धर्म जीवित नहीं रह सकता। त्याग करो सब जड़ वस्तु का। यह साथ नहीं जाएगा। त्याग जीवन को महान बनाता है। जैन धर्म में संपूर्ण पूजा तप-त्याग का ही फल है। संग्रह के साथ त्याग ना किया तो जीवन का संतुलन बिगड़ जाएगा। त्याग के बिना कुछ भी पाना संभव नहीं है क्योंकि एक सांस लेने के लिए भी पहली सांस छोडनी पड़ती है। उतम त्याग करके प्राणी अपने जीवन का उद्धार करके आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।
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भादो माह है सम्राट के समान
जैन धर्म में भादो माह को सम्राट के समान माना गया है। इस दौरान प्रत्येक गृहस्थ के मन में सहज ही त्याग, तपस्या, व्रत, दर्शन, पूजन और भजन की भावना उत्पन्न होती है। - सुधीर पोद्दार, पूर्व मंत्री जैन समाज
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जल्द दूर होगी महामारी
कोरोना महामारी के कारण दशलक्षण महापर्व के सभी आयोजन ऑनलाइन किए जा रहे हैं। महाप्रभु से यही प्रार्थना है कि वह जल्द ही इस वैश्विक महामारी को हम सबसे दूर करें। - सौरभ जैन, मंत्री