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श्रद्धा: महाशिवरात्रि पर जौ भर बढ़ते हैं जागेश्वर, सावन में तिल भर बढ़ते हैं तिलभांडेश्वर; आध्यात्मिक है महत्व

Sat, 27 Jul 2024 04:07 PM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Sat, 27 Jul 2024 04:07 PM IST
सार

Varanasi News: आध्यात्मिक नगरी काशी में स्थापित शिवलिंग का अपना विशेष महत्व है। सावन माह में इनके दर्शन का पुण्य लाभ हर भक्त लेना चाहता है। इसके लिए लंबी-लंबी कतारें भी लगती हैं। दूर-दराज से आए भक्त जलाभिषेक कर धन्य हो जाते हैं।

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Jageshwar grows by barley Mahashivratri while Tilbhandeshwar grows sesame seed in Sawan
तिलभांडेश्वर और जागेश्वर महादेव। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

काशी में भगवान शिव के शरीर के अंगों के स्वरूप में विराजमान शिवलिंगों की मान्यताएं अद्भुत हैं। महादेव के मंदिर की हर चौखट पर शिवभक्तों को उनकी उपस्थिति का अहसास जरूर होता है। 

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जागेश्वर महादेव में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजते हैं और महाशिवरात्रि पर यह शिवलिंग जौ भर बढ़ जाता है। वहीं, तिलभांडेश्वर महादेव का शिवलिंग तो सावन की प्रदोष तिथि पर तिल भर बढ़ता है।
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जैगीषव्य ऋषि ने किया था तप
ईश्वरगंगी स्थित श्री जागेश्वर महादेव मंदिर में अति प्राचीन विशालकाय शिवलिंग है। मान्यता है कि शिवलिंग हर महाशिवरात्रि पर जौ के बराबर अपने आप बढ़ जाता है। मंदिर के महंत स्वामी मधुर कृष्ण ने बताया कि जागेश्वर महादेव के तीन साल तीन महीने दर्शन या सिर्फ तीन महीने ही दर्शन कर लें तो हर मनोकामना पूर्ण होती है।
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स्कंदपुराण काशी खंड के अनुसार जिस समय भगवान शिव काशी छोड़कर गए, उस दिन जैगीषव्य मुनि ने यह प्रतिज्ञा ली थी कि भगवान शिव के दर्शन के बाद ही जल ग्रहण करेंगे। ऋषि मुनि के कठोर तप से भगवान प्रसन्न हुए और नंदी को लीलाकमल लेकर भेजा। 

नंदी ने जैसे ही लीलाकमल का स्पर्श जैगीषव्य ऋषि को कराया, उनका क्षीण हो चुका शरीर स्वस्थ हो गया। जैगीषव्य ऋषि ने भगवान शिव से वहीं विराजमान होने का वरदान मांगा। भगवान शिव ने वरदान दिया कि इस शिवलिंग के दर्शन से मनुष्य की हर कामना पूर्ण होगी और मेरे साथ तुम भी मेरे चरणों के पास वास करोगे।

गंगा सागर, प्रयाग और दशाश्वमेध स्नान के बराबर मिलता है पुण्य
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर से लगभग 800 मीटर दूर पांडेय हवेली में तिलभांडेश्वर महादेव विराजमान हैं। मंदिर के गर्भगृह में बाबा का विशाल शिवलिंग है। 

मान्यता है कि भगवान तिलभांडेश्वर का आकार सावन के प्रदोष पर तिल भर बढ़ता है। इसलिए इन्हें तिलभांडेश्वर महादेव कहा जाता है। गंगा सागर में बार-बार स्नान, प्रयाग संगम में स्नान और काशी के दशाश्वमेध घाट पर स्नान करने से जो पुण्य की प्राप्ति होती है, उस पुण्य की प्राप्ति केवल एक बार तिलभांडेश्वर महादेव के दर्शन मात्र से हो जाती है। 

तिलभांडेश्वर महादेव की उत्पत्ति के बारे में काशी के विद्वानों का कहना है कि शिवलिंग अनादिकाल से विद्यमान है। पुराणों के अनुसार स्वयंभू तिलभांडेश्वर महान ऋषि विभांड की तपोस्थली है। ऋषि विभांड यहीं पर पूजन-अर्चन, अनुष्ठान और साधना करते थे। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उनको वरदान दिया कि यह सिद्ध शिवलिंग कलयुग पर्यंत सावन के प्रदोष पर एक तिल के बराबर बढ़ेंगे।

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