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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   Holi 2024 seven colors of Kashi make Holi of Banaras most unique in world

काशी के ये सात रंग: धर्म, गंगा, घाट, मिठास, संगीत, साहित्य और शिक्षा; सबसे अलग है बनारस की होली का रंग

Mon, 25 Mar 2024 08:03 AM IST
प्रगति चंद अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: प्रगति चंद Updated Mon, 25 Mar 2024 08:03 AM IST
सार

Holi 2024 : होली पर हम आपके लिए लेकर आए हैं काशी के सात रंग। काशी की होली देश-दुनिया में सबसे जुदा है। यहां रंगभरी एकादशी पर बाबा विश्वनाथ को गुलाल अर्पित कर होली खेलने की अनुमति ली जाती है। इसके बाद से ही बनारस में होली का हुड़दंग शुरू हो जाता है। 

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Holi 2024 seven colors of Kashi make Holi of Banaras most unique in world
काशी विश्वनाथ धाम - फोटो : नीरज कुमार

विस्तार

रंग, भंग और होली की तरंग। गंगा, घाट और गलियां। बाबा विश्वनाथ, मां गौरा और उनके गण। बनारस की होली का रंग देश और दुनिया में सबसे जुदा है। रंगभरी पर दूल्हा बने भूतभावन शिव से होली के हुड़दंग की अनुमति के बाद काशी में फाग का रंग शुरू हो जाता है। सतरंगी रंगों के बीच काशी का भी अपना अलग ही रंग है। 

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धर्म : 33 कोटि देवी-देवताओं के हैं 10 हजार से अधिक मंदिर
कण-कण शंकर की काशी को मंदिरों का शहर यूं ही नहीं कहा जाता है। देश का इकलौता शहर है जहां भगवान और भक्त दोनों के मंदिर स्वर्णमंडित हैं। श्री काशी विश्वनाथ, संत रविदास मंदिर और खाटू श्याम के स्वर्ण मंडित मंदिर के अलावा 33 कोटि देवी-देवताओं के मंदिरों की संख्या 10 हजार से अधिक है। मान्यता है कि भगवान शिव के त्रिशूल पर बसी काशी देवाधिदेव महादेव को अत्यंत प्रिय है। इसीलिए यह धर्म, कर्म और मोक्ष की नगरी कही जाती है। काशी को यह गौरव प्राप्त है कि यह नगरी विद्या, साधना और कला तीनों का केंद्र रही है।

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गंगा : काशी में ही उत्तरवाहिनी है गंगा का प्रवाह

काशी में ही गंगा उत्तरवाहिनी होकर प्रवाहमान हैं। अस्सी से राजघाट के बीच गंगा तीर्थ-पुरोहितों, मल्लाहों और किसानों के लिए जीवन रेखा के समान हैं तो मुक्ति की कामना करने वालों के लिए मुक्तिदायिनी हैं। वैज्ञानिक बात करें तो यह गंगा का सबसे अहम गुण है कि जिसके कारण गंगा काशी में प्रवेश करने से पहले गंगा के प्रवाह से पानी में घुली हुई मिट्टी और बालू अलग हो जाती है। मां गंगा बालू को पूर्वी तट पर पसारती हैं और पश्चिमी तट पर मिट्टी। काशी में गंगा एक ओर मुक्ति, तो वहीं साथ में नवजीवन के बीज भी प्रदान करती हैं। घाटों पर होने वाली गंगा आरती भी वैश्विक स्वरूप ले चुकी है।

घाट: शहर को अर्धचंद्राकार स्वरूप देते हैं काशी के घाट
गंगा के मुहाने पर बसी काशी की छटा को यहां के 84 से अधिक घाट अर्द्धचंद्राकार स्वरूप प्रदान करते हैं। सूर्योदय के समय इन घाटों की छटा देखते बनती है। सबसे महत्वपूर्ण घाट दशाश्वमेध घाट है। इस घाट को सर्वप्रथम बाजीराव पेशवा ने बनवाया। यह घाट पंचतीर्थों में एक है। मणिकर्णिका घाट पर मणिकर्णिका कुंड है जो कि गंगा से पूर्व यहां पर था। मान्यता है कि यहां चिता कभी नहीं बुझती। हरिश्चंद्र घाट पर महाराज हरिश्चंद्र की सत्य परीक्षा हुई थी। तुलसी घाट पर गोस्वामी तुलसी दास ने रामचरित मानस के कई अंशों की रचना की थी। नगर के दक्षिण छोर पर स्थित अस्सी घाट पर कभी गंगा और असि नदी का संगम हुआ करता था। पुराणों के अनुसार पंचगंगा घाट पर गंगा, यमुना, सरस्वती, किरण व धूतपाया नदियों का गुप्त संगम होता है।

मिठास: चीनी के बताशे से मलाई गिलौरी है लाजवाब
बनारस अपने स्वाद के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। मिठाइयों की जितनी वैराइटी यहां मिलती है, उतनी कहीं नहीं। चीनी के बताशे और गट्टे से लेकर मलाई गिलौरी तक लगभग दो हजार से अधिक किस्मों की मिठाइयां सिर्फ बनारस के बाजार में आपको मिलेंगी। मलाई गिलौरी, मलाई पूड़ी, मलाई खीर, सोंठ व गोंद के लड्डू, कादंबरी, कृष्णप्रिया, रसप्रिया, रसमाधुरी, रसमलाई, करण शाही, काजू बर्फी, केसर पट, केसर लड्डू वगैरह की गिनती विशिष्ट श्रेणी में है। इमरती, बालूशाही, गुझिया, सोन पपड़ी, मंसूर घेवर, मगदल का तो जवाब नहीं। केसर के बघार वाली चंद्र पाग जैसी मिठाइयां विशिष्ट श्रेणी में शामिल हैं। गरम-गरम कचौड़ियों के साथ जलेबी बनारस में सुबह का नाश्ता है।

संगीत : बनारस की गलियों से निकलकर सात समंदर पार पहुंचा संगीत

संगीत की दुनिया में बनारस घराने की अलग पहचान है। गायन, वादन और नृत्य की तीनों विधाएं बनारस घराने में समाहित हैं। बनारस घराना चार पट की गायिकी के लिए प्रसिद्ध रहा है। इस घराने के गायक ध्रुपद-धमार, ख्याल, ठुमरी व ठप्पा चारों में महारत रखते रहे हैं। बनारस की पद्मगली तो दुनिया भर में मशहूर है। इसमें पद्मविभूषण पंडित किशन महाराज, पद्मभूषण सांता प्रसाद मिश्र, पद्मश्री सितारा देवी सहित कई बड़े नाम हैं। शहनाई के उस्ताद भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां और गिरिजा देवी ने दुनिया भर में बनारस के संगीत को पहुंचाया था। सितार वादक पं. रविशंकर के साथ बनारस के संगीत ने सात समंदर पार का सफर शुरू किया।

साहित्य: हिंदी साहित्य का गढ़ रही है काशी
चाहे भक्ति काल हो या आधुनिक काल हिंदी साहित्य का गढ़ काशी रही है। कबीरदास, रैदास, तुलसीदास से लेकर आधुनिक युग के भारतेंदु हरिश्चंद्र, कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद्र, जयशंकर प्रसाद ने काशी के साहित्य को समृद्ध किया। काशी के घाट पर महाकाव्य की रचना करने वाले तुलसीदास ने काशी में ज्ञान और भक्ति की धारा बहाई। 

नागरी प्रचारिणी सभा ने हिंदी आंदोलन का गढ़ बनाया। महामना मदन मोहन मालवीय हिंदी साहित्य सम्मेलन की स्थापना की। 60 के दशक के बाद धूमिल ने कविताओं का नया संसार रचा। कहानीकारों में डॉ. काशीनाथ सिंह ने साहित्य के कई प्रतिमानों को स्थापित किया। 

भारतेंदु हरिश्चंद्र की होली और उनकी रचनाएं बेहद प्रसिद्ध हैं। उन्होंने होली पर गजल लिखी थी, गले मुझ को लगा लो ऐे मेरे दिलदार होली में, बुझे दिल की लगी भी तो ऐ मेरे यार होली में। नहीं ये है गुलाल-ए-सुर्ख उड़ता हर जगह प्यारे, ये आशिक की है उमड़ी आह-ए-आतिश-बार होली में। 

गुलाबी गाल पर कुछ रंग मुझ को भी जमाने दो, मनाने दो मुझे भी जान-ए-मन त्यौहार होली में। रसा गर जाम-ए-मय ग़ैरों को देते हो तो मुझ को भी, नशीली आंख दिखला कर करो सरशार होली में।

तालीम : घाट से लेकर विश्वविद्यालय तक लगती है पाठशाला
काशी को सर्व विद्या की राजधानी कहा जाता है। यहां प्राथमिक विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय परिसर में तो कक्षाएं चलती ही हैं, हर दिन घाटों पर भी पाठशालाएं लगती हैं। काशी के मठ, मंदिरों में वेद अध्ययन से लेकर परिषदीय विद्यालयों में शुरुआती शिक्षा छात्र ग्रहण करते हैं। उधर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में शास्त्री, आचार्य की शिक्षा से लेकर महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ और बीएचयू जैसे उच्च शिक्षा के केंद्र से काशी की अपनी एक अलग ही पहचान है। आईआईटी बीएचयू के साथ ही तकनीकी संस्थानों में भी इंजीनियरिंग की पढ़ाई होती है।
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