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गिरिजा देवी की पुण्यतिथिः अपनी गायकी से हर विधा के शब्दों को कर दिया अमर 

Wed, 24 Oct 2018 11:12 AM IST
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी Updated Wed, 24 Oct 2018 11:12 AM IST
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Girija devi first death anniversary today
गिरिजा देवी - फोटो : file photo
आज ही के दिन 24 अक्तूबर 2017 को कोलकाता में ठुमरी साम्राज्ञी गिरिजा देवी हमेशा के लिए दूर चली गई थीं। ठुमरी की रानी के नाम से मशहूर गिरिजा संगीत की दुनिया का जाना-माना चेहरा थीं। उनके चाहने वाले उन्हें प्यार से अप्पा जी कहकर बुलाते थे।
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अपनी आखिरी यात्रा से करीब एक माह पहले उन्होंने दिल्ली में प्रस्तुति दी थी। किसी ने नहीं सोचा था, वो आखिरी बार बनारस घराने की इस विश्वस्तरीय आवाज को सुन रहे हैं। चेहरे पर भले ही तजुर्बे ने हस्ताक्षर किए हों, बतौर फनकार उनका उत्साह चिरयौवन था।
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उनके साथ उस कार्यक्रम में उनकी शिष्या डॉ. रीता देब भी थीं। उस दिन को याद करके रीता देब बताती हैं कि कहीं से नहीं लगा था कि उनकी पूरी उम्र इसी ठुमरी, दादरा और होरी गाते बीती हो। किसी भी नए कलाकार जैसा रियाज करती थीं और हर बोल को लय के साथ उठाती गिराती थीं।
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मशहूर ठुमरी साम्राज्ञी पद्मविभूषण गिरिजा देवी की खासियत थी हर विधा के शब्दों को अपनी गायकी से अमर कर देना। ठुमरी ही नहीं, ख्याल, टप्पा, तराना, सदरा भी उनकी आवाज में संजीवनी संगीत बन जाते थे।

पारंपरिक लोक संगीत में उनके गाए होरी, चैती, कजरी, झूला, दादरा और भजन आज भी लोगों का मन मोह जाते हैं। बीएचयू में विजिटिंग प्रोफेसर गिरिजा देवी भी रहीं तो उनकी शिष्या मंजू सुंदरम् ने भी इस पद को सुशोभित किया। करीब 1963 से अप्पा जी से मंजू सुंदरम् को भी ठुमरी सीखने का मौका मिला। 

अप्पा जी में थी  ईश्वरीय शक्ति

Girija devi first death anniversary today
गिरिजा देवी - फोटो : file photo
उनकी सबसे वरिष्ठ शिष्याओं में एक विख्यात गायिका मंजू सुंदरम् बताती हैं कि अप्पा जी से मैंने जितना कुछ सीखा, उतना ही अपने शिष्यों को देने की कोशिश की है। बेहद उदारता के साथ उपशास्त्रीय संगीत की उन्होंने मुझे जो दीक्षा दी, उससे ही मुझे दिशा और दृष्टि मिली।

करीब 10-12 वर्षों तक रोजाना अप्पा जी के साथ दो-दो घंटे का रियाज करती थी और उनका ये पूरा वक्त मेरा होता था। वह कहती हैं कि अप्पा जी को रियाज करते और गाते देखना अमृत पान जैसा होता था।

करीब 1989 से अप्पा जी से जुड़ीं उनकी शिष्या डॉ. रीता देब बताती हैं कि अप्पा जी में ईश्वरीय शक्ति थी जिसे मैं आज भी उनके न रहने के बावजूद महसूस करती हूं। वो मेरी गुरु थीं, मां थीं, एक देवी स्वरूप थीं। अब इसे सौभाग्य कहूं या कुछ और, अप्पा जी के अंतिम कंसर्ट में मैं ही उनके सहयोगी के तौर पर उनके साथ थी।

सितंबर 2017 में नई दिल्ली में ठुमरी फेस्टिवल उनका अंतिम कंसर्ट था और उस दौरान मैं उनके साथ रही। रीता देब कहती हैं कि रियाज के दौरान, मंच पर प्रस्तुति के दौरान सामने अगर अप्पा जी बैठी हों तो एक अलग ही ऊर्जा मिलती थी। वह कहती हैं कि कुछ भी हो तो उनसे फोन कर पूछ लेते थे। अब ये सारी चीजें बहुत याद आती हैं।

वह बताती हैं कि 2015 में मुझे जब तानसेन समारोह में प्रस्तुति देने का मौका मिला था तो गुरु मां बहुत खुश हुईं थीं। बहुत प्रोत्साहित किया था, कहा था इतनी सी उम्र में इतने बड़े समारोह में हिस्सा लेना बहुत बड़ी बात है। बीएचयू की ही प्रो. संगीता पंडित बताती हैं कि बीएचयू में विजिटिंग प्रोफेसर रहते हुए अप्पा जी से हमें बहुत कुछ सीखने को मिला। उनकी गायकी में हर दिन कुछ नया सीखने को मिलता था। 
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