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विश्वनाथ मंदिर परिसर में हजारों साल पुराने ज्ञानवापी तीर्थ के मिले अवशेष
अनूप ओझा, अमर उजाला, वाराणसी
Updated Mon, 08 Jan 2018 02:15 PM IST
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काशी विश्वनाथ मंदिर
- फोटो : file photo
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काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में हजारों साल पुराने ज्ञानवापी तीर्थ के अवशेष का पता चला है। बाबा विश्वनाथ कॉरिडोर योजना के तहत हो रही खुदाई के दौरान वहां सुरंगनुमा रास्ता मिला है। इसमें भीतर उतरने के लिए चौकोर सीढ़ियां और कलात्मक पत्थरों से निर्मित रास्ता भी दिखा है।
जानकारी मिलने के बाद मंडलायुक्त नितिन रमेश गोकर्ण ने पुरातत्व विभाग और भारत कला भवन के विशेषज्ञों की टीम से इस स्थल का अध्ययन शुरू करा दिया है। खुदाई फिलहाल रोकवा दी गई है।
पुरातत्व विभाग के अधिकारियों का कहना है कि वहां पहली और दूसरी शताब्दी के तालाब या भवन के अवशेष मिल सकते हैं। फिलहाल विशेषज्ञों को आगे खुदाई कराने और मलबा हटाए जाने का इंतजार है। काशी के प्राचीन जल तीर्थों में ज्ञानवापी सबसे प्रधान तीर्थ के रूप में विख्यात रही है।
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स्कंद पुराण के काशी खंड में भी ज्ञानवापी तीर्थ का उल्लेख मिलने से इसकी पौराणिक महिमा सनातनधर्मियों के लिए अहम रही है। हजारों वर्ष बाद बाबा विश्वनाथ कॉरिडोर योजना के तहत हो रही खुदाई में इस प्राचीन तीर्थ के अवशेषों की मौजूदगी के आरंभिक साक्ष्य मिले हैं।
बाबा की यज्ञशाला के उत्तरी हिस्से के जर्जर भवन को बीते महीने नगर निगम की ओर से गिराए जाने के बाद उसी स्थल पर बाबा विश्वनाथ कॉरिडोर की योजना को मूर्त रूप देने के लिए मलबा हटाने का काम कराया जा रहा था। पत्थरों को हटाने के साथ ही खुदाई भी कराई जा रही थी।
उसी दौरान वहां सुरंगनुमा रास्ता मिला। भीतर तालाब जैसी बनावट नजर आई। जहां नीचे उतरने की सीढ़ियां मिली हैं, वहां से चंद कदम की दूरी पर ज्ञानवापी कूप स्थित है। इससे अनुमान लगाया जा रहा है कि वहां ज्ञानवापी तीर्थ हो सकता है।
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जानकारी मिलने के बाद मंडलायुक्त नितिन रमेश गोकर्ण ने पुरातत्व विभाग और भारत कला भवन के विशेषज्ञों की टीम से इस स्थल का अध्ययन शुरू करा दिया है। खुदाई फिलहाल रोकवा दी गई है।
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पुरातत्व विभाग के अधिकारियों का कहना है कि वहां पहली और दूसरी शताब्दी के तालाब या भवन के अवशेष मिल सकते हैं। फिलहाल विशेषज्ञों को आगे खुदाई कराने और मलबा हटाए जाने का इंतजार है। काशी के प्राचीन जल तीर्थों में ज्ञानवापी सबसे प्रधान तीर्थ के रूप में विख्यात रही है।
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स्कंद पुराण के काशी खंड में भी ज्ञानवापी तीर्थ का उल्लेख मिलने से इसकी पौराणिक महिमा सनातनधर्मियों के लिए अहम रही है। हजारों वर्ष बाद बाबा विश्वनाथ कॉरिडोर योजना के तहत हो रही खुदाई में इस प्राचीन तीर्थ के अवशेषों की मौजूदगी के आरंभिक साक्ष्य मिले हैं।
बाबा की यज्ञशाला के उत्तरी हिस्से के जर्जर भवन को बीते महीने नगर निगम की ओर से गिराए जाने के बाद उसी स्थल पर बाबा विश्वनाथ कॉरिडोर की योजना को मूर्त रूप देने के लिए मलबा हटाने का काम कराया जा रहा था। पत्थरों को हटाने के साथ ही खुदाई भी कराई जा रही थी।
उसी दौरान वहां सुरंगनुमा रास्ता मिला। भीतर तालाब जैसी बनावट नजर आई। जहां नीचे उतरने की सीढ़ियां मिली हैं, वहां से चंद कदम की दूरी पर ज्ञानवापी कूप स्थित है। इससे अनुमान लगाया जा रहा है कि वहां ज्ञानवापी तीर्थ हो सकता है।
मंडलायुक्त ने भीतर जाकर किया मुआयना
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कहा जा रहा है कि 1585 में अकबर के राजस्व मंत्री टोडरमल की सहायता से पं. नारायण भट्ट ने वहां विश्वनाथ मंदिर का निर्माण जब कराया था। इसके बाद 18वीं शताब्दी के अंतिम चरण में इंदौर की महारानी अहिल्या बाई ने भी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। तभी तब इस तीर्थ का स्वरूप परिवर्तित हुआ होगा।
न्यास परिषद के अध्यक्ष आचार्य पं. अशोक द्विवेदी, मंडलायुक्त नितिन रमेश गोकर्ण और सीईओ एसएन त्रिपाठी ने उस सुरंगनुमा रास्ते की सीढ़ियों से होकर भीतर का मुआयना भी किया। इसके बाद पुरातत्व विभाग के अधिकारियों की टीम भेजी गई।
क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. सुभाष चंद्र यादव ने बताया कि उस स्थल को देखने के बाद लगता है कि वहां पहली, दूसरी शताब्दी के निर्माणों के अवशेष दबे हुए हैं।
काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास परिषद के अध्यक्ष पं. अशोक द्विवेदी का कहना है कि खुदाई में भूतल के नीचे जाने के लिए सीढ़ियां मिली हैं। इससे हजारों साल पुराने ज्ञानवापी तीर्थ के नए सिरे से प्रादुर्भाव के संकेत मिलने लगे हैं। वहां विशेषज्ञों की मदद से खुदाई कराई जाएगी, ताकि उसका जीर्णोद्धार कराकर संरक्षित किया जा सके।
मुख्य कार्यपालक अधिकारी एसएन त्रिपाठी ने बताया कि बाबा विश्वनाथ कॉरिडोर योजना को साकार करने के लिए कराई जा रही खुदाई के दौरान सुरंगनुमा रास्ता मिला है। वह रास्ता पुराने विश्वनाथ मंदिर का भी है सकता है और ज्ञानवापी तीर्थ का भी। पुरातत्व विभाग के अधिकारी उसका अध्ययन कर रहे हैं।
न्यास परिषद के अध्यक्ष आचार्य पं. अशोक द्विवेदी, मंडलायुक्त नितिन रमेश गोकर्ण और सीईओ एसएन त्रिपाठी ने उस सुरंगनुमा रास्ते की सीढ़ियों से होकर भीतर का मुआयना भी किया। इसके बाद पुरातत्व विभाग के अधिकारियों की टीम भेजी गई।
क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. सुभाष चंद्र यादव ने बताया कि उस स्थल को देखने के बाद लगता है कि वहां पहली, दूसरी शताब्दी के निर्माणों के अवशेष दबे हुए हैं।
काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास परिषद के अध्यक्ष पं. अशोक द्विवेदी का कहना है कि खुदाई में भूतल के नीचे जाने के लिए सीढ़ियां मिली हैं। इससे हजारों साल पुराने ज्ञानवापी तीर्थ के नए सिरे से प्रादुर्भाव के संकेत मिलने लगे हैं। वहां विशेषज्ञों की मदद से खुदाई कराई जाएगी, ताकि उसका जीर्णोद्धार कराकर संरक्षित किया जा सके।
मुख्य कार्यपालक अधिकारी एसएन त्रिपाठी ने बताया कि बाबा विश्वनाथ कॉरिडोर योजना को साकार करने के लिए कराई जा रही खुदाई के दौरान सुरंगनुमा रास्ता मिला है। वह रास्ता पुराने विश्वनाथ मंदिर का भी है सकता है और ज्ञानवापी तीर्थ का भी। पुरातत्व विभाग के अधिकारी उसका अध्ययन कर रहे हैं।