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IIT BHU: इको फ्रेंडली तकनीक से कार्बन, सिलिकॉन और सल्फर का उत्सर्जन नहीं; रिफाइनिंग की जरूरत घटेगी

Thu, 05 Feb 2026 11:06 AM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Thu, 05 Feb 2026 11:06 AM IST
सार

Varanasi News: वर्तमान में उपलब्ध अयस्कों में लौह की मात्रा कम और अशुद्धियां ज्यादा होती हैं। इनमें निकेल और क्रोमियम जैसे उपयोगी धातु तत्व भी होते हैं। पहले लौह अयस्क के सूक्ष्म कणों को पेलेट्स (छोटे गोलाकार कण) के रूप में तैयार किया जाता है। 

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IIT BHU Eco-friendly technology eliminates carbon silicon sulfur emissions reduces need for refining
IIT BHU - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

IIT BHU: आईआईटी बीएचयू के वैज्ञानिकों ने लोहे के अयस्कों से धातुओं को निकालने की इको फ्रेंडली तकनीक खोजी है। ये तकनीक न के बराबर ग्रीन हाउस गैस कार्बन, सिलिकॉन और सल्फर का उत्सर्जन करती है। इसमें कोयले की जगह हाइड्रोजन गैस का इस्तेमाल किया जाता है।

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हाइड्रोजन धातु में अशुद्धियां डाले बिना लोहे को बाहर निकालता है और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को शून्य तक ले आता है। इससे शोधन (रिफाइनिंग) की जरूरत भी कम हो जाती है। इस तकनीक से 97–97.5 फीसदी लोहा, 0.7–0.8 फीसदी निकेल और एक फीसदी क्रोमियम की मात्रा पाई जाती है। 
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आईआईटी बीएचयू में धातुकर्म अभियांत्रिकी विभाग के प्रो. गिरिजा शंकर महोबिया के नेतृत्व में डॉ. बिस्वजीत मिश्रा और डॉ. लक्कोजू शंकर राव ने ये तकनीक विकसित की है। प्रो. महोबिया ने बताया कि यह कार्य एक पीएचडी शोध के रूप में शुरू हुआ था, जिसने धीरे-धीरे एक व्यावहारिक और उपयोगी तकनीक का रूप ले लिया। इसका उद्देश्य स्वच्छ धातु का उत्पादन करना, मूल्यवान तत्वों की हानि को रोकना और पर्यावरणीय क्षति को कम से कम करना था। 

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अयस्कों में लौह की मात्रा कम और अशुद्धियां ज्यादा
पारंपरिक लौह निर्माण प्रक्रिया वैश्विक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में लगभग 7-8 फीसदी का योगदान देती है। कोयला आधारित प्रक्रियाओं से प्रति टन इस्पात उत्पादन पर लगभग 2 टन कार्बन उत्सर्जित होता है। 

इसके बाद इन पेलेट्स को वातावरण में हाइड्रोजन गैस के संपर्क में लाया जाता है। इससे अयस्क से ऑक्सीजन हट जाती है और शुरू लोहा प्राप्त हो जाता है। फिर गर्म करने पर धातु और अपशिष्ट (स्लैग) अपने-आप अलग हो जाते हैं और छोटे-छोटे शुद्ध धातु के नगेट्स बनते हैं। 

इको फ्रेंडली और उपयोगी तकनीक के विकास की दिशा में काम चल रहा है। यह नई हाइड्रोजन-आधारित तकनीक कम प्रदूषण, कम ऊर्जा खपत और संसाधनों के बेहतर उपयोग की दिशा में एक बड़ा कदम है। - प्रो. अमित पात्रा, निदेशक, आईआईटी बीएचयू

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