लगातार घटते वन क्षेत्रों के कारण ही प्राकृतिक आपदाओं का बढ़ रहा है प्रकोप
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
एक तरफ जहां प्राकृतिक संसाधनों के समाप्त होने से पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ अनेक तरह की प्राकृतिक आपदाएं हमारा अस्तित्व मिटाने पर तुली हुई हैं। औद्योगिकीकरण, नगरीकरण, कृषि क्षेत्र के विस्तार, विभिन्न परियोजनाओं एवं मानव आवास हेतु वन क्षेत्रों के सफाए के चलते निरंतर पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन उत्पन्न होता गया। इसी वजह से ग्लोबल वार्मिंग में तेजी से वृद्धि हो रही है और जलवायु परिवर्तन हो रहा है।
अमरनाथ मिश्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय दूबेछपरा, बलिया के पूर्व प्राचार्य एवं समग्र विकास और शोध संस्थान के सचिव पर्यावरणविद् डॉ. गणेश कुमार पाठक बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन से तापमान में तेजी से वृद्धि हो रही है। इसके चलते मृदाक्षरण, भूस्खलन, सूखा, चक्रवात, अति वृष्टि एवं अनावृष्टि जैसी घटनाओं में वृद्धि हो रही है।
जीवधारियों एवं वनस्पतियों के लिए भी खतरा बढ़ता जा रहा है। पादप एवं जीव जातियां समाप्त हो रही हैं। ग्लोबल वार्मिंग से फसल चक्र भी प्रभावित हो रहा है एवं कृषि उत्पादकता कम होने से उत्पादन घटता जा रह है। इससे भविष्य में खाद्यान्न संकट की भी समस्या उत्पन्न हो सकती है।
बलिया सहित पूर्वांचल में है अधिक असंतुलन
डॉ पाठक के अनुसार बलिया सहित पूर्वांचल के जिलों में पर्यावरण की स्थिति बेहद असंतुलित है। सोनभद्र, मिर्जापुर एवं चंदौली जिलों को छोड़ दिया जाए तो शेष सात जिलों आजमगढ़, मऊ, बलिया, जौनपुर, गाजीपुर, चंदौली, वाराणसी एवं संतरविदासनगर में कुल भूमि के क्रमशः 0.03, 0.33, 0.01, 0.02, 0.04, 0.00, 0.16, प्रतिशत भूमि पर ही वन क्षेत्र हैं। जबकि पारिस्थितिकीय संतुलन के लिए कुल भूमि के 33 प्रतिशत भूमि पर वन क्षेत्र आवश्यक है।
ऐसे में अब पर्यावरण एवं पारिस्थितिकीय असंतुलित को बचाए रखने के लिए एक मात्र उपाय वनों की रक्षा या अधिक से अधिक पेड़ लगाना ही है। पूर्वांचल के सात जिलों आजमगढ़, मऊ, बलिया, गाजीपुर, जौनपुर, वाराणसी एवं संतरविदासनगर में एक प्रतिशत से भी कम वन हैं। डॉ पाठक कहते हैं कि अब केवल सरकार के भरोसे वृक्षारोपण के लक्ष्य को नहीं पाया जा सकता। इसमें जन-जन को अपनी सहभागिता निभानी होगी।
- अनवरत लेखन के माध्यम से वस्तुस्थिति को अवगत कराते हुए जनजागरूकता पैदा करना होगा।
- गोष्ठियों, नुक्कण नाटकों, लोकगीतों का आयोजन कर जनजागरूकता बढ़ानी होगी।
- परिवार के प्रत्येक सदस्य के जन्मदिन पर वृक्ष लगाना और जन्मदिन दिवस वाटिका (बर्थडे गार्डन) विकसित करने करने के लिए लोगों को जागरूक करना होगा।
- प्रत्येक उत्सव, त्योहार, शादी की सालगिरह आदि अवसरों पर वृक्ष लगाने को प्रेरित करना होगा।
- क्षेत्र में वृक्ष संरक्षण वृक्षारोपण हेतु भ्रमण कर लोगों को जागृत करने के साथ लोगों को संरक्षण संबंधित विभिन्न योजनाओं से अवगत कराना होगा।