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साफ होगा गंदा पानी: आईआईटी बीएचयू के वैज्ञानिक ने खोजी शैवाल की दो नई प्रजातियां, ईंधनों पर कम होगी निर्भरता

Wed, 07 Aug 2024 11:20 AM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Wed, 07 Aug 2024 11:20 AM IST
सार

Varanasi News: शोध में देखने को मिला कि यह नदियों और अन्य जल स्रोतों में प्रदूषण को रोकने के लिए भी महत्वपूर्ण है, जिससे पर्यावरण स्वस्थ होता है। शोधन के बाद का पानी खेती, सिंचाई या अन्य कार्यों में उपयोग में लाया जा सकता है। इस प्रणाली को लागू कर, नगरपालिकाएं और उद्योग अपशिष्ट जल प्रबंधन को महत्वपूर्ण रूप से सुधार कर सकते हैं। इससे जनस्वास्थ्य और पर्यावरणीय स्थिरता बेहतर हो सकती है।

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IIT BHU scientist discovered two new species of algae Dirty water will cleaned dependence on fuels reduced
आईआईटी बीएचयू में शोध करने वाली टीम। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आईआईटी बीएचयू के शोधकर्ताओं ने गंगा में माइक्रोएल्गी सूक्ष्म शैवाल की दो नई नस्ल की खोज की है। इसकी मदद से शहरी अपशिष्ट जल को शुद्ध करने का काम किया जा सकता है। इसे देख एक नई प्रक्रिया विकसित की गई है। साथ ही यह बायोमास उत्पन्न करने में भी सहायक होंगे। 

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स्कूल ऑफ बायो केमिकल इंजीनियरिंग के सहायक प्रोफेसर डॉ. विशाल मिश्रा ने शोध छात्र विशाल सिंह के साथ जल शुद्ध करने की नई प्रणाली विकसित की है।

सूक्ष्म शैवाल से जल शोधन विधि में प्राथमिक, द्वितीयक और सूक्ष्मशैवाल-आधारित तृतीयक शोधन को एक सतत प्रणाली में एकीकृत किया गया है। यह प्रणाली न केवल गंदे जल को साफ करती है, बल्कि मूल्यवान सूक्ष्म शैवाल बायोमास भी उत्पन्न करती है।
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यह पानी के केमिकल को भी सोख सकती है। इसका उपयोग बायोफ्यूल, प्रोटीन सप्लीमेंट, और पशु चारे के रूप में भी किया जा सकता है। डॉ. विशाल ने बताया कि यह प्रक्रिया आर्थिक रूप से भी लाभदायक है। इस शोध को भारत सरकार की ओर से पेटेंट भी मिला है। 
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शोध टीम ने रविदास घाट के पास गंगा नदी से कई शैवाल के सैंपल लिए। उनमें से दो नई नस्ल की माइक्रो एल्गी सूक्ष्म शैवाल की खोज की गई। इसका नाम च्लोरेला सोरकीनिया और टेट्राडेसमस आर्निकोला रखा गया है। नामों का पंजीकरण यूएसए के नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इनफार्मेशन में भी किया गया है। 

उत्पादित सूक्ष्म शैवाल बायोमास का उपयोग बायोफ्यूल उत्पन्न करने के लिए किया जा सकता है, जिससे परंपरागत ईंधनों पर निर्भरता कम होती है और एक स्थायी ऊर्जा स्रोत मिलता है।

पानी से हानिकारक तत्वों को भी निकाला जा सकेगा
डॉ. विशाल मिश्रा ने बताया कि यह उन्नत जल शोधन प्रणाली आम लोगों के लिए विशेष रूप से फायदेमंद है। अपशिष्ट जल से हानिकारक तत्वों जैसे अमोनियम, नाइट्रोजन और पॉस्फेट को प्रभावी रूप से हटाकर जल को स्वच्छ बनाती है। 
 

क्या है बायोमास
डॉ. विशाल का कहना है कि बायोमास वह ईंधन है जो जीवित जीवों के जैविक अपशिष्ट पदार्थों जैसे पौधों के अपशिष्ट, पशुओं के अपशिष्ट, वन अपशिष्ट, और नगरपालिका के अपशिष्ट से विकसित किया जाता है। जैविक शब्दावली में, बायोमास शब्द का अर्थ जैविक पौध पदार्थ है, जिसे ईंधन में परिवर्तित किया जाता है और ऊर्जा स्रोत के रूप में उपयोग किया जाता है।

कैसे काम करती है जल शोधन विधि
डॉ. विशाल मिश्रा ने बताया की जल शोधन विधि में प्राथमिक, द्वितीयक और सूक्ष्मशैवाल-आधारित तृतीयक शोधन को एक सतत प्रणाली में एकीकृत किया जाता है। अपशिष्ट जल को पहले एक कंटेनर में रखा जाता है। जब उस कंटेनर में गंदगी अपने आप नीचे बैठ जाएगी, उसके बाद दूसरे चरण में मैकेनिकल प्रक्रिया की जाएगी, इसमें पानी को मशीन द्वारा मिलाया जाएगा, इस प्रक्रिया से गंदगी के सूक्ष्म कण आपस में जुड़कर फिर नीचे बैठ जाएंगे। 

अब जो जल बचा है उसमें हानिकारक केमिकल जैसे अमोनियम, नाइट्रोजन और पॉस्फोरस घुला रहता है। तीसरे और अंतिम चरण में सूक्ष्मशैवाल-आधारित शोधन प्रक्रिया आरंभ होती है। यह शैवाल हानिकारक केमिकल सोख लेती हैं।

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