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Women's day: अभी भी ‘बेचारी’, ‘घर की इज्जत’ और ‘अबला’!
न्यूज डेस्क, अमर उजाला,वाराणसी
Updated Thu, 08 Mar 2018 02:50 PM IST
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अमर उजाला संवाद में स्त्री विमर्श
- फोटो : अमर उजाला
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अबला की पहचान से उभर कर शक्ति के सशक्त रूप तक महिलाओं को गढ़ने की कोशिश। सामने आने वाली बाधाएं और उसे पार करने की कोशिश। इन सबके बीच पितृसत्तात्मक समाज की भूमिका। एक लंबा अरसा बीत जाने के बाद भी ‘स्त्री विमर्श’ को लेकर हम वहीं हैं, हमारे सवाल वही हैं।
महिलाएं आज भी हिंसा की शिकार क्यों हैं, उन्हें वो आजादी, वो बराबरी क्यों नहीं दी गईं, आज भी उन्हें अपने अधिकारों के लिए लड़ना जूझना क्यों हैं? उनके लिए कानून, सुरक्षा, संघर्ष के मायने तो बदल रहे हैं लेकिन आज से पचास साल पहले जो उसकी स्थिति है, आज भी वहीं क्यों है? क्यों आज भी उन्हें ‘बेचारी’, ‘घर की इज्जत’ और ‘अबला’ जैसे संबोधनों की जरूरत है।
विश्व महिला दिवस के उपलक्ष्य में बुधवार को अमर उजाला चांदपुर कार्यालय में आयोजित संवाद में इन तमाम पहलुओं, मुद्दों पर बहुत ही सहजता और गंभीरता से शहर की विशिष्ट महिलाओं ने अपनी राय अपनी बात रखी।
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किसी ने बेटियों को पूरे विश्वास के साथ समान अवसर देने की बात कही तो किसी ने मूल्यों के साथ बच्चों की परवरिश पर जोर दिया। स्कूल में लिंग समानता को पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने की वकालत किसी ने की तो बेटियों ने कहा आसमान में उड़ना उन्हें बखूबी आता है, हमें बस मौका दीजिए।
धर्म और संस्कृति को पुन: परिभाषित करने की जरूरत है जिसमें अर्द्धनारीश्वर की बात तो कही गई लेकिन उसी धर्म और मजहब ने महिलाआें के लिए दोहरे मापदंड बना दिए हैं जबकि इसी देश में एक ऐसा भी समाज (जनजातीय) है जो समानता की बेहतर नजीर पेश कर रहा है। समाज को जेंडर सेंसिटिव बनाने पर जोर दिया गया। इसके लिए हमें खुद जागते रहने और समाज को जगाते रहने की जरूरत है।
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महिलाएं आज भी हिंसा की शिकार क्यों हैं, उन्हें वो आजादी, वो बराबरी क्यों नहीं दी गईं, आज भी उन्हें अपने अधिकारों के लिए लड़ना जूझना क्यों हैं? उनके लिए कानून, सुरक्षा, संघर्ष के मायने तो बदल रहे हैं लेकिन आज से पचास साल पहले जो उसकी स्थिति है, आज भी वहीं क्यों है? क्यों आज भी उन्हें ‘बेचारी’, ‘घर की इज्जत’ और ‘अबला’ जैसे संबोधनों की जरूरत है।
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विश्व महिला दिवस के उपलक्ष्य में बुधवार को अमर उजाला चांदपुर कार्यालय में आयोजित संवाद में इन तमाम पहलुओं, मुद्दों पर बहुत ही सहजता और गंभीरता से शहर की विशिष्ट महिलाओं ने अपनी राय अपनी बात रखी।
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किसी ने बेटियों को पूरे विश्वास के साथ समान अवसर देने की बात कही तो किसी ने मूल्यों के साथ बच्चों की परवरिश पर जोर दिया। स्कूल में लिंग समानता को पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने की वकालत किसी ने की तो बेटियों ने कहा आसमान में उड़ना उन्हें बखूबी आता है, हमें बस मौका दीजिए।
धर्म और संस्कृति को पुन: परिभाषित करने की जरूरत है जिसमें अर्द्धनारीश्वर की बात तो कही गई लेकिन उसी धर्म और मजहब ने महिलाआें के लिए दोहरे मापदंड बना दिए हैं जबकि इसी देश में एक ऐसा भी समाज (जनजातीय) है जो समानता की बेहतर नजीर पेश कर रहा है। समाज को जेंडर सेंसिटिव बनाने पर जोर दिया गया। इसके लिए हमें खुद जागते रहने और समाज को जगाते रहने की जरूरत है।
अमर उजाला संवाद में स्त्री विमर्श की दिशा पर महिलाओं ने रखी अपनी बात
- फोटो : अमर उजाला
बीएचयू लॉ फैकल्टी की प्रो. विभा त्रिपाठी ने कहा कि स्त्री विमर्श में हम कितने संपन्न हैं, संरक्षणवादी है इसमें परिवार की भूमिका अहम है। हर पिता को चाहिए कि वो बेटियों को विश्वास के साथ पूरा अवसर दें।
प्रकृति फाउंडेशन की निदेशक डॉ. भावना त्रिवेदी ने कहा कि सरकार, शासन प्रशासन और समाज तीनों को भी जेंडर सेंसिटिव होने की जरूरत है। महिला पुरुष को प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि एक दूसरे का पूरक बनने की जरूरत है।
बीएचयू एमएमवी की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. प्रतिमा गोंड ने कहा कि समाज की पितृसत्तात्मक सोच ने बड़ी चालाकी से महिलाओं को एक उपभोग की वस्तु बना दिया। हमें अपने धर्म-संस्कृति को भी पुन: परिभाषित करने की जरूरत है।
आर्य महिला पीजी कॉलेज की असिस्टेंट प्रोफेसरडॉ. अनीता सिंह ने कहा कि मौजूदा वक्त में लड़ाई बराबरी की नहीं बल्कि महिला पुरुष को एक दूसरे के पूरक बनकर खड़े होने की जरूरत है। हमें मिलकर अपनी सोच का दायरा बढ़ाने की जरूरत है।
बीएचयू की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अरुणा कुमारी ने कहा कि लंबा समय बीत चुका है बावजूद इसमें समाज का स्वरूप बदल नहीं रहा। इस पर हमें संजीदगी से सोचना होगा। महिला को समाज व घर की इज्जत को ढोना नहीं, अपने लिए जीना है।
डॉ. मनीषा पांडेय ने कहा कि अगर महिला शिक्षित है और आर्थिक रूप से सशक्त है तो वो मजबूती से लड़ सकती हे। सामाजिक व नैतिक मूल्यों को भी मजबूत करने की जरूरत है।
समाजसेवी जागृति राही ने कहा कि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी जरूरी है। आर्थिक रूप से भी उनका संबल होना जरूरी है। महिलाओं को संगठित शक्ति के रूप में काम करना होगा।
प्रकृति फाउंडेशन की निदेशक डॉ. भावना त्रिवेदी ने कहा कि सरकार, शासन प्रशासन और समाज तीनों को भी जेंडर सेंसिटिव होने की जरूरत है। महिला पुरुष को प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि एक दूसरे का पूरक बनने की जरूरत है।
बीएचयू एमएमवी की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. प्रतिमा गोंड ने कहा कि समाज की पितृसत्तात्मक सोच ने बड़ी चालाकी से महिलाओं को एक उपभोग की वस्तु बना दिया। हमें अपने धर्म-संस्कृति को भी पुन: परिभाषित करने की जरूरत है।
आर्य महिला पीजी कॉलेज की असिस्टेंट प्रोफेसरडॉ. अनीता सिंह ने कहा कि मौजूदा वक्त में लड़ाई बराबरी की नहीं बल्कि महिला पुरुष को एक दूसरे के पूरक बनकर खड़े होने की जरूरत है। हमें मिलकर अपनी सोच का दायरा बढ़ाने की जरूरत है।
बीएचयू की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अरुणा कुमारी ने कहा कि लंबा समय बीत चुका है बावजूद इसमें समाज का स्वरूप बदल नहीं रहा। इस पर हमें संजीदगी से सोचना होगा। महिला को समाज व घर की इज्जत को ढोना नहीं, अपने लिए जीना है।
डॉ. मनीषा पांडेय ने कहा कि अगर महिला शिक्षित है और आर्थिक रूप से सशक्त है तो वो मजबूती से लड़ सकती हे। सामाजिक व नैतिक मूल्यों को भी मजबूत करने की जरूरत है।
समाजसेवी जागृति राही ने कहा कि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी जरूरी है। आर्थिक रूप से भी उनका संबल होना जरूरी है। महिलाओं को संगठित शक्ति के रूप में काम करना होगा।
womens day
समाजसेवी शीरीन शबाना खान ने कहा कि लिंग समानता के प्रति शुरुआत से संवेदनशील होना होगा। स्कूलों में पाठ्यक्रम होने चाहिए। महिला अबला या मर्दानी नहीं इंसान है, उनके साथ वैसा ही व्यवहार होना चाहिए।
अधिवक्ता गुंजन गुप्ता ने कहा कि आधा ज्ञान हमारा घर में बंद होकर बर्बाद हो रहा है। पढ़ी लिखी महिलाओं को काम करने की आजादी नहीं है। हमें बच्चों को बोल्ड बनाने व उनमें हिम्मत भरने की जरूरत है।
जय पब्लिक स्कूल की निदेशक सुमन सिंह ने कहा कि महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त हों तो लोगाें की उनके प्रति इज्जत बढ़ती है। कोशिश हो कि लड़कियों को ऐसी शिक्षा दी जाए जो उन्हें आत्म्निर्भर बनाएं।
महानगर महिला मंडल की अध्यक्ष रश्मि अग्रवाल ने कहा कि महिलाओं को यही सोच कमजोर बनाती है कि वो पुरुष के अधीन हैं। हम नारी हैं, ये न सोचकर हम ये सोचें कि हम इंसान है। पुरुष के बराबर हैं। इसके हमें स्वयं सशक्त होना होगा।
बीएचयू की लॉ स्टूडेंट एकता सिंह ने कहा कि हम बेहतर हैं ये हम जानते हैं, हमें समान अवसर की जरूरत है। कोई लड़की इसलिए बेहतर नहीं कर रही कि वो लड़की है, बल्कि उसे वो अवसर मिला है इसलिए।
लड़कियों के साथ आज क्या कुछ नहीं हो रहा लेकिन दृढ़ता से उसका सामना वही कर सकती हैं जिनके साथ उसका परिवार खड़ा हो।
बीएचयू छात्रा दीक्षा सिंह ने कहा कि हमें लड़की न समझकर एक इंसान समझें। हम कोई वस्तु भी नहीं हैं। लोगों की सोच में ये बदलाव लाने की जरूरत है।