मुक्ति के घाट पर नरक झेल रही मोक्षदायिनी, गंगा में रोज प्रवाहित किया जा रहा 400 क्विंटल कोयला-राख
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मुक्ति को देने वाले इस घाट पर स्वयं भगवान शंकर मरने वाले को तारक मंत्र देते हैं। दूसरी ओर मोक्ष देने वाली मां गंगा इस घाट पर स्वयं नरक झेल रही हैं। दाह संस्कार के लिए आने वाले अपने कपड़े और बांस आदि अंतिम संस्कार का सामान गंगा और घाट पर छोड़कर चले जाते हैं।
चिताओं के अंतिम अवशेष भी गंगा में प्रवाहित किए जा रहे हैं। अन्य घाटों की तरह गंगा के दोनों किनारे यहां भी सिमट गए हैं। पानी का रंग काला होने और किनारे पर जमा गाद से बदबू उठने के कारण स्थानीय लोगों ने घाट पर स्नान बंद कर दिया है।
बटुकों ने घाट किनारे संध्या करना बंद कर दी है। घाट पर रोजाना 100-150 शवों का अंतिम संस्कार किया जाता है। एक शव के दाह में तीन क्विंटल तक लकड़ी जलाई जाती है। मतलब, रोजाना 400 से 450 क्विंटल लकड़ियों की राख गंगा में प्रवाहित होती है। घाट के किनारे गाद ही गाद जमा हो गई है।
आने वाली पीढ़ी गंगा को नहीं देख पाएगी
हम लोग गंगा किनारे तीन-तीन घंटे बैठकर संध्या करते थे लेकिन अब दस मिनट बैठना भी मुश्किल हो जाता है। शाम होते ही बदबू बढ़ जाती है। घाट पर दुकान लगाने वाले गंगा की मौजूदा दशा से बहुत आहत हैं।
सतुआ बाबा आश्रम के महामंडलेश्वर संतोष दास का कहना है कि पुराणों में मान्यता है कि अंतिम संस्कार के बाद अस्थियों का प्रवाह जल में किया जाता है लेकिन चिता की राख, कोयला, कपड़ा भी गंगा में प्रवाहित करने की परंपरा मानव ने खुद बना ली है। काशी में गंगा नहीं रही तो कैसे पुण्य कमाएंगे।
गंगा संरक्षण के लिए सख्त नियम बनाने होंगे। वैकल्पिक व्यवस्था करनी होगी। गंगा जिस दिन चली जाएंगी हमारी संस्कृति, सभ्यता, धर्म, सत्ता और समाज सभी का विनाश हो जाएगा। गंगा के लिए पांच साल की सरकारों से हम अपेक्षा नहीं कर सकते। सजग नहीं हुए तो हमने तो गंगा को देख लिया आने वाली पीढ़ी गंगा को नहीं देख पाएगी।
इसी घाट से हुई थी काशी की उत्पत्ति
शिव और शक्ति द्रवीभूत स्वरूप में इस कुंड में विराजमान रहते हैं। गंगा के जलस्तर में गिरावट के कारण कुंड सूखने के कगार पर है। इसी घाट पर जगद्गुरु शंकराचार्य का भगवान शिव के साथ शास्त्रार्थ हुआ था और रामकृष्ण परमहंस को शिव का प्रथम दर्शन भी यहीं हुआ था।
गंगा सफाई और जागरूकता के लिए केंद्र और प्रदेश सरकार की ओर से हर महीने 25 लाख रुपये खर्च किए जा रहे हैं। फिर भी न तो घाटों पर गंदगी रुक रही है, न ही गंगा में कचरा फेंकना रुका है। गंगा में गंदगी फैलने से रोकने और लोगों को जागरूक करने के लिए नगर निगम ने चार स्वयंसेवी संगठन लगाए हैं।
इन संगठनों को छह जोन में बांटकर जागरूक करने की जिम्मेदारी दी गई है। नगर निगम ने घाटों की सफाई की जिम्मेदारी आईएलएफएस को दी है। तीन साल के लिए लगभग 25 करोड़ की धनराशि संस्था को दी गई है। इसके बाद भी घाटों पर छुट्टा पशु घूमते रहते हैं। गोबर फैला रहता है।