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लमही में आज भी जिंदा है ‘गंगी’
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Fri, 01 Jul 2016 02:20 AM IST
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जोखू ने लोटा मुंह से लगाया तो सख्त बदबू आई। गंगी से बोला यह कैसा पानी है? मारे बास के पिया नहीं जाता। गला सूखा जा रहा है। तू सड़ा पानी पिलाए देती है। गंगी ने बोला ठाकुर के कुएं पर कौन चढ़ने देगा। दूर से डांट भगाएंगे। उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'ठाकुर का कुआं' आज भी लमही में जिंदा है। 100 साल पहले जिस माहौल को देखकर मुंशी प्रेमचंद ने कहानी लिखी थी, वही हालात आज भी दिख रहे है। 364 दिन दबंगों से सताई जाने वाली जनता न डर से कमिश्नर के सामने अपनी तकलीफ तक नहीं बताई।
मुंशी प्रेमंचद की कहानियों के किरदार होरी, अमीना, शंकर, जियावन और घीसू लमही में आज भी भटक रहे हैं। उनकी व्यथा-कथा को कहानियों में पिरोकर मुंशी प्रेमचंद ने समाज को जो आइना दिखाया था। वह जस का तस है। आज भी डर के मारे लोग बोलने से कतरा रहे हैं। जिस प्रकार मुंशी प्रेमचंद की कहानी में गंगी की स्थिति रही, लमही की जनता की स्थिति बिल्कुल वैसी ही है।
मुंशी प्रेमचंद की जयंती का उत्सव 31 जुलाई की तैयारियों में जिन्हें जुटना चाहिए था, वहां गांव वालों की आपसी तकरार चल रही है। उनकी जन्मस्थली पर कब्जे को लेकर ठाकुर का कुंआ कहानी जैसे हालात हैं। गुरुवार को लमही की बदहाली देखने पहुंचे कमिश्नर नितिन रमेश गोकर्ण से कुछ लोगों ने कहा कि तालाब पर कब्जा हो रहा है। स्मारक में बिजली कनेक्शन नहीं है। इस पर कमिश्नर ने नायब तहसीलदार को निर्देश दिया कि पैमाइश कराके इसका दायरा चिह्नित किया जाए। यदि इस दौरान कोई अतिक्रमण मिले, तो उसे ढहा दिया जाए। शोध एवं अध्ययन केंद्र में धूल और गंदगी दिखी, जबकि उसमें रखा गया फर्नीचर नया था।
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मुंशी प्रेमचंद के बंद कमरों में जमी धूल देख कमिश्नर ने इसके रखरखाव और साफ-सफाई के लिए स्थानीय स्तर पर समिति बनाने की सलाह दी। कहा, यहां आने वालों के लिए प्रवेश शुल्क निर्धारित किया जाए। प्रवेश शुल्क से होने वाली आय से मुंशी प्रेमचंद के स्मारक का रखरखाव किया जाएगा।
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मुंशी प्रेमंचद की कहानियों के किरदार होरी, अमीना, शंकर, जियावन और घीसू लमही में आज भी भटक रहे हैं। उनकी व्यथा-कथा को कहानियों में पिरोकर मुंशी प्रेमचंद ने समाज को जो आइना दिखाया था। वह जस का तस है। आज भी डर के मारे लोग बोलने से कतरा रहे हैं। जिस प्रकार मुंशी प्रेमचंद की कहानी में गंगी की स्थिति रही, लमही की जनता की स्थिति बिल्कुल वैसी ही है।
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मुंशी प्रेमचंद की जयंती का उत्सव 31 जुलाई की तैयारियों में जिन्हें जुटना चाहिए था, वहां गांव वालों की आपसी तकरार चल रही है। उनकी जन्मस्थली पर कब्जे को लेकर ठाकुर का कुंआ कहानी जैसे हालात हैं। गुरुवार को लमही की बदहाली देखने पहुंचे कमिश्नर नितिन रमेश गोकर्ण से कुछ लोगों ने कहा कि तालाब पर कब्जा हो रहा है। स्मारक में बिजली कनेक्शन नहीं है। इस पर कमिश्नर ने नायब तहसीलदार को निर्देश दिया कि पैमाइश कराके इसका दायरा चिह्नित किया जाए। यदि इस दौरान कोई अतिक्रमण मिले, तो उसे ढहा दिया जाए। शोध एवं अध्ययन केंद्र में धूल और गंदगी दिखी, जबकि उसमें रखा गया फर्नीचर नया था।
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मुंशी प्रेमचंद के बंद कमरों में जमी धूल देख कमिश्नर ने इसके रखरखाव और साफ-सफाई के लिए स्थानीय स्तर पर समिति बनाने की सलाह दी। कहा, यहां आने वालों के लिए प्रवेश शुल्क निर्धारित किया जाए। प्रवेश शुल्क से होने वाली आय से मुंशी प्रेमचंद के स्मारक का रखरखाव किया जाएगा।