यूपी: पूर्व एडीजी, तत्कालीन एसपी, एएसपी समेत पांच पर धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज
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हाईकोर्ट के आदेश पर प्रदेश के पूर्व एडीजी ला-एडं-आर्डर बृजलाल, तत्कालीन एसपी मनोज कुमार, एएसपी सहित पांच पुलिस अधिकारियों पर गाजीपुर के सदर कोतवाली में डेढ़ माह पहले धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज किया गया है। हाईकोर्ट ने यह आदेश पुलिस वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष बृजेंद्र सिंह यादव द्वारा दाखिल किए गए कोर्ट आफ कंटेम्प्ट पर दिया है।
नौ वर्ष पुराने मामले में 27 नवंबर 2019 को दर्ज हुए इस मुकदमे को लेकर जिला पुलिस के पसीने छूट रहे हैं। नवागत एसपी डा. ओमप्रकाश सिंह ने बताया कि इस प्रकरण में साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं। इसके आधार पर कार्रवाई होगी।
कोर्ट में दाखिल शिकायती पत्र में बृजेंद्र सिंह यादव का आरोप है कि अराजपत्रित पुलिस वेलफेयर एसोसिएशन नाम से पुलिस कर्मियों का संगठन बनाकर विभागीय भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ऩे से नाराज अधिकारी प्रताडि़त करते थे। इसके खिलाफ गुहार लगाई गई, लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं था। इस पर उन्होंने तत्कालीन एडीजी ला-एंड-आर्डर बृजलाल, एसपी मनोज कुमार, एसपीआरए शकील अहमद, आरआई रामबहादुर सिंह व जमानियां कोतवाली के इंस्पेक्टर योगेंद्र प्रसाद शुक्ल के खिलाफ न्यायिक मजिस्ट्रेट निशांत देव के यहां वाद दाखिल किया।
इस पर कोर्ट ने उक्त पांचों अधिकारियों के खिलाफ एफआइआर दर्ज करने का आदेश दिया। इसके खिलाफ पांचों अधिकारियों ने हाईकोर्ट में वाद दाखिल किए। वहां से राहत नहीं मिली तो इसके बाद वह सुप्रीम कोर्ट भी गए। लेकिन वहां भी खारिज हो गया। फिर भी उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं हो रहा था। इस पर बृजेंद्र सिंह यादव ने हाईकोर्ट में कोर्ट आफ कंटेंम्प्ट किया था।
हाईकोर्ट ने उक्त पाचों अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया। अब मुकदमे की छानबीन की जा रही है। देखा जाए तो बृजेंद्र सिंह यादव के मुताबिक पुलिस के उच्चाधिकारियों द्वारा 22 जुलाई 1961 में दि कमेटी फार द वेलफेयर आफ द फैमलीज आफ द मेम्बर्स आफ द पुलिस फोर्स इन यूपी (लखनऊ) नामक संस्था पंजीकृत कराई गई।
इसमें पुलिस के उच्चाधिकारियों ने अपनी-अपनी पत्नियों को पदाधिकारी बनाया। फिर पुलिस कर्मियों के वेतन से 25 रुपये प्रति कर्मचारी प्रतिमाह अवैध कटौती समिति के नाम से करने लगे, जबकि पुलिस कर्मचारी इस समिति के सदस्य भी नहीं थे। इस कटौती की राशि प्रति वर्ष तकरीबन 10.5 करोड़ रुपये होती रही। पांच वर्ष बाद समिति अपंजीकृत हो गई फिर भी अपंजीकृत संस्था के नाम पर वसूली जारी थी।