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वाराणसी में भारतीय संगीत के सुर साध रहे सात समंदर पार के कलाकार

Thu, 15 Nov 2018 11:21 AM IST
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी Updated Thu, 15 Nov 2018 11:21 AM IST
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Foreigner artist learning Indian classical music at varanasi
नार्वे के प्रोफेशनल आर्टिस्ट पंडित विकास महाराज से सीख रहे बारीकियां - फोटो : अमर उजाला
 नार्वे के प्रोफेशनल सेक्सोफोन आर्टिस्ट एंडर्स लोने ग्रोन्सेथ को भारतीय संगीत का जादू सात समंदर पार से काशी खींच लाया। ग्रोेन्सेथ 10 दिन से काशी में हैं और बनारस घराने की संगीत विधा से रूबरू हो रहे हैं। सरोद वादक विकास महाराज से वह शास्त्रीय संगीत की दीक्षा ले रहे हैं। भारतीय संगीत के राग व रागिनियों को वह अपने सेक्सोफोन के सुरों में भी पिरो रहे हैं। 
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नार्वे में ग्रोन्सेथ जाने-माने नाम हैं। बतौर सेक्सोफोन आर्टिस्ट नोबेल अवार्ड सेरेमनी में उनकी प्रस्तुतियां होती हैं। उनका खुद का मल्टीवर्स नाम का बैंड है। करीब तीन दशक से संगीत से जुड़े ग्रोन्सेथ को भारतीय संगीत से लगाव था। मानते हैं कि भारतीय संगीत की परंपरा वृहद है। काशी में इसे जानने की लालसा मुझे भारत ले लाई। 2004 में उन्होंने कोलकाता में देवाशीष भट्टाचार्य से संगीत की दीक्षा ली थी।
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चार नवंबर को उन्होंने पंडित विकास महाराज से मुलाकात की और सीखना शुरू कर दिया। 10 दिन में वह राग भैरवी से लेकर बैरागी, यमन, जोग, भोपाली, पूरब, दुर्गा जैसे अलग-अलग रागों से परिचित हो चुके हैं। ग्रोन्सेथ मानते हैं कि कि बीते 10 दिन में जो कुछ सीखा है, उसे मुकम्मल करने-उसमें पारंगत होने में अभी उन्हें दो-तीन साल का वक्त लगेगा।
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पंडित विकास महाराज बताते हैं ग्रोन्सेथ ने सुरों, रागों को बहुत तेजी से पकड़ा है। मैंने पचास वर्षों में जो कुछ जुटाया, दस दिन में उन्हें दे रहा हूं। सीखने की ललक इनमें उम्दा है इसलिए मुझे भी सिखाने में खुशी हो रही है।

जर्मनी के एंटन चार साल से सीख रहे इसराज

Foreigner artist learning Indian classical music at varanasi
इसराज - फोटो : अमर उजाला
सारंगी और सितार का मिलाजुला एक अनोखा भारतीय वाद्य यंत्र है इसराज। अब यह लुप्त हो चुका है लेकिन इसे सीखने के लिए जर्मनी के एंटन एडिंगर चार साल से काशी आ रहे हैं। हर साल दो महीने के लिए वह पंडित विकास महाराज से भारतीय संगीत के शास्त्रीय पक्ष और राग-रागिनी सीख रहे हैं। भैरवी राग से उन्हें बेहद लगाव है। चालीस साल पहले जर्मनी में उन्होंने विकास महाराज का संगीत सुना था।
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