हिंदी दिवस पर विशेष : हिंदी खड़ी बोली के विकास की धारा बहाने में बनारस का है योगदान
बनारस को अगर हिंदी की जन्मस्थली कहें तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। भाषा निर्माण से लेकर हिंदी खड़ी बोली के विकास की धारा को बहाने में बनारस का योगदान अतुलनीय है।
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बनारस ने हिंदी को जो दिया है वह न किसी ने दिया और न निकट भविष्य में देने के आसार हैं। बनारस से ही हिंदी को व्याकरण भी मिला और शब्दानुशासन भी। बनारस को अगर हिंदी की जन्मस्थली कहें तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। भाषा निर्माण से लेकर हिंदी खड़ी बोली के विकास की धारा को बहाने में बनारस का योगदान अतुलनीय है।
हिंदी की बोली ब्रज भी है, अवधी भी है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में कबीर की सधुक्कड़ी भाषा भी हिंदी ही है। हिंदी का गढ़ कही जाने वाली नागरी प्रचारिणी सभा आज भी हिंदी को बढ़ाने में योगदान कर रही है। हिंदी को इस स्थिति तक पहुंचने में लंबा संघर्ष करना पड़ा है, और इस संघर्ष की जन्मभूमि काशी रही है। आज हिंदी दिवस पर हिंदी की विकास यात्रा में काशी के योगदान को नमन करते हैं।
हमेशा सिर-माथे पर रहेगा बनारस का योगदान
हिंदी के विकास में बनारस के अतुलनीय योगदान को हमेशा सिर-माथे पर रखा जाएगा। कबीर, तुलसी से लेकर जगन्नाथ दास रत्नाकर और भारतेंदु हरिश्चद्र से प्रेमचंद ने हिंदी को अनेक सांचे-खांचे की बोलियों के शब्द भंडार को आत्मसात कर समृद्ध किया।
भारतेंदु के बाद हिंदी प्रचार-प्रसार का दूसरा सबसे बड़ा मंच नागरी प्रचारिणी सभा थी। नागरी ने जो हिंदी भारतेंदु काल में अव्यवस्थित रह गई थी उसे परिष्कृत करने का काम शुरू किया और लेखकों की एक नई फौज तैयार हुई। डॉ. काशीनाथ सिंह, कथाकार
पहली बार प्रकाशित हुआ हिंदी का शब्द सागर
साहित्यकार डॉ. जितेंद्र नाथ मिश्र ने कहा कि हिंदी भाषा का पहला अधिकारिक और प्रमाणिक व्याकरण नागरी प्रचारिणी सभा ने कामता प्रसाद गुरु के द्वारा तैयार कराया। उस दौर के मूर्धन्य विद्वानों की कमेटी ने मिलकर इसे अंतिम रूप दिया। प्रचारिणी ने ही हिंदी शब्दानुशासन आचार्य किशोरी दास वाजपेयी के जरिए तैयार कराया था।
12 खंडों में पहली बार हिंदी का शब्द सागर नागरी प्रचारिणी से ही प्रकाशित हुआ। इस प्रकार हिंदी भाषा का विकास काशी से ही हुआ। महामना मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में हिंदी में सरकारी दफ्तरों में आवेदन स्वीकार करने का आंदोलन इसी शहर से चला था।
स्वाधीनता संग्राम की भी भाषा रही है हिंदी
साहित्यकार डॉ. इंदीवर पांडेय के मुताबिक, भारतेंदु ने अपने समय के लेखकों को प्रोत्साहित करने के लिए भारतेंदु मंडल बनाया। इनका काम केवल लिखना ही नहीं था, स्वदेशी आंदोलन के साथ जुड़कर गुलामी के विरुद्ध जनता को खड़ा करना भी था। मिहात्मा गांधी के आने तक हिंदी स्वाधीनता संग्राम की भाषा बन गई थी।
सामान्य जन व किसानों के बीच अपनी बातें पहुंचाने के लिए प्राय: हर नेता का हिंदी से सुपरिचित होना आवश्यक समझा जाने लगा। ये ही दिन थे जब जनता के लेखक प्रेमचंद का पदार्पण हुआ। उन्होंने हिंदुस्तानी को अपनी भाषा बनाया और होरी, धनिया, धुनिया जैसे पात्रों को विषय।
तीन पीढ़ियों से निभा रहे हिंदी के विकास की जिम्मेदारी
हिंदी को बढ़ावा देने की दिशा में हर कोई अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहा है। इस बीच डाक विभाग वाराणसी परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव की अपनी एक अलग पहचान है। हिंदी के विकास के लिए तीन पीढ़ियां लगातार अपनी जिम्मेदारियों को निभा रही हैं। कृष्ण कुमार यादव के पिता राम शिव मूर्ति यादव के साथ-साथ पत्नी आकांक्षा यादव और दो बेटियां अक्षिता और अपूर्वा भी हिंदी लेखन से लगातार नया आयाम देने में लगी है।
पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव का इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्ययन के बाद 2001 में हिंदी माध्यम से अपने पहले प्रयास में ही सिविल सेवा में चयन हुआ। केके यादव और उनकी पत्नी आकांक्षा को नेपाल भूटान और श्रीलंका में आयोजित अंतरराष्ट्रीय हिंदी ब्लॉगर सम्मेलन में भी सम्मान मिल चुका है। केके यादव का कहना है कि हिन्दी सिर्फ एक भाषा ही नहीं बल्कि हम सबकी पहचान है, यह हर हिंदुस्तानी का हृदय है। डिजिटल क्रांति के इस युग में हिन्दी में विश्व भाषा बनने की क्षमता है।
हिंदी को राष्ट्र की आंतरिक शक्ति मानते थे महामना मदन मोहन मालवीय
हिंदी विभाग (बीएचयू) के प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ला ने कहा कि महामना, बनारस व हिंदी का संबंध अविभाज्य है। यह भी उनकी राष्ट्रीयता का परिणाम है। उन्होंने नागरी लिपि व हिंदी की मान्यता को लेकर जो कार्य किया वह ऐतिहासिक है। 1900 में कोर्ट कचहरी में हिंदी की मान्यता से लेकर बीएचयू में 1930 में हिंदी पब्लिकेशन बोर्ड तक के गठन में उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।
हिंदी को वे राष्ट्र की आंतरिक शक्ति मानते थे। 1905 में कांग्रेस के काशी अधिवेशन के तुरंत बाद टाउन हॉल में विद्वानों की जो बैठक हुई थी उसमें खुद मालवीय जी ने एक भाषा के रूप में शिक्षा के लिए हिंदी माध्यम की अनिवार्यता पर जोर दिया था।