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महामना ने समझा था तकनीक का महत्व
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Fri, 16 Sep 2016 02:34 AM IST
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काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
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प्राचीन शिक्षा के साथ आधुनिक तकनीकी का सम्मान और समावेश ही काशी हिंदू विश्वविद्यालय की पहचान है। यही इसे दूसरों से अलग करता है। बीएचयू की स्थापना के साथ ही पं. मदन मोहन मालवीय ने देश के विकास में तकनीकी को महत्व को समझ लिया था। यही वजह थी कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पहले दीक्षांत समारोह में 1919 में विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू हुई। गुरुवार को देशभर में इंजीनियर्स डे मनाया गया। यहां से पढ़कर निकले न जाने कितने इंजीनियर देश-विदेश में बीएचयू का मान बढ़ा रहे हैं। ऐसे में आईआईटी बीएचयू की खासियत, उनकी उपलब्धियों को याद करना लाजमी है।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय सौ साल पूरे कर चुका है।
इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू हुए भी लगभग इतना ही अरसा गुजर गया। शुरुआत एक इंजीनियरिंग कॉलेज से हुई फिर प्रौद्योगिकी संस्थान और चार साल पहले भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान का दर्जा। एक लंबा सफर तय किया। बीएचयू की सबसे बड़ी खासियत यही है कि इसके साथ भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान का नाम जुड़ा है। ये देश का पहला विश्वविद्यालय है जिसने देश में सबसे पहले ग्लास टेक्नालॉजी, फार्मास्युटिकल केमिस्ट्री, इंडस्ट्रियल केमिस्ट्री, माइनिंग, मेटलर्जी, मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में उच्च शिक्षा की शुरुआत की।
19 जनवरी 1919 को बीएचयू के पहले दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि महाराज कृष्णराज वोडेयार ने बीएचयू में बनारस इंजीनियरिंग कॉलेज की कार्यशाला की इमारतों का उद्घाटन किया। 11 फरवरी, 1919 को कारीगरी कोर्स की पढ़ाई शुरू हुई। भूविज्ञान विभाग 1920 में इसी कॉलेज में शुरू हुआ। इस विभाग में खनन और धातुकर्म की पढ़ाई शुरू हुई। 1921 में औद्योगिक रसायन विज्ञान विभाग शुरू हुआ। 1923 में दोनों एक विभाग हो गए। 1944 इसे कॉलेज का नाम दिया गया। नाम मिनमेट कर दिया गया। इस बीच केमिकल इंजीनियरिंग, इंडस्ट्रियल केमिस्ट्री को जोड़कर ‘टेक्नो’ बना। इसके बाद इन तीनों कॉलेज को मिलाकर 1968 में इसे आईटी बीएचयू कर दिया गया और जून, 2012 में इसे आईआईटी का दर्जा मिला।
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बीएचयू आईआईटी के निदेशक प्रो. राजीव संगल ने कहा कि महामना ने संस्कृत, दर्शन, कला के साथ मॉडर्न साइंस, टेक्नालॉजी के साथ संस्कृत, दर्शन की पढ़ाई पर जोर दिया था। इसी के रूप में आज आईआईटी यहां खड़ा है। बीएचयू इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिग्री देने वाला पहला विश्वविद्यालय है। उस वक्त अंग्रेजों ने यही कहा था कि जब यहां बिजली ही नहीं है तो इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई का क्या फायदा। इस पर महामना ने उन्हें जवाब दिया था कि पढ़ाई इसीलिए ही जरूरी है कि जब बिजली यहां आए तो इंजीनियर्स पहले से तैयार रहें। उन्होंने बीएचयू में खुद का पावर प्लांट लगवाया, जहां बिजली का उत्पादन होता था। विश्वविद्यालय समेत आसपास के क्षेत्रों में बिजली दी जाती थी। अब हमारी यही कोशिश है कि आईआईटी में शिक्षा और शोध की गुणवत्ता बढ़े। ये महज एक आईआईटी नहीं बल्कि बीएचयू के साथ मिलकर विशेष आईआईटी बने।
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काशी हिंदू विश्वविद्यालय सौ साल पूरे कर चुका है।
इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू हुए भी लगभग इतना ही अरसा गुजर गया। शुरुआत एक इंजीनियरिंग कॉलेज से हुई फिर प्रौद्योगिकी संस्थान और चार साल पहले भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान का दर्जा। एक लंबा सफर तय किया। बीएचयू की सबसे बड़ी खासियत यही है कि इसके साथ भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान का नाम जुड़ा है। ये देश का पहला विश्वविद्यालय है जिसने देश में सबसे पहले ग्लास टेक्नालॉजी, फार्मास्युटिकल केमिस्ट्री, इंडस्ट्रियल केमिस्ट्री, माइनिंग, मेटलर्जी, मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में उच्च शिक्षा की शुरुआत की।
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19 जनवरी 1919 को बीएचयू के पहले दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि महाराज कृष्णराज वोडेयार ने बीएचयू में बनारस इंजीनियरिंग कॉलेज की कार्यशाला की इमारतों का उद्घाटन किया। 11 फरवरी, 1919 को कारीगरी कोर्स की पढ़ाई शुरू हुई। भूविज्ञान विभाग 1920 में इसी कॉलेज में शुरू हुआ। इस विभाग में खनन और धातुकर्म की पढ़ाई शुरू हुई। 1921 में औद्योगिक रसायन विज्ञान विभाग शुरू हुआ। 1923 में दोनों एक विभाग हो गए। 1944 इसे कॉलेज का नाम दिया गया। नाम मिनमेट कर दिया गया। इस बीच केमिकल इंजीनियरिंग, इंडस्ट्रियल केमिस्ट्री को जोड़कर ‘टेक्नो’ बना। इसके बाद इन तीनों कॉलेज को मिलाकर 1968 में इसे आईटी बीएचयू कर दिया गया और जून, 2012 में इसे आईआईटी का दर्जा मिला।
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बीएचयू आईआईटी के निदेशक प्रो. राजीव संगल ने कहा कि महामना ने संस्कृत, दर्शन, कला के साथ मॉडर्न साइंस, टेक्नालॉजी के साथ संस्कृत, दर्शन की पढ़ाई पर जोर दिया था। इसी के रूप में आज आईआईटी यहां खड़ा है। बीएचयू इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिग्री देने वाला पहला विश्वविद्यालय है। उस वक्त अंग्रेजों ने यही कहा था कि जब यहां बिजली ही नहीं है तो इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई का क्या फायदा। इस पर महामना ने उन्हें जवाब दिया था कि पढ़ाई इसीलिए ही जरूरी है कि जब बिजली यहां आए तो इंजीनियर्स पहले से तैयार रहें। उन्होंने बीएचयू में खुद का पावर प्लांट लगवाया, जहां बिजली का उत्पादन होता था। विश्वविद्यालय समेत आसपास के क्षेत्रों में बिजली दी जाती थी। अब हमारी यही कोशिश है कि आईआईटी में शिक्षा और शोध की गुणवत्ता बढ़े। ये महज एक आईआईटी नहीं बल्कि बीएचयू के साथ मिलकर विशेष आईआईटी बने।