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सौभाग्य के धागों से काशी में निखरा सोरहिया मेला

Sat, 10 Sep 2016 02:45 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला/वाराणसी
ब्यूरो, अमर उजाला/वाराणसी Updated Sat, 10 Sep 2016 02:45 AM IST
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Fortunately threads Sorhia Fair flourished in Kashi
लक्ष्मी कुंड में लगे सोरहिया मेले में उमड़े श्रद्धालु।
सोलह गांठ वाले सौभाग्य, सुख, समृद्धि के प्रतीक धागे को धारण करने के साथ ही शुक्रवार को काशी में महालक्ष्मी की आराधना का व्रत आरंभ हो गया। व्रतियों ने सविधि पूजा, संकल्प के बाद रत्न, आभूषणों से जड़ित महालक्ष्मी के दरबार में हाजिरी लगाई। इसी के साथ लक्ष्मीकुंड पर 16 दिन चलने वाला सोरहिया मेला गुलजार हो गया। महालक्ष्मी की प्रतिमाओं की देर रात तक खरीदारी की गई। मेले में बच्चों के खिलौनों से लेकिन महिलाओं के सौंदर्य प्रसाधन के सामान कुंड परिसर के अलावा गलियों में सज गए हैं। 
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लक्ष्मीकुंड पर महालक्ष्मी का भोर में ही गुलाब, गेंदा, रजनीगंधा, बेला के फूलों से शृंगार किया गया। इसके बाद मां को स्वर्ण, रजत आभूषण धारण कराया गया। महालक्ष्मी के शृंगार के बाद पुत्र, अन्न, धन प्राप्ति की कामना वाले सौभाग्य के प्रतीक 16 गांठ वाले धागे का वितरण किया गया। धागा लेने के लिए लक्ष्मी कुंड पर महिलाओं की भीड़ लगी रही। जिन महिलाओं ने धागा धारण किया, वह 16 दिन तक सोरहिया का व्रत रखेंगी।
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लोक परंपरा के अनुसार काशी में घर-घर महालक्ष्मी की मिट्टी की प्रतिमाएं प्रतिष्ठापित की गईं। प्रतिमाएं खरीदने के लिए कुंड पर देर शाम तक भीड़ रही। शाम चार बजे मां की झांकी के दर्शन के लिए महिलाओं, युवतियों का रेला उमड़ पड़ा। दर्शन के लिए लक्ष्मीकुंड जाने वाली गलियों में लंबी कतार लग गई। लक्सा मार्ग से लेकर लक्ष्मीकुंड जाने वाली सड़क की दोनों पटिरयों पर सोरहिया मेला निखर गया है। अब व्रती महिलाओं के अलावा काशी की जनता 16 दिन तक लक्ष्मी के दर्शन के लिए कुंड पर पहुंचेगी।
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पं. शिव प्रसाद पांडेय लिंगिया महाराज ने बताया कि कभी काशी आईं 64 योगिनियों में से एक मयूरी योगिनी ने जलतीर्थों की स्थापना के साथ रक्षा के लिए काशी में प्रवास किया था। मयूरी योगिनी ने ही इस कुंड की स्थापना की। पहले इस कुंड के आसपास रामकुंड, सीता कुंड और लक्ष्मण कुंड के रूप में भी जल तीर्थ थे। रामकुंड तो अभी सुरक्षित है लेकिन सीताकुंड का अस्तित्व समाप्त हो चुका है। लक्ष्मण कुंड की मान्यता बाद में लक्ष्मीकुंड के रूप में बदल गई। 
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