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भूल गई सरकार, अब किससे लगाएं गुहार

Fri, 08 Oct 2021 12:51 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Fri, 08 Oct 2021 12:51 AM IST
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Forgot the government, now whom to request
पड़ोसी पूछते हैं कि पांडेय जी, विशाल की मूर्ति कब लगेगी। उनके नाम से सड़क बनेगी या नहीं। गेट का नाम भी विशाल के नाम पर रखा जाना था। यह सब कब होगा। इन प्रश्नों पर एकदम निरुत्तर हो जाता हूं। पिछले डेढ़ साल से गुहार लगाकर थक गया हूं। दौड़ भाग के दौरान मंत्री, विधायक आश्वासन की घुट्टी पिलाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जनसंपर्क कार्यालय में भी कई बार पत्र दिया, लेकिन अब तक किसी ने कोई सुध नहीं ली। यह दर्द है वायुसेना में सार्जेंट रहे शहीद विशाल पांडेय के पिता विजय शंकर पांडेय का। यह कहते हुए चौकाघाट के हुकुलगंज में रहने वाले विजय शंकर पांडेय की आंखें भर आईं। कुछ क्षण के लिए लब खामोश हो गए और लंबी सांस खींचते हुए उन्होंने कहा कि अब सब ईश्वर के आसरे छोड़ दिया है।
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रोहनिया के कुरूहुआं के काशीपुर गांव निवासी विजय शंकर पांडेय का परिवार पिछले छह साल से हुकुलगंज में रह रहा है। 17 फरवरी 2019 को श्रीनगर में पेट्रोलिंग के दौरान वायुसेना का हेलीकाप्टर क्रैश हो गया था और पायलट विशाल पांडेय शहीद हो गए थे। इसके बाद राजकीय सम्मान के साथ विशाल का शव बनारस लाया गया। पत्नी माधवी को लखनऊ में सरकारी नौकरी मिली और सेना की ओर से बड़ी धनराशि भी मिली। हालांकि इसके बाद से माधवी शहीद विशाल के माता-पिता से संपर्क में नहीं है। उस दौरान चौकाघाट स्थित घर पर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव मौर्य, कैबिनेट मंत्री अनिल राजभर, राज्यमंत्री रविंद्र जायसवाल आदि कई लोग आए। सभी ने मदद को आश्वस्त किया और वादा किया था कि गांव या घर के पास विशाल की मूर्ति लगाई जाएगी। गांव को जाने वाली सड़क को विशाल के नाम पर रखा जाएगा। हुकुलगंज स्थित सड़क से घर तक जाने वाली गली के प्रवेश द्वार पर विशाल के नाम से गेट लगाया जाएगा। हालांकि यह सब वादों में ही सिमट कर रह गया।
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सिगरा स्थित सिनेमा हाल में मैनेजर की नौकरी दो साल पूर्व छूटने से बेरोजगार पिता विजय शंकर पांडेय ने बताया कि नौ सितंबर 2019 को रोहनिया विधायक सुरेंद्र नारायण सिंह को पत्र दिया था कि गांव में मकान धराशायी हो गया। आवास नहीं है। सिर्फ चार फीट की बाउंड्रीवाल ही बची है।
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सिर्फ टेबल से टेबल घूम रही है फाइल
पिता विजय शंकर पांडेय ने बताया कि स्मारक और मूर्ति बनवाने की फाइल सिर्फ टेबल-टेबल घूम रही है। नवंबर 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय कार्यालय से पत्र मांगा गया था। इसके बाद गांव में स्मारक, सड़क और गेट बनवाने का पत्र सीडीओ, सीआरओ, डीडीओ, एडीएम कार्यालय से होते हुए पर्यटन विभाग तक पहुंचा। अधिकारियों से बीच में वार्ता हुई तो पता चला कि लखनऊ में पत्र भेजा जा चुका है।
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