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45 करोड़ बच्चों के लिए 45 हजार पुस्तकें भी नहीं
वाराण्ासी, ब्यूरो
Updated Tue, 03 Feb 2015 02:34 AM IST
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वाराणसी। कथाकार प्रो. काशीनाथ सिंह ने कहा कि बाल साहित्य लिखना सहज नहीं। कहा, जो बच्चों के लिए लिखा जाए, जिसमें बच्चे हों, वही बाल साहित्य है। महज बच्चों के नाम पर कुछ भी लिख देना बाल साहित्य नहीं।
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कला संकाय बीएचयू के राधाकृष्णन सभागार में आयोजित ‘21वीं सदी की चुनौतियां : बाल साहित्य की संभावनाएं’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि प्रो. सिंह ने ये बातें कहीं। साहित्यकार डा. मानस रंजन महापात्र ने कहा कि 45 करोड़ बच्चों के इस देश में 45 हजार भी स्तरीय पुस्तकें नहीं हैं।
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बाल साहित्यकार प्रो. दिविक रमेश ने बाल साहित्य को रुचिकर बनाने के साथ-साथ साहित्यकारों को बच्चों के लिए बेहतर साहित्य रचने पर जोर दिया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता पूर्व संकाय प्रमुख प्रो. एमएन राय ने की।
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इस अवसर पर बाल साहित्यकार डा. श्रीप्रसाद पर केंद्रित पत्रिका ‘बाल वाटिका‘ का विमोचन किया गया। स्वागत हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. बलिराज पांडेय ने किया। संचालन संयोजक प्रो. वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी ने और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. श्रद्धा सिंह ने किया।
द्वितीय सत्र में बाल साहित्य में डा. श्रीप्रसाद के दिए गए योगदान पर चर्चा की गई। प्रो. अवधेश प्रधान ने डा. श्रीप्रसाद से जुड़े संस्मरण सुनाएं। डा. राष्ट्रबंधु ने कहा कि डा. प्रसाद की रचनाएं बेहद जीवंत हैं। इस अवसर पर प्रो. श्रीनिवास पांडेय, अमिताभ शंकर राय, डा. प्रत्युश गुलेरी, प्रो. श्रद्धानंद, प्रो. रामसुधार सिंह, सलीम राजा, प्रो. आनंदवर्धन, डा. नीरज खरे आदि मौजूद रहे।