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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   Fulfilling duties final farewell Pind Daan Aman performs Tirth Shraddh in Kashi unclaimed deceased individuals

अंतिम विदाई से पिंडदान तक निभाया रिश्ता: 52 लावारिस दिवंगतों के लिए काशी में तीर्थ श्राद्ध, अमन ने निभाया फर्ज

Wed, 07 Oct 2026 05:32 PM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Wed, 07 Oct 2026 05:32 PM IST
सार

काशी के पंचगंगा घाट पर 52 लावारिस दिवंगतों का तीर्थ श्राद्ध और पिंडदान किया गया। अंतिम विदाई से लेकर पिंडदान तक अमन कबीर ने अपनों का फर्ज निभाते हुए दिवंगतों के लिए धार्मिक अनुष्ठान कराया। कार्यक्रम में मृतकों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गई। इस पहल को मानवीय संवेदना और सामाजिक सरोकार से जोड़कर देखा गया।

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Fulfilling duties final farewell Pind Daan Aman performs Tirth Shraddh in Kashi unclaimed deceased individuals
पंचगंगा घाट पर हुआ पिंडदान। - फोटो : संवाद

विस्तार

पितृपक्ष के अवसर पर वाराणसी के पंचगंगा घाट पर बुधवार को 52 ज्ञात-अज्ञात दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए तीर्थ श्राद्ध और पिंडदान किया गया। ये वही लोग थे, जिनका सालभर पहले अंतिम संस्कार तो हुआ, लेकिन अंतिम समय में अपना कहने वाला कोई साथ खड़ा नहीं था। अमन कबीर सेवा न्यास ने परिवार की भूमिका निभाते हुए उनके अंतिम संस्कार से लेकर पिंडदान तक की जिम्मेदारी निभाई।

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सात अक्टूबर, बुधवार को अमन कबीर सेवा न्यास के नेतृत्व में पितृपक्ष के दौरान पंचगंगा घाट किनारे 52 दिवंगत आत्माओं के लिए श्राद्ध और पिंडदान कराया गया। पूरे वर्ष न्यास की ओर से जिन ज्ञात-अज्ञात, लावारिस, अनाथ और दुर्घटनाओं में जान गंवाने वाले लोगों का अंतिम संस्कार किया गया था, उनके लिए यह धार्मिक कर्मकांड संपन्न कराया गया। श्राद्ध कर्म पंडित वेद आशीष महाराज ने हिंदू परंपरा के अनुसार विधि-विधान से कराया।

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जिनका कोई नहीं, उनके लिए परिवार बना न्यास

अमन कबीर सेवा न्यास के अध्यक्ष अमन कबीर लंबे समय से उन लोगों के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाते हैं, जिनका इस दुनिया में कोई आगे-पीछे नहीं होता। सड़क दुर्घटना में मौत हो या अस्पताल में इलाज के दौरान किसी लावारिस मरीज की मृत्यु, सूचना मिलने पर अमन कबीर अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंचते हैं। पहले मृतक की पहचान और परिजनों की तलाश का प्रयास किया जाता है। पहचान नहीं होने या परिवार के मौजूद होने के बावजूद छोड़ दिए जाने की स्थिति में कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद अंतिम संस्कार कराया जाता है।

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मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर अंतिम संस्कार

कानूनी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद न्यास की टीम ऐसे शवों का काशी के महाश्मशान मणिकर्णिका घाट या हरिश्चंद्र घाट पर हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार करती है। अमन कबीर और उनकी टीम के लिए सेवा केवल अंतिम संस्कार तक सीमित नहीं है। पितृपक्ष आने पर उन दिवंगतों के लिए तर्पण और अन्य आवश्यक संस्कार भी कराए जाते हैं।

अमन कबीर ने कहा कि जिन लोगों के अंतिम समय में कोई अपना उनके साथ खड़ा नहीं हुआ, उनके लिए काशी में कोई तो अपना होना चाहिए। उनका प्रयास है कि मृत्यु के बाद भी किसी व्यक्ति को लावारिस न कहलाना पड़े। इसी भावना के साथ न्यास ऐसे दिवंगतों का अंतिम संस्कार करने के बाद पितृपक्ष में उनके लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान भी करता है।

अमन कबीर के मुताबिक धार्मिक मान्यता में मृत आत्माओं की शांति के लिए पिंड कर्म और तर्पण को महत्वपूर्ण माना गया है। पितृपक्ष को दिवंगतों के इन धार्मिक संस्कारों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त पखवाड़ा माना जाता है। उनका कहना है कि मान्यता के अनुसार जिन लोगों की अकाल या कठिन परिस्थितियों में मृत्यु होती है अथवा मृत्यु के बाद जिनका पिंड कर्म और तर्पण नहीं हो पाता, उनकी आत्मा की शांति के लिए इन संस्कारों का महत्व माना गया है। इसी मान्यता के तहत न्यास इन दिवंगतों के लिए तर्पण और पिंड कर्म करता है।

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कई वर्षों से जारी है अमन कबीर की सेवा

वाराणसी के दारानगर मोहल्ले के रहने वाले अमन कबीर कई वर्षों से इस अनूठी समाज सेवा से जुड़े हैं। लावारिस शवों के अंतिम संस्कार के साथ वह उन लोगों के लिए भी आगे आते हैं, जिन्हें उनके परिवारजन किसी वजह से अकेला छोड़ देते हैं। कानूनी प्रक्रिया और धार्मिक परंपराओं के बीच न्यास ऐसे लोगों को अंतिम विदाई देता है और बाद में पितृपक्ष में उनके लिए तर्पण व श्राद्ध कर्म भी कराता है।

पंचगंगा घाट पर 52 दिवंगत आत्माओं के लिए किया गया यह श्राद्ध-पिंडदान उस सामाजिक जिम्मेदारी की तस्वीर भी सामने लाता है, जिसमें किसी व्यक्ति की पहचान उसके जीवन तक सीमित नहीं रहती। जिन लोगों के अंतिम समय में कोई अपना नहीं था, उनके लिए अंतिम संस्कार, तर्पण और पिंडदान के जरिए अमन कबीर सेवा न्यास ने मृत्यु के बाद भी एक रिश्ते की जिम्मेदारी निभाने का प्रयास किया है। काशी की परंपरा में यह सवाल भी सामने आता है कि जब जीवन में साथ छूट जाए, तो क्या मृत्यु के बाद भी किसी को पूरी तरह अकेला छोड़ दिया जाना चाहिए।

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