मानवाधिकारवादी चिंतक चितरंजन सिंह का निधन, पैतृक आवास में ली अंतिम सांस
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पीयूसीएल (लोक स्वातंत्रय संगठन) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और देश के जानेमाने मानवाधिकारवादी चिंतक चितरंजन सिंह का शुक्रवार को निधन हो गया। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे। 21 जून को तबीयत अत्यधिक खराब होने पर उन्हें वाराणसी के बीएचयू स्थित सर सुंदरलाल चिकित्सालय में भर्ती कराया गया था। बाद में चिकित्सकों ने उन्हें घर ले जाने की सलाह दी थी।
तब से उनका सुल्तानपुर गांव स्थित पैतृक आवास पर इलाज चल रहा था। चितरंजन सिंह के छोटे भाई वरिष्ठ पत्रकार मनोरंजन सिंह ने बताया कि शुक्रवार शाम को उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की सूचना जैसे ही फैली, लोगों में शोक की लहर दौड़ गई।
उनके आवास पर लोगों के आने का तांता लग गया। वे अपने पीछे छोटे भाई मनोरंजन सिंह, उनके पुत्र प्रशांत रंजन, उत्सव रंजन और पुत्री शृंखला रंजन समेत भरापूरा परिवार छोड़ गए हैं। 24 जून को जिलाधिकारी श्रीहरि प्रताप शाही ने उनके गांव जा कर उनका हालचाल लिया था। उन्होंने मनोरंजन सिंह से उनकी बीमारी को लेकर लंबी बातचीत की थी।
संघर्ष में आडे़ नहीं आए व्यक्तिगत रिश्ते
मानवाधिकार के मुद्दों पर संघर्ष करते समय चितरंजन सिंह ने व्यक्तिगत संबंधों को भी आड़े नहीं आने दिया। आम इंसान के हक की लड़ाई के दौरान यदि कोई अपना सगा भी सामने खड़ा हो तो चितरंजन सिंह ने इसकी परवाह नहीं की। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर से उनके बेहद गहरे रिश्ते थे।
लेकिन आम आदमी की बात करते समय वे चंद्रशेखर के विपरीत बोलने से भी परहेज नहीं करते थे। एक कार्यक्त्रस्म की याद करते हुए अखिलेश सिन्हा कहते हैं, एक बार मंच पर चंद्रशेखर जी बैठे थे और चितरंजन सिंह बोल रहे थे। अस्पताल की बदहाली का जिक्त्रस् करते हुए उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री को भी नहीं बख्शा था। चंद्रशेखर जी ने भी कभी इसका बुरा नहीं माना और दोनों का संबंध प्रगाढ़ बना रहा।
मानवाधिकार की लड़ाई में खपा दिया पूरा जीवन
मानवाधिकारवादी नेता चितरंजन सिंह के निधन से जिले के लोगों को गहरा धक्का लगा है। चितरंजन जी मानवाधिकार के लिए आजीवन संघर्ष करते रहे। देश में जहां कहीं भी कानून का शासन खतरे में होता था, वे वहां पहुंच जाते थे। उत्तर प्रदेश में राज्य मानवाधिकार के गठन में उनकी भूमिका प्रमुख रही।
बलिया में भूख से मनकिया की मौत का मामला हो या कहीं भी फर्जी मुठभेड़, चितरंजन इसके खिलाफ चट्टान की तरह खड़े नजर आए। देश व प्रदेश में जहां कहीं इस तरह की घटनाएं होती थीं, वे अपनी टीम के साथ पहुंचकर बारीकी से जांच करते थे और कार्रवाई कराने के लिए तत्पर रहते थे।
चितरंजन सिंह लोकनारायण जयप्रकाश नारायण द्वारा स्थापित मानवाधिकार संगठन ‘पीयूसीएल’ से आजीवन जुड़े रहे। वे पीयूसीएल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व यूपी के अध्यक्ष थे। आम आदमी के हक तथा शोषितों, पीड़ितों के न्याय के लिए संघर्ष करने वाले चितरंजन सिंह को कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनके साथ काम कर चुके अखिलेश सिन्हा कहते हैं, चितरंजन सिंह के निधन से साम्राज्यवाद के विरूद्ध संघर्ष करने वाले योद्धा का अंत हो गया।
चंद्रशेखर के बाद मैंने अपना दूसरा अभिभावक भी खो दिया : वीरेंद्र सिंह मस्त
सांसद वीरेंद्र सिंह मस्त ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बाद आज मैंने अपना दूसरा अभिभावक भी खो दिया। चितरंजन जी उन लोगों में थे जो गरीबों की आवाज सुनते ही अपनी सारी पीड़ा भूल जाते थे। गरीबों की लड़ाई के लिए वे जीवन भर आंदोलन करते रहे।
सही मायनों में चितरंजन सिंह जन आंदोलन का दूसरा रूप थे। पिछले चुनाव के दौरान भी जब देश में मोदी की लहर थी मैं चितरंजन जी से कई बार मिला और हर बार उन्होंने यही कहा कि इस बार तुम्हारा चंद्रशेखर का उत्तराधिकारी बनना तय है। हुआ भी वही मैं बलिया सदर से सांसद चुना गया।