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गुरु का चोला-कुर्ता और चरण पादुका सुनाती है त्याग की कहानी
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सिक्ख धर्म के नौवें गुरु गुरु तेगबहादुर का काशी से गहरा नाता है। आदर्श, सिद्धांत, धर्म और मानवीय मूल्यों के लिए प्राणों की आहुति देने वाले नौवें पातशाह के चरण काशी की धरती पर 350 साल पहले पड़े थे। आज भी बनारस के नीचीबाग गुरुद्वारे में गुरु का चोला-कुर्ता और चरण पादुका आस्था का केंद्र है।
गुरुद्वारा प्रबंध कमेटी के मुख्य ग्रंथी भाई जगतार सिंह ने बताया कि गुरु तेगबहादुर महाराज ने सात माह 13 दिन तक यहां तप किया था। जब वह काशी से जाने लगे तो उनके शिष्यों ने कहा कि आपके बगैर हमारा जीवन अधूरा रहेगा। तब महाराज ने चोला व चरण पादुका एवं कुछ हस्त लिखित गुरुवाणी पत्रावली शिष्यों को सौंप दी। बताया कि गुरु तेग बहादुर साहिब पंजाब से चलकर दिल्ली, आगरा, मथुरा, कानपुर, प्रयागराज, मिर्जापुर और चुनार होते हुए 1660 ई में काशी पहुंचे थे। गुरु नानक देव के अनुयायी भाई कल्याण को जब यह जानकारी मिली तो उनके दर्शन के लिए अपने आवास नीचीबाग में तैयारियां कीं।
पत्थर को हटाया तो निकल पड़ी निर्मल जलधार
नीचीबाग गुरुद्वारा के मुख्य ग्रंथी भाई रंजीत सिंह ने बताया कि उनके आगमन के दौरान ही एक घटना घटी। पूर्णिमा के दिन कल्याण भाई ने गुरु तेगबहादुर से कहा कि आज सैकड़ों श्रद्धालु काशी गंगा स्नान करने आ रहे हैं। आपका आदेश हो तो हम भी गंगा स्नान कर आ जाएं। उन्होंने कहा कि गंगा कितनी दूर हैं। कल्याण भाई ने बताया कि आधा मील। इस पर उन्होंने ध्यान कर घर में रखे एक पत्थर को हटाया। वहां से एक निर्मल जलधार निकल पड़ी। इसे देख कल्याण भाई आश्चर्य चकित रह गए। जब घर आंगन में पानी भरने लगा तो गुरुजी के आदेश पर पत्थर की शिला रख दी गई। इस जल का स्रोत आज भी गुरुद्वारे में बाऊली साहिब के रूप में मौजूद है। इस जल का अमृत पान करने के लिए लोग दूर दूर से आते हैं। मान्यता है कि आज भी उस जल के सेवन से कई रोगों से मुक्ति मिलती है।
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गुरु तेग बहादुर महाराज का बलिदान युगों-युगों तक स्मरण किया जाएगा। उन्होंने धर्म व समाज की रक्षा के लिए सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
- भाई धर्मवीर सिंह, नीची बाग गुरुद्वारा
औरंगजेब के शासनकाल में मजहबी कट्टरता के सामने उन्होंने जिस तरह से मुकाबला किया वह आज की पीढ़ी के लिए अनुकरणीय है।
- भाई महंत सिंह, ग्रंथी गुरु बाग
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गुरुद्वारा प्रबंध कमेटी के मुख्य ग्रंथी भाई जगतार सिंह ने बताया कि गुरु तेगबहादुर महाराज ने सात माह 13 दिन तक यहां तप किया था। जब वह काशी से जाने लगे तो उनके शिष्यों ने कहा कि आपके बगैर हमारा जीवन अधूरा रहेगा। तब महाराज ने चोला व चरण पादुका एवं कुछ हस्त लिखित गुरुवाणी पत्रावली शिष्यों को सौंप दी। बताया कि गुरु तेग बहादुर साहिब पंजाब से चलकर दिल्ली, आगरा, मथुरा, कानपुर, प्रयागराज, मिर्जापुर और चुनार होते हुए 1660 ई में काशी पहुंचे थे। गुरु नानक देव के अनुयायी भाई कल्याण को जब यह जानकारी मिली तो उनके दर्शन के लिए अपने आवास नीचीबाग में तैयारियां कीं।
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पत्थर को हटाया तो निकल पड़ी निर्मल जलधार
नीचीबाग गुरुद्वारा के मुख्य ग्रंथी भाई रंजीत सिंह ने बताया कि उनके आगमन के दौरान ही एक घटना घटी। पूर्णिमा के दिन कल्याण भाई ने गुरु तेगबहादुर से कहा कि आज सैकड़ों श्रद्धालु काशी गंगा स्नान करने आ रहे हैं। आपका आदेश हो तो हम भी गंगा स्नान कर आ जाएं। उन्होंने कहा कि गंगा कितनी दूर हैं। कल्याण भाई ने बताया कि आधा मील। इस पर उन्होंने ध्यान कर घर में रखे एक पत्थर को हटाया। वहां से एक निर्मल जलधार निकल पड़ी। इसे देख कल्याण भाई आश्चर्य चकित रह गए। जब घर आंगन में पानी भरने लगा तो गुरुजी के आदेश पर पत्थर की शिला रख दी गई। इस जल का स्रोत आज भी गुरुद्वारे में बाऊली साहिब के रूप में मौजूद है। इस जल का अमृत पान करने के लिए लोग दूर दूर से आते हैं। मान्यता है कि आज भी उस जल के सेवन से कई रोगों से मुक्ति मिलती है।
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गुरु तेग बहादुर महाराज का बलिदान युगों-युगों तक स्मरण किया जाएगा। उन्होंने धर्म व समाज की रक्षा के लिए सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
- भाई धर्मवीर सिंह, नीची बाग गुरुद्वारा
औरंगजेब के शासनकाल में मजहबी कट्टरता के सामने उन्होंने जिस तरह से मुकाबला किया वह आज की पीढ़ी के लिए अनुकरणीय है।
- भाई महंत सिंह, ग्रंथी गुरु बाग