आईआईटी बीएचयू: दवा बेचते पिता की बेटी को मिले 12 मेडल, मेघालय की टपिका ने बनाया बायो सेंसर; संघर्ष की कहानी
आईआईटी बीएचयू के दीक्षांत समारोह में मेधावियों की अलग - अलग सफलता की कहानियां सामने आईं। इनमें किसी ने शोध से पहचान बनाई, किसी ने बड़ा पैकेज छोड़ा। वहीं दवा बेचते पिता की बेटी को सबसे ज्यादा 12 मेडल मिले।
विस्तार
आईआईटी बीएचयू से बीटेक, एमटेक और पीएचडी की डिग्रियां पाने के बाद कोई वैज्ञानिक बनकर बायो सेंसर बना रहा तो कोई बड़ा पैकेज छोड़ एसएससी सीजेएल परीक्षा देने में जुट गया है। कुछ यूपीएससी कर आईएएस बनने की तैयारी पर निकल पड़े हैं। बाकी सिर्फ नौकरीपेशा ही बने रहकर देश को सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री में अग्रणी बनाने का सपना देख रहा है।
जिस छात्रा को सबसे ज्यादा 12 मेडल मिले उसके पिता दवा बेचते हैं और मां घरों में ट्यूशन पढ़ाती हैं। इसी तरह से एक कहानी मेघालय से मां, भाई और बहन के साथ पीएचडी डिग्री लेने आई बायोकेमिकल की पीएचडी छात्रा टपिका की है, जिसने पांच बड़े खोज किए। बताया कि पिछले पांच साल आईआईटी में रहकर उन्होंने पांच खोजें कीं, जिसे पेटेंट भी मिल चुका है।
पर्यावरण के जहरीले तत्वों और बीमारियों को खत्म करने के लिए बायो सेंसर बनाया है। वहीं अब मेघालय के नॉर्थ ईस्ट इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमेडिकल इंजीनियरिंग संस्थान में असिस्टेंट प्रोफेसर हो चुकी हैं। मां लोमलांग लुखार ने कहा, पिता साथ में नहीं थे तो पढ़ाई की जिम्मेदारी मेरे पर आ गई। मैंने अपनी बेटी को पढ़ाने की परमिशन दे दी। अब बिटिया वापस घर के पास ही पढ़ा रही है।
पढ़ाई के दौरान कभी कुछ अतिरिक्त नहीं पढ़ा : हरजस कौर
हरजस कौर ने कहा कि पिता की दवा की दुकान है। मां घरों में ट्यूशन पढ़ाती हैं। भाई पढ़ाई करते हुए मेरी बहुत मदद किया। मेरी तैयारी का आधार मेरे माता-पिता ने ही बनाया था। उसके बाद शिक्षकों और दोस्तों ने मदद की। वर्तमान में नौकरी कर रही हूं। पढ़ाई के दौरान कभी कुछ अतिरिक्त नहीं पढ़ा। इस चक्कर में पड़ी ही नहीं कि इतना पढ़ना है क्योंकि उससे आप पढ़ाई के काफी अंदर चले जाओगे जहां से निकलना संभव नहीं।
डायरेक्टर्स गोल्ड मेडल पाऊंगा कभी सोचा ही नहीं था। मैंने तो सिर्फ प्रोफेसर्स को फॉलो किया है। मेरे पिता भी एक प्रोफेसर हैं और जब भी कुछ दिक्कत होती थी वो हमेशा मुझसे कहते थे अपने दिल को फॉलो करो। जो मिल रहा भगवान की देन है। 30 साल की उम्र के बाद पीएचडी करूंगा। वर्तमान में एनालिस्ट के तौर पर नौकरी कर रहा। वहीं अगले दो साल में सरकारी नौकरी को क्रैक करूं। -मेहुल कुमार राजकुमार
गूगल में सॉफ्टवेयर इंजीनियर, भारत की तरक्की करूंगा नौकरी
डायरेक्टर्स गोल्ड मेडल पाकर पूरा परिवार बहुत खुश है। फिलहाल गूगल में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर काम करना भी अलग अनुभव है जो कि काशी के घाटों से बिल्कुल अलग है, लेकिन उससे अच्छा नहीं। हमें सॉफ्टवेयर के ही फील्ड में कुछ तरक्की करनी है, जिसमें भारत का भी विकास हो। - प्रतीक त्रिपाठी, बीटेक
सात गोल्ड और दो कैश प्राइज मिला। हापुड़ से हूं। परिवार में सभी बिजनेस बैकग्राउंड से हैं। पढ़ाई में मैंने ही सबसे पहले परीक्षा पास किया और अब पूरे घर के लोग पढ़ाई के लिए सीरियस हो गए। काशी में केमिकल इंजीनियरिंग में बीटेक के दौरान बहुत से दोस्त मिले जो अब छूट रहे हैं। फिलहाल नौकरी लग चुकी है तो इसी में अच्छा लगने लगा है। -तनिशा अग्रवाल, बीटेक
काम के घंटे नहीं, क्वालिटी देखी जाती है
मैकेनिकल इंजीनियरिंग से बीटेक में टॉप कर पांच गोल्ड मेडल जीतना बहुत उत्साहित कर रहा है। मीशो कंपनी में प्लेसमेंट हो चुका है और वहां काम के कोई घंंटे नहीं गिनते, प्रोजेक्ट और क्वालिटी के आधार पर काम करना होता है। अब लंबे समय तक नौकरी में ही रहूंगा। आगे का नहीं सोचा है। पिता का हाथरस में कपड़े का बिजनेस है। मध्यमवर्गीय परिवार से उठकर यहां तक का सफर पूरा किया है। -जतिन अग्रवाल, बीटेक
तमिलनाडु में डेटा साइंटिस्ट
फार्मास्यूटिकल इंजीनियरिंग विभाग से आईडीडी की उपाधि लेने तमिलनाडु से आई। पद्मनाभपुर में डेटा साइंटिस्ट के तौर पर सेवाएं दे रहीं हूं। पिता की प्राइवेट नौकरी है और मां गृहिणी हैं। -रत्ना के आईडीडी
पश्चिम बंगाल के मालदा में घर है। सिरेमिक इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर काशी में गोल्ड मेडल किसी सपने के पूरा होने से कम नहीं है। अब बंगलूरू में ब्लैकफॉर्म कंपनी में काम रहा हूं। जॉब पर फोकस्ड हूं। पिता एनटीपीसी में सिविल कॉन्ट्रैक्टर हैं। -स्पंदन धर, एमटेक
मटेरियल साइंस एंड टेक्नोलॉजी में कोर्स पूरा करने के बाद रिसर्च असिस्टेंट बन गया हूं और सेमी कंडक्टर डिवाइस पर काम शुरू कर दिया है। हमारे भारत इस क्षेत्र में तेजी से आगे जा रहा है जिसमें मैं भी अपना योगदान देना चाहता हूं। घर मुंबई में है और पिता टाटा पॉवर में कार्यरत हैं। -धनंजय जे नायर, आईडीडी
सौर ऊर्जा से बनी बिजली कम नुकसान के साथ होगी इस्तेमाल
सौर ऊर्जा से बनी बिजली को कम से कम ऊर्जा नुकसान के साथ इस्तेमाल योग्य बनाया हूं। इसलिए पहली बार सोलर एनर्जी के लिए ग्रीन एनर्जी मेडल, कैश प्राइज और स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया। मध्य प्रदेश का रहने वाला हूं। पावर इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में रिसर्च किया है। सौर ऊर्जा और नवीकरणीय ऊर्जा के लिए ज्यादा दक्ष और सुरक्षित बिजली बनाने का सिस्टम विकसित कर चुका हूं। हाई-गेन डीसी-डीसी पावर कन्वर्टर और मल्टी-आउटपुट हाइब्रिड कन्वर्टर तैयार किया है। इसमें सौर ऊर्जा से बनी बिजली को कम से कम ऊर्जा नुकसान के साथ इस्तेमाल योग्य बनाना है। -प्रखर नेमा, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग