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Varanasi News: हिंदी के जनबुद्धिजीवी का निधन, आलोचना के एक युग का अवसान

Mon, 13 May 2024 06:02 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Mon, 13 May 2024 06:02 AM IST
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Hindi public intellectual passes away, end of an era of criticism
वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष और हिंदी के आलोचक प्रो. चौथीराम यादव का रविवार को निधन हो गया। वह 86 वर्ष के थे। सांस लेने में दिक्कत के बाद परिजनों ने उन्हें शहर के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया, जहां शाम 6:30 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। पार्थिव देह का अंतिम संस्कार सोमवार को सुबह हरिश्चंद्र घाट पर किया जाएगा। वह अपने पीछे पांच बेटों और बहुओं का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं।
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प्रो. चौथीराम के निधन से हिंदी साहित्य जगत को झटका लगा है। साहित्यकारों ने उन्हें हिंदी का जनबुद्धिजीवी बताते हुए उनके निधन को हिंदी आलोचना के एक युग का अवसान करार दिया है। जौनपुर जिले की शाहगंज तहसील के कायमगंज गांव निवासी प्रो. चौथीराम 2003 में बीएचयू से सेवानिवृत्त हुए थे। उनके तीसरे पुत्र और महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के प्रो. अनुराग यादव ने बताया कि पिताजी बिल्कुल ठीक थे। अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद 15 मिनट के अंदर ही सबकुछ हो गया। उनके निधन पर साहित्यकार डॉ. इंदीवर पांडेय, डॉ. मधुकर मिश्र, नवगीतकार सुरेंद्र वाजपेयी, डॉ. जितेंद्र नाथ मिश्र आदि ने शोक संवेदना प्रकट करते हुए कहा कि यह हिंदी साहित्य की अपूरणीय क्षति है।
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सामाजिक परिवर्तन के लिए छोड़ी अमिट छाप
जयपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विशाल विक्रम सिंह ने कहा कि प्रो. चौथीराम एक ऐसे आलोचक थे, जो सामाजिक परिवर्तन के लिए साहित्य और साहित्य के लिए सामाजिक परिवर्तन के दृष्टिकोण से आलोचना करते थे। वह मार्क्सवादी और आंबेडकर दोनों दृष्टिकोणों के समन्वित रूप से हिंदी आलोचना में प्रवृत्त थे। उनके लेखन का 70 फीसदी हिस्सा उनके रिटायरमेंट के बाद पाठकों के सामने आया। सेवानिवृत्ति के बाद भी अनवरत काम करके वह नजीर बने। बनारस के साहित्य के प्रतीक काशीनाथ सिंह ने अपनी किताब काशी का अस्सी में भी प्रो. चौथीराम का जिक्र किया है।
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आलोचना की ठसक आवाज शांत
बीएचयू हिंदी विभाग के प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल कहते हैं कि हिंदी आलोचना की एक ठसक भरी आवाज शांत हो गई। एक भरपूर, स्वाधीन और सक्रिय साहित्यिक जीवन जीते हुए प्रो. चौथीराम यादव ने इस जीवन को अलविदा कहा। एक बौद्धिक के साथ वे आंदोलन धर्मी रहे और स्त्री व दलित से जुड़े आंदोलनों में सक्रिय रहे। हाशिए के समाज से लेकर समाज के हाशिए तक को समझने में उनकी समान गति थी। भक्तिकाल में कबीर और आधुनिक काल में हजारी प्रसाद द्विवेदी से जुड़कर उनकी आलोचना का विकास हुआ। बौद्धिक स्तर पर बुद्ध और आंबेडकर को वह एक साथ समझते थे। तकनीकी की दुनिया में भी गजब की रुचि थी। कह सकते हैं वह कि जीवन का पोर-पोर जीते थे।


आचार्य परंपरा की अंतिम कड़ी थे प्रो. चौथीराम
साहित्यकार डॉ. राम सुधार सिंह कहते हैं कि प्रो. चौथीराम यादव काशी की आचार्य परंपरा की अंतिम कड़ी थे। विद्वता के साथ-साथ उनका सहज व्यक्तित्व उन्हें सबसे अलग करता था। भक्ति काल को नए ढंग से देखने की उनके अंदर समझ थी। सेवानिवृत्ति के बाद भी वह सामाजिक कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर भागीदारी करते थे।

कई सम्मान से नवाजे गए थे प्रो. चौथीराम
प्रो. चौथीराम यादव को साहित्य साधना सम्मान, लोहिया साहित्य सम्मान, कबीर साहित्य सम्मान समेत कई सम्मान से सम्मानित किया गया था। उनकी प्रमुख कृतियों में छायावादी काव्य : एक दृष्टि, मध्यकालीन भक्तिकाव्य में विरहानुभूति की व्यंजना, हिंदी के श्रेष्ठ रेखाचित्र, हजारी प्रसाद द्विवेदी का समग्र पुनरावलोकन, लोक और वेद आमने-सामने आदि शामिल हैं।
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