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Holi: रंगभरी एकादशी पर हरिश्चंद्र, 28 को मणिकर्णिका पर होगी मसाने की होली; आयोजकों ने कही ये बात

Thu, 26 Feb 2026 06:38 AM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Thu, 26 Feb 2026 06:38 AM IST
सार

Varanasi News: काशी में मसाने की होली को लेकर अब दो पक्ष बन चुके हैं। इस बीच, आयोजन समिति के लोगों ने पत्रकारवार्ता कर कहा कि इस बार भी चिता भस्म की होली होगी। हर वर्ष इसका इंतजार हजारों लोग करते हैं।

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Holi Harishchandra on Rangbhari Ekadashi crematorium on Manikarnika on 28 february
गुलशन कपूर। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

Varanasi News: अघोर पीठ के पीठाधीश्वर औघड़ कपाली बाबा ने कहा कि काशी की धार्मिक परंपराओं में मसाने की होली है। इसके बिना कोई सनातनी होली नहीं मनाता है। होलिका दहन के बाद ही हम होली मनाते हैं। होलिका की चिता से ही तो हम होली की शुरुआत करते हैं। जबकि अघोर परंपरा के अनुयायी भगवान शिव के उपासक होते हैं और वह चिता भस्म के साथ होली खेलते हैं। इसलिए इसे परंपरा से अलग नहीं कर सकते हैं।

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इस बार भी चिता भस्त की होली होगी। 27 फरवरी को हरिश्चंद्र घाट और 28 फरवरी को मणिकर्णिका घाट पर परंपरागत ढंग से मसाने की होली खेली जाएगी। इसको लेकर प्रशासन से वार्ता हुई है। व्यवस्थित तरीके से आयोजन होगा।

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तैयारियां तेज

हरिश्चंद्र घाट पर बुधवार को कपाली बाबा और मणिकर्णिका घाट पर चिता भस्म की होली के आयोजक गुलशन कपूर ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि मसाने की होली को विरोध की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। हर किसी को अपने मत देने का हक है। श्रीकाशी विद्वत परिषद के मत का हम खंडन नहीं कर सकते हैं। मगर, यह कहना कि मसाने की होली की परंपरा नहीं है। मथुरा में लट्ठमार, ब्रज में लड्डू से होली खेली जाती है। ऐसे ही काशी में मसाने की होली खेली जाती है। 

अब इसका स्वरूप विराट हुआ है तो इसे सिरे से खारिज कर देना कि यह होता ही नहीं है, गलत है। कपाली बाबा ने कहा कि बिना होलिका के होली हो ही नहीं सकती है। अघोर परंपरा के लोग शिव के उपासक हैं। उनके लिए मसाने की होली खास होती है। दोनों घाटों पर पालकी यात्रा निकाली जाएगी। दोपहर में बाबा मसाननाथ के अभिषेक और आरती के बाद भस्म की होली होगी।

350 वर्षों पहले शैव संन्यासियों ने की थी शुरू

कपाली बाबा ने बताया कि प्राप्त पारंपरिक साक्ष्यों के अनुसार, मसाने की होली संगठित एवं उत्सवी स्वरूप में करीब 350 वर्षों पूर्व बाबा कालभैरव के तत्कालीन पीठाधिपति अघोरी उमानाथ, बाबा कीनाराम महाराज के प्रधान शिष्य बाबा बीजाराम और नाथ परंपरा के प्रसिद्ध संत योगी दीनानाथ के संयोजन में मसाने की होली शुरू हुई थी। इनका उल्लेख परंपरागत प्रपत्रों एवं स्थानीय इतिहासकारों के अभिलेखों से प्राप्त होता है।

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