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Guru Purnima 2024: शिव से जुड़ी है काशी की अघोर परंपरा, अघोरियों का तीर्थ है क्रीं कुंड; पौराणिक है इसका महत्व

Sat, 20 Jul 2024 04:50 PM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Sat, 20 Jul 2024 04:50 PM IST
सार

Varanasi News: भारत देश में 21 जुलाई यानी रविवार को गुरु पूर्णिमा मनाई जाएगी। इसको लेकर अभी से ही मठ-मंदिर तैयार हो चुके हैं। विभिन्न तरह के अनुष्ठान और आयोजन होंगे। शिष्य अपने गुरु का आशीर्वाद लेने के लिए व्याकुल होंगे। आशीर्वाद मिलते ही वे धन-धान्य हो जाएंगे।

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Guru Purnima Aghori tradition of Kashi connected to Shiva Kriin Kund the pilgrimage of Aghoris
गुरु पूर्णिमा। - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

भगवान शिव की नगरी में गुरु पूर्णिमा का उत्सव किसी त्योहार से कम नहीं होता। बनारस देश का इकलौता शहर है जहां शैव, शाक्त और वैष्णव परंपरा के मठ, आश्रम और मंदिर हैं। 

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मठ और आश्रमों के अलावा संगीत घरानों में भी गुरुकुल परंपरा के अनुसार शिक्षा देने की प्रक्रिया जारी है। 21 जुलाई को काशी में गुरु पूर्णिमा का उत्सव मनाया जाएगा। वर्तमान में काशी में 200 से अधिक मठ और आश्रम हैं। सामनेघाट से लेकर पड़ाव तक कहीं अघोर परंपरा है तो कहीं वैष्णव तो कहीं शाक्त परंपरा के अनुयायी हैं।
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400 साल से लगातार प्रज्ज्वलित है अग्नेय रुद्र की अखंड धूनी
देश भर के अघोरियों की तीर्थ स्थली के रूप में मौजूद क्रीं कुंड पर गुरु पूर्णिमा के उत्सव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। क्रीं कुंड आश्रम के नीरज वर्मा ने बताया कि यहां पर पीठाधीश्वर परंपरा है। अघोर में गुरु पूर्णिमा का अर्थ है गुरु पूर्ण मां। दुनिया के पहले अघोरी भगवान शिव हैं और उनके समय से ही यह परंपरा चली आ रही है। 
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यह अघोरियों का विश्वविख्यात केंद्र है। छठवीं शताब्दी के बाद बाबा कीनाराम ने अघोरपीठ की धुनी जलाई जो अनवरत कुंड पर जल रही है। यहां मौजूद अग्नेय रुद्र की अखंड धूनी 400 साल से लगातार प्रज्ज्वलित है। अघोर का मतलब सरल, सहज और खूबसूरत। वर्तमान पीठाधीश्वर बाबा सिद्धार्थ गौतम हैं।

मोरारजी देसाई आ चुके हैं अवधूत भगवान राम के आश्रम में
अवधूत भगवान राम ने कुष्ठ रोगियों और मानवता की सेवा करने के लिए सर्वेश्वरी समूह की 21 सितंबर 1961 में स्थापना की थी। मंडुवाडीह स्थित सुलेमान के बगीचे में आश्रम की नींव पड़ी थी। बाद में पड़ाव में आश्रम को विस्तार दिया गया। अस्पताल की नींव 1962 में खुद उपप्रधानमंत्री जगजीवन राम ने रखी थी। 1962 में पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई भी आश्रम आए थे। गुरु पूर्णिमा पर गुरु पद संभव राम शिष्यों को दर्शन देंगे।

गढ़वाघाट से यादव समाज का है गहरा लगाव
पूर्वांचल के सबसे बड़े आश्रम मठ गढ़वाघाट में गुरु सरनानंद महाराज गुरु पूर्णिमा पर भक्तों को दर्शन देंगे। 1930 में शुरू हुए इस मठ से पूर्वांचल के यादव समाज का गहरा लगाव है। यहां पर जबरदस्त भीड़ उमड़ती है। इसके अलावा धर्मसम्राट करपात्री महाराज की कर्मस्थली धर्मसंघ, सतुआ बाबा आश्रम, पातालपुरी, वेदपारायण केंद्र, सुमेरूपीठ सहित शहर के सभी आश्रम, मठ और मंदिरों में गुरु पूर्णिमा उत्सव मनाया जाएगा।

गुरु शिष्य परंपरा का साक्षात्कार कराता है गुरुधाम मंदिर
शहर के दक्षिणी छोर पर गुरुधाम मंदिर में सहज ही गुरु शिष्य परंपरा का साक्षात्कार हो जाएगा। योग-तंत्र साधना से जुड़ा दो शताब्दी से भी अधिक प्राचीन मंदिर में आठ द्वार रहस्य और रोमांच जगाते हैं। इसमें एक गुरु को समर्पित तो अन्य सात, सप्तपुरियों अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, काची, अवंतिका व पुरी के नाम हैं। 

तीन मंजिला भवन में भूतल पर गुरु वशिष्ठ- अरुंधती विराजमान हैं तो दूसरे पर नटवर नागर श्रीकृष्ण राधा रानी के साथ विद्यमान थे। तीसरा तल शून्य को समर्पित है। पश्चिमी द्वार से बाहर निकलते ही विशाल आंगन के दोनों किनारों पर सात-सात लघु देवालय चौदह भुवन की परिकल्पना को साकार करते हैं। 

मंदिर की छवि अष्टकोणीय रथ जैसी है। राजा जयनारायण घोषाल ने वर्ष 1814 में निर्माण कराया था। इस मंदिर में स्वामी विवेकानंद, माता आनंदमयी, पं. गोपीनाथ कविराज भी शीश नवा चुके हैं।

वेदव्यास की जयंती पर मनाया जाता है गुरु पूर्णिमा का उत्सव
महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास की जयंती पर गुरु पूर्णिमा का उत्सव मनाया जाता है। उनका जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को हुआ था। रामनगर के किले में और व्यास नगर में वेदव्यास का मंदिर है जहां माघ में प्रत्येक सोमवार को मेला लगता है।

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