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घुलनशील आक्सीजन की मात्रा ने बदला गंगा का रंग रूप
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वाराणसी। लॉकडाउन से इंसान भले ही परेशान हों, लेकिन प्रकृति ने खुद को बेहतर बनाया है। हवा से लेकर पानी तक हर जगह लॉकडाउन का सकारात्मक असर नजर आ रहा है। बीते दो माह में गंगाजल की गुणवत्ता में 25 से 30 फीसदी तक सुधार हुआ है। जलीय जीवों के लिए यह सकारात्मक है। गंगाजल का रंग देखकर भी इसे महसूस किया जा सकता है।
बीएचयू के नदी विज्ञानी प्रो. बीडी त्रिपाठी का कहना है कि गंगाजल अभी केवल 25 से 30 फीसदी गंगा साफ हुआ है। वैज्ञानिकों की जांच में भी बात सामने आई है कि घुलनशील आक्सीजन की मात्रा बढ़ी है और बीओडी की मात्रा में कमी आई है। घुलनशील आक्सीजन की मात्रा का बढ़ना और बीओडी कम होना सकारात्मक है। इससे जलीय जीवों को बेहतर वातावरण मिलेगा। जहां-जहां गंगा में नाले गिरते हैं, उन्हें छोड़कर बाकी जगह गंगा 30 प्रतिशत से ज्यादा स्वच्छ हुई हैं। 35 से ज्यादा नालों से हर दिन 350 मिलियन लीटर सीवेज गंगा में जाता है। जिस जगह नाले गिरते वहां स्थिति अभी खराब है।
क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण अधिकारी कालिका सिंह का कहना है कि गंगा जल में काफी सुधार आया है। प्रदूषण का स्तर भी कम हुआ है। कई जगह से लिए गए नमूनों की जांच रिपोर्ट में इसकी पुष्टि हो चुकी है।
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बीएचयू के महामना मालवीय गंगा शोध केंद्र की रिपोर्ट
घाट 24 मार्च 20 अप्रैल
डीओ बीओडी डीओ बीओडी
शूलटंकेश्वर 8.2 2.8 9.5 1.2
सामनेघाट 7.6 3.2 8.7 1.5
अस्सी घाट 7.4 6.5 8.5 2.5
दशाश्वमेध घाट 7.2 4.6 8.5 1.4
राजघाट 4.5 9.5 7.2 7.5
ऐसे साफ रहती है नदी
- डीओ यानी डिजाल्व आक्सीजन की मात्रा नदी के पानी में 5 मिलीग्राम प्रति लीटर से ज्यादा होनी चाहिए।
- बीओडी यानी बायोकेमिकल आक्सीजन डिजाल्व की मात्रा नदी के पानी में 3 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम होनी चाहिए।
- फीकल कॉलीफार्म प्रति सौ मिलीलीटर पांच सौ से कम और पेयजल में यह मात्रा शून्य होनी चाहिए।
गंगाजल बैक्टीरिया को मारता है, वायरस को नहीं
प्रो. बीडी त्रिपाठी के अनुसार, गंगाजल बैक्टीरियोफाज है। यानी यह बैक्टीरिया को मारता है न कि किसी वायरस को। अब तक वायरस पर गंगा के पानी के प्रभाव संबंधी कोई शोध सामने नहीं आया है। कोविड-19 को मारने के लिए गंगाजल के क्लिनिकल ट्रायल को आईसीएमआर ने भी अस्वीकार कर दिया है। उन्होंने कहा कि हमारे पास ऐसा कोई डाटा नहीं है, जिसमें किसी वायरस पर गंगाजल का क्लिनिकल ट्रायल किया गया हो।
दोगुना हुआ फीकल कॉलीफार्म का प्रवाह
वाराणसी। गंगा में घुलनशील आक्सीजन की मात्रा बढ़ी है, लेकिन फीकल कॉलीफार्म दोगुना हो गया है। संकट मोचन फाउंडेशन की स्वच्छ गंगा रिसर्च लेबोरेटरी ने छह मार्च और चार अप्रैल को गंगाजल के सैंपल लिए थे। इसमें खिड़किया घाट पर फीकल कॉलीफार्म की मात्रा पांच करोड़ 20 लाख, नगवां में 3 करोड़ 70 लाख और वरुणा प्रवाह में यह छह करोड़ 40 लाख था। वहीं, चार अप्रैल को लिए गए सैंपल में नगवां पर सुबह के समय पांच करोड़ 70 लाख, शाम को तीन करोड़ 20 लाख, तुलसी घाट पर सुबह दो लाख दो हजार और शाम को एक लाख 24 हजार था।
बीएचयू आईआईटी के प्रोफेसर विश्वंभर नाथ मिश्र का कहना है कि गंगा के स्वच्छ होने की बात तो सभी कर रहे हैं, लेकिन फीकल कॉलीफार्म पर कोई बात नहीं कर रहा है। फीकल कॉलीफार्म का मतलब है सीवेज। मानकों की बात करें तो नहाने के पानी में प्रति सौ मिली फीकल कॉलीफार्म की संख्या पांच सौ से कम होनी चाहिए। जबकि पीने के पानी में यह शून्य होना चाहिए।
गंगाजल में फीकल कॉलीफार्म की मात्रा
छह मार्च चार अप्रैल
तुलसीघाट 52000 202000
नगवा घाट 37000000 57000000
(आंकड़े प्रति सौ मिलीलीटर के हिसाब से)
घाटों पर बीओडी और डीओ
6 मार्च 4 अप्रैल
तुलसी घाट पर बीओडी 6.2 78
तुलसी घाट पर डीओ 6.8 7.0
नगवा घाट पर बीओडी 42 22
नगवा घाट पर डीओ 3.6 6.0
(आंकड़े मिलीग्राम प्रति लीटर में)
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बीएचयू के नदी विज्ञानी प्रो. बीडी त्रिपाठी का कहना है कि गंगाजल अभी केवल 25 से 30 फीसदी गंगा साफ हुआ है। वैज्ञानिकों की जांच में भी बात सामने आई है कि घुलनशील आक्सीजन की मात्रा बढ़ी है और बीओडी की मात्रा में कमी आई है। घुलनशील आक्सीजन की मात्रा का बढ़ना और बीओडी कम होना सकारात्मक है। इससे जलीय जीवों को बेहतर वातावरण मिलेगा। जहां-जहां गंगा में नाले गिरते हैं, उन्हें छोड़कर बाकी जगह गंगा 30 प्रतिशत से ज्यादा स्वच्छ हुई हैं। 35 से ज्यादा नालों से हर दिन 350 मिलियन लीटर सीवेज गंगा में जाता है। जिस जगह नाले गिरते वहां स्थिति अभी खराब है।
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क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण अधिकारी कालिका सिंह का कहना है कि गंगा जल में काफी सुधार आया है। प्रदूषण का स्तर भी कम हुआ है। कई जगह से लिए गए नमूनों की जांच रिपोर्ट में इसकी पुष्टि हो चुकी है।
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बीएचयू के महामना मालवीय गंगा शोध केंद्र की रिपोर्ट
घाट 24 मार्च 20 अप्रैल
डीओ बीओडी डीओ बीओडी
शूलटंकेश्वर 8.2 2.8 9.5 1.2
सामनेघाट 7.6 3.2 8.7 1.5
अस्सी घाट 7.4 6.5 8.5 2.5
दशाश्वमेध घाट 7.2 4.6 8.5 1.4
राजघाट 4.5 9.5 7.2 7.5
ऐसे साफ रहती है नदी
- डीओ यानी डिजाल्व आक्सीजन की मात्रा नदी के पानी में 5 मिलीग्राम प्रति लीटर से ज्यादा होनी चाहिए।
- बीओडी यानी बायोकेमिकल आक्सीजन डिजाल्व की मात्रा नदी के पानी में 3 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम होनी चाहिए।
- फीकल कॉलीफार्म प्रति सौ मिलीलीटर पांच सौ से कम और पेयजल में यह मात्रा शून्य होनी चाहिए।
गंगाजल बैक्टीरिया को मारता है, वायरस को नहीं
प्रो. बीडी त्रिपाठी के अनुसार, गंगाजल बैक्टीरियोफाज है। यानी यह बैक्टीरिया को मारता है न कि किसी वायरस को। अब तक वायरस पर गंगा के पानी के प्रभाव संबंधी कोई शोध सामने नहीं आया है। कोविड-19 को मारने के लिए गंगाजल के क्लिनिकल ट्रायल को आईसीएमआर ने भी अस्वीकार कर दिया है। उन्होंने कहा कि हमारे पास ऐसा कोई डाटा नहीं है, जिसमें किसी वायरस पर गंगाजल का क्लिनिकल ट्रायल किया गया हो।
दोगुना हुआ फीकल कॉलीफार्म का प्रवाह
वाराणसी। गंगा में घुलनशील आक्सीजन की मात्रा बढ़ी है, लेकिन फीकल कॉलीफार्म दोगुना हो गया है। संकट मोचन फाउंडेशन की स्वच्छ गंगा रिसर्च लेबोरेटरी ने छह मार्च और चार अप्रैल को गंगाजल के सैंपल लिए थे। इसमें खिड़किया घाट पर फीकल कॉलीफार्म की मात्रा पांच करोड़ 20 लाख, नगवां में 3 करोड़ 70 लाख और वरुणा प्रवाह में यह छह करोड़ 40 लाख था। वहीं, चार अप्रैल को लिए गए सैंपल में नगवां पर सुबह के समय पांच करोड़ 70 लाख, शाम को तीन करोड़ 20 लाख, तुलसी घाट पर सुबह दो लाख दो हजार और शाम को एक लाख 24 हजार था।
बीएचयू आईआईटी के प्रोफेसर विश्वंभर नाथ मिश्र का कहना है कि गंगा के स्वच्छ होने की बात तो सभी कर रहे हैं, लेकिन फीकल कॉलीफार्म पर कोई बात नहीं कर रहा है। फीकल कॉलीफार्म का मतलब है सीवेज। मानकों की बात करें तो नहाने के पानी में प्रति सौ मिली फीकल कॉलीफार्म की संख्या पांच सौ से कम होनी चाहिए। जबकि पीने के पानी में यह शून्य होना चाहिए।
गंगाजल में फीकल कॉलीफार्म की मात्रा
छह मार्च चार अप्रैल
तुलसीघाट 52000 202000
नगवा घाट 37000000 57000000
(आंकड़े प्रति सौ मिलीलीटर के हिसाब से)
घाटों पर बीओडी और डीओ
6 मार्च 4 अप्रैल
तुलसी घाट पर बीओडी 6.2 78
तुलसी घाट पर डीओ 6.8 7.0
नगवा घाट पर बीओडी 42 22
नगवा घाट पर डीओ 3.6 6.0
(आंकड़े मिलीग्राम प्रति लीटर में)