अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस: प्रतिस्पर्धी नहीं अब पूरक बनने की बारी, सोच बदले समाज
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नारी सशक्तीकरण अरसे से अहम मुद्दा है। वजह बस इतनी है कि हम समाज को बदलने की बात तो कर रहे हैं, लेकिन अपनी मानसिकता को नहीं बदल पा रहे। समाज में शक्ति स्वरूपा नारी को उसका वास्तविक दर्जा देने के लिए जरूरी है कि विचारों में परिवर्तन आए। सिर्फ बेटी को नहीं, बल्कि बेटों को भी सामाजिक मूल्यों की शिक्षा दी जाए। ये काम सिर्फ मां या स्त्री का नहीं बल्कि, हर पिता और पुरुष का भी है। उक्त विचार समाज के विभिन्न वर्गों की महिलाओं व युवतियों ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में रविवार को अमर उजाला चांदपुर स्थित कार्यालय में हुए संवाद कार्यक्रम में कहीं।
इसमें महिला सशक्तीकरण के नए आयाम तलाशने पर सभी की राय कमोबेश एक सी थी। मौजूदा वक्त में मानसिकता में परिवर्तन की जरूरत है। यह भी कहा गया कि बेटी हो या महिला उन्हें आर्थिक रूप से संपन्न जरूर होना चाहिए। नारी शक्ति और स्वाभिमान का एहसास कराती है। हर मां अपनी बेटी पर भरोसा करे, उन पर गर्व क रे।
1- महिलाओं की स्थिति में पहले से अब में बदलाव हुआ है, इस बदलाव को कायम रखते हुए उनमें नेतृत्व का गुण विकसित कर सशक्त, स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बनना होगा। -ममता मौर्या, नई सुबह एक उम्मीद
2- महिलाएं किसी से कम नहीं हैं, वो खुद इतनी सक्षम हैं कि अवसर मिलने पर अपने हुनर से आत्मनिर्भर बन सकती हैं। महिला व पुरुष दोनों कि मानसिकता में बदलाव जरूरी है। -नमिता सिंह, सेविका दिव्यांगजन ट्रस्ट
3- हर लड़की और महिला में खास बात होती है, जो उन्हें दूसरों से अलग करती है। नारी सशक्तीकरण तभी होगा जब एक नारी आर्थिक तौर पर सशक्त हो, इससे उनमें आत्मविश्वास पैदा होगा। -तुलिका, उद्यमी महिला
4- बेटियों को बोझ न समझ कर हम उन्हें शिक्षित करें तो वह दो परिवारों को शिक्षित कर सकती हैं। माताएं अपनी बेटियों को जागरूक करें। ताकि वे शिक्षा की ओर कदम बढ़ाएं। -साक्षी सिंह, विकास एवं शिक्षण समिति
5- समानता का भाव घर से पैदा होता है, महिलाओं से समानता के लिए बचपन से ही संस्कार दिए जाने चाहिए। मां-बाप को ही बच्चों में भेदभाव को समाप्त करना चाहिए।- कविता मालवीय, पन्ना ध्याय स्मृति सेवा न्यास
6- समाज में नारी शिक्षा का स्तर बढ़ाने की जरूरत है। घर की महिलाएं ही गलत के खिलाफ आवाज नहीं उठातीं, अपने बेटे के साथ बेटियों के फैसलों में भी उसके साथ खड़े रहें।- नमिता तिवारी, संस्कार ब्राह्मण महिला संगठन
7- कामकाजी महिलाओं को पुरुषवादी मानसिकता से संघर्ष करना पड़ता है। फिर भी लड़कियां हर क्षेत्र में आगे आ रही हैं। लड़कियों को अपने निर्णय खुद लेने की आजादी दें।- सीमा गौड़, अविरल गंगा स्पोर्ट्स सोसाइटी
8- आज भी तमाम महिलाएं एनीमिया का शिकार हैं, क्योंकि उनकी शादी जल्द कर दी जाती है। हम शिक्षा के जरिए ही बड़ी संख्या में हो रही प्रसव के दौरान मौतों को रोक सकते है।- अनिता मौया, नर्सिंग ऑफिसर
9- बेटी बोझ नहीं वरदान है। अगर हम बेटियों को शिक्षित करते हैं तो वे खुद को संभालने के साथ दूसरे परिवार की भी परवरिश ढंग से कर सकती हैं। सही मायने में वही सशक्तिकरण होगा। अमिता शर्मा, नर्सिंग ऑफिसर
10- सही मायने में नारी के प्रति सोच में बदलाव तभी होगा, जब हम इसकी शुरुआत अपने घर से ही करें। बेटियों को संस्कारवान बनाने के साथ हम बेटों को महिलाओं का सम्मान करने का संस्कार दें।- प्रियंका अग्निहोत्री, कवियित्री
11- समाज की महिलाओं के प्रति सोच तो बदली है, लेकिन हम सबको मिलकर उनके हक के लिए आगे आकर काम करना होगा। ताकि जो महिलाएं जागरूक नहीं है, उन्हें मौका मिले।- पुष्पा अवस्थी, संस्कार प्रभा फाउंडेशन
12- महिलाओं के लिए सरकार की ओर से कई योजनाएं बनाई जाती हैं। लेकिन सही तरह से क्रियान्वयन नहीं हो पाता। जिससे वो योजनाएं उन लोगों तक नहीं पहुंच पाती जिन्हें जरूरत है।- संस्कृता कुंवर, विकास एवं शिक्षण समिति
13- माता-पिता अपने बच्चियों की शिक्षा की प्रति जागरूक नहीं है, ऐसे लोगों की सोच बदलनी होगी। इसके लिए समाज को एकजुट होकर कार्य करना होगा, तभी बदलाव संभव है।- ऋतु राज, विकास एवं शिक्षण समिति
14- बेटियां हो या महिलाएं आत्मनिर्भर हों तो रोजगार पाकर खुद ही सशक्त हो सकती हैं। उन्हें शिक्षा व आर्थिक रूप से सबलता प्रदान की जाए तो उनमें आत्मविश्वास जागृत होगा।- सोनल वर्मा, विकास एवं शिक्षण समिति