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गंगाजल पीने लायक नहीं गंगाजल, मजबूरी में आचमन
varanasi
Updated Sat, 06 Dec 2014 02:16 AM IST
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वाराणसी। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट होने के बावजूद सीवर का जल गंगा में बहाया जा रहा है। गंगा के किनारों की हालत इतनी खराब है कि आचमन करना तो दूर स्नान करने का भी मन नहीं करता है।इसके बावजूद काशी आने वाले हजारों श्रद्धालु न सिर्फ गंगा में डुबकी लगाते हैं बल्कि दो-चार अंजुरी पानी पीते भी हैं। तीर्थ पुरोहितों और नौका चलाने वाले मल्लाहों के लिए तो प्यास बुझाने के लिए गंगा का पानी पीना ही पड़ता है। श्रद्धालु भले ही गंगा जल को अमृत समान मानें लेकिन वैज्ञानिक इस पानी के सेवन के लिए सेहत के लिए महफूज नहीं मानते। उनकी राय में दशाश्वमेध, राजेंद्र प्रसाद घाट और हरिश्चंद्र घाट समेत कई घाटों पर प्रदूषण की दशा चिंताजनक है।
अस्सी से राजघाट के बीच दर्जनों नालों का मुंह गंगा में खुला है। वरुणा नदी पर बने 40 से ज्यादा नालों का पानी भी गंगा में ही जाता है। गंगा में मिलने वाली असि तो नाला में तब्दील हो गई है। उसके जल में दुर्गंध आती रहती है। इसके अलावा शवदाह, फूलमालाओं के निस्तारण के चलते गंगा की हालत खस्ता है। दशाश्वमेध घाट, राजेंद्र प्रसाद घाट, मान मंदिर घाट, हरिश्चंद्र घाट, मणिकर्णिका घाट, राणा महल घाट पर बहाव कम होने और सर्वाधिक गंदगी होने की वजह से वहां का जल तो काला पड़ गया है। इन घाटों पर वीओडी का स्तर 12 पार्ट पर मिलयिन (पीपीएम) के चिंताजनक स्तर पर आंका गया है। इसके बावजूद आस्थावानों के लिए गंगा मां के सामान है और वे स्नान भी करते हैं और आचमन भी।
जल संस्थान शहर के पेयजल की जरूरतों को पूरा करने के लिए रोजाना 125 मीलियन लीटर पानी रोजाना गंगा से लेता है। गंगा से आपूर्ति किए जाने वाले इस पानी की गुणवत्ता पर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं। इन्हीं दिक्कतों के चलते गंगा के तटवर्ती इलाकों में भी लगातार मिनी ट्यूबवेल लाए जा रहे हैं ताकि स्वच्छ जल की आपूर्ति हो जाए। ट्यूबवेल से 190 एमएलडी पानी की आपूर्ति रोजाना होती है। गंगा जल का सेवन सेहत के लिए महफूज नहीं है। शहर में हर साल 60 हजार से ज्यादा लोग गैस्ट्रो के शिकार होते हैं जबकि 20 हजार टायफायड के।
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इनकी आस्था बरकरार
वाराणसी। काशी नरेश डॉ. विभूति नारायण सिंह आजीवन गंगा जल ही पीते रहे। गंगा जल प्रदूषित होने के बावजूद आज भी काशी के प्रधान तीर्थ पुरोहित जेठा महाराज जैसे बहुत से लोग हैं जो दूसरे शहर में भी पीने के लिए गंगाजल लेकर जाते हैं। काशी विद्वत परिषद के महामंत्री बटुक प्रसाद शास्त्री, ब्रह्मनाल के रानी महाराज, हरि महाराज गंगा जल का ही सेवन करते हैं। अस्सी घाट के तीर्थपुरोहित त्रिलोकी नाथ शुक्ला बताते हैं कि गंगा जल को अमृत तत्व मानकर उनके परिवार के सभी सदस्य पीते हैं। अस्सी घाट के ही मल्लाह श्याम लाल माझी ने बताया कि दिन भर खेवा मारने के दौरान जहां प्यास लगती है, गंगा जल से ही बुझाते हैं। निषादराज घाट, मलहिया टोला, वच्छराज घाट, अहिल्याबाई घाट, त्रिपुरा भैरवी, गायघाट,रामघाट, पंचगंगा घाट, दुर्गा घाट के सैकड़ों परिवार गंगा जल से ही अपना काम चला रहे हैं।
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28 साल बाद भी नालों का नहीं हुआ सर्वेक्षण
सरकारी रिकार्ड के अनुसार अस्सी से राजघाट के बीच शहर के औद्योगिक और घरेलू डिस्चार्ज को 33 नालों के माध्यम से गंगा में बहाया जा रहा है। ये नाले 1986 में तब गिने गए थे, जब गंगा एक्शन प्लान के प्रथम चरण की शुरुआत तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इसी काशी के राजेंद्र प्रसाद घाट से की थी। इसके बाद के 28 वर्षों में बढ़ी शहर की आबादी के आधार पर न तो डिस्चार्ज का दोबारा आकलन कराया गया और न तो नालों का ही सर्वे हुआ। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी डॉ. मोहम्मद सिकंदर ने बताया कि जल्द ही गंगा में गिरने वाले नालों का नए सिरे से सर्वे कराया जाएगा, ताकि सही तसवीर सामने आ सके।
इनसेट
14 घाटों पर गंगाजल आचमन योग्य भी नहीं
वाराणसी। महामना मालवीय इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालॉजी फार द गंगा मैनेजमेंट के निदेशक प्रोफेसर यूके चौधरी ने हाल में गंगा जल के नमूनों की हुई जांच के आधार पर बताया कि 14 घाटों के किनारे का जल आचमन करने योग्य भी नहीं है। दशाश्वमेध घाट से राजेंद्र प्रसाद घाट, मान मंदिर घाट, त्रिपुरा भैरवी घाट, मीर घाट, ललिता घाट, जलासेन घाट, मणिकर्णिका घाट, हरिश्चंद्र घाट, सिंधिया घाट, संकठा घाट, भोसले घाट,गूलर घाट, रामघाट पर नहाने, पीने लायक गंगा का जल नहीं रह गया है। वहां वीओडी लोड 12 पार्ट पर मिलियन(पीपीएम) है तो आक्सीजन कंटेंट 6-7 पीपीएम पाया गया है। बीओडी लोड 1-2 पीपीएम होना चाहिए और आक्सीजन कंटेंट 8-9 पीपीएम तक होने पर जल की गुणवत्ता बरकरार मानी जाती है।
अस्सी से राजघाट के बीच दर्जनों नालों का मुंह गंगा में खुला है। वरुणा नदी पर बने 40 से ज्यादा नालों का पानी भी गंगा में ही जाता है। गंगा में मिलने वाली असि तो नाला में तब्दील हो गई है। उसके जल में दुर्गंध आती रहती है। इसके अलावा शवदाह, फूलमालाओं के निस्तारण के चलते गंगा की हालत खस्ता है। दशाश्वमेध घाट, राजेंद्र प्रसाद घाट, मान मंदिर घाट, हरिश्चंद्र घाट, मणिकर्णिका घाट, राणा महल घाट पर बहाव कम होने और सर्वाधिक गंदगी होने की वजह से वहां का जल तो काला पड़ गया है। इन घाटों पर वीओडी का स्तर 12 पार्ट पर मिलयिन (पीपीएम) के चिंताजनक स्तर पर आंका गया है। इसके बावजूद आस्थावानों के लिए गंगा मां के सामान है और वे स्नान भी करते हैं और आचमन भी।
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जल संस्थान शहर के पेयजल की जरूरतों को पूरा करने के लिए रोजाना 125 मीलियन लीटर पानी रोजाना गंगा से लेता है। गंगा से आपूर्ति किए जाने वाले इस पानी की गुणवत्ता पर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं। इन्हीं दिक्कतों के चलते गंगा के तटवर्ती इलाकों में भी लगातार मिनी ट्यूबवेल लाए जा रहे हैं ताकि स्वच्छ जल की आपूर्ति हो जाए। ट्यूबवेल से 190 एमएलडी पानी की आपूर्ति रोजाना होती है। गंगा जल का सेवन सेहत के लिए महफूज नहीं है। शहर में हर साल 60 हजार से ज्यादा लोग गैस्ट्रो के शिकार होते हैं जबकि 20 हजार टायफायड के।
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इनकी आस्था बरकरार
वाराणसी। काशी नरेश डॉ. विभूति नारायण सिंह आजीवन गंगा जल ही पीते रहे। गंगा जल प्रदूषित होने के बावजूद आज भी काशी के प्रधान तीर्थ पुरोहित जेठा महाराज जैसे बहुत से लोग हैं जो दूसरे शहर में भी पीने के लिए गंगाजल लेकर जाते हैं। काशी विद्वत परिषद के महामंत्री बटुक प्रसाद शास्त्री, ब्रह्मनाल के रानी महाराज, हरि महाराज गंगा जल का ही सेवन करते हैं। अस्सी घाट के तीर्थपुरोहित त्रिलोकी नाथ शुक्ला बताते हैं कि गंगा जल को अमृत तत्व मानकर उनके परिवार के सभी सदस्य पीते हैं। अस्सी घाट के ही मल्लाह श्याम लाल माझी ने बताया कि दिन भर खेवा मारने के दौरान जहां प्यास लगती है, गंगा जल से ही बुझाते हैं। निषादराज घाट, मलहिया टोला, वच्छराज घाट, अहिल्याबाई घाट, त्रिपुरा भैरवी, गायघाट,रामघाट, पंचगंगा घाट, दुर्गा घाट के सैकड़ों परिवार गंगा जल से ही अपना काम चला रहे हैं।
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28 साल बाद भी नालों का नहीं हुआ सर्वेक्षण
सरकारी रिकार्ड के अनुसार अस्सी से राजघाट के बीच शहर के औद्योगिक और घरेलू डिस्चार्ज को 33 नालों के माध्यम से गंगा में बहाया जा रहा है। ये नाले 1986 में तब गिने गए थे, जब गंगा एक्शन प्लान के प्रथम चरण की शुरुआत तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इसी काशी के राजेंद्र प्रसाद घाट से की थी। इसके बाद के 28 वर्षों में बढ़ी शहर की आबादी के आधार पर न तो डिस्चार्ज का दोबारा आकलन कराया गया और न तो नालों का ही सर्वे हुआ। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी डॉ. मोहम्मद सिकंदर ने बताया कि जल्द ही गंगा में गिरने वाले नालों का नए सिरे से सर्वे कराया जाएगा, ताकि सही तसवीर सामने आ सके।
इनसेट
14 घाटों पर गंगाजल आचमन योग्य भी नहीं
वाराणसी। महामना मालवीय इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालॉजी फार द गंगा मैनेजमेंट के निदेशक प्रोफेसर यूके चौधरी ने हाल में गंगा जल के नमूनों की हुई जांच के आधार पर बताया कि 14 घाटों के किनारे का जल आचमन करने योग्य भी नहीं है। दशाश्वमेध घाट से राजेंद्र प्रसाद घाट, मान मंदिर घाट, त्रिपुरा भैरवी घाट, मीर घाट, ललिता घाट, जलासेन घाट, मणिकर्णिका घाट, हरिश्चंद्र घाट, सिंधिया घाट, संकठा घाट, भोसले घाट,गूलर घाट, रामघाट पर नहाने, पीने लायक गंगा का जल नहीं रह गया है। वहां वीओडी लोड 12 पार्ट पर मिलियन(पीपीएम) है तो आक्सीजन कंटेंट 6-7 पीपीएम पाया गया है। बीओडी लोड 1-2 पीपीएम होना चाहिए और आक्सीजन कंटेंट 8-9 पीपीएम तक होने पर जल की गुणवत्ता बरकरार मानी जाती है।