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पिता अभिभावक ही नहीं, दोस्त भी

Sat, 27 Jun 2020 01:00 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sat, 27 Jun 2020 01:00 AM IST
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father
वाराणसी। ऋग्वेद में पिता शब्द शिशु पालन कर्ता के रूप में माना गया है। बचपन में सिखाई गई अनुशासन की बातें भले ही उस दौरान कड़वी लगती हों लेकिन सफ लता की सीढ़ी चढने के साथ ही उसका बेहतर परिणाम देखने को मिलता है। पिता ना केवल अभिभावक की भूमिका निभाते हैं बल्कि एक दोस्त की तरह भी होते हैं। जो समय-समय पर बेटे और बेटियों को उनकी जरूरतों के मुताबिक, कठिन डगर में राह दिखाने का काम करते हैं। कुछ ऐसे ही पिता की कहानी उनके बच्चों की जुबानी आज बयां की जा रही है।
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बेटियां ही जब बेटों जैसी तो फिर क्या चाहिए
जब बेटियां ही बेटों जैसी, तो फिर क्या चाहिए उन्होंने इस बात की कभी फिक्र नहीं कि उनके पास औलाद के रूप में बेटा नहीं है। वह कहते थे जब बेटियां ही बेटों जैसी हों तो फिर क्या चाहिए। पिताजी की सोच हमेशा सकारात्मक रही। एक डॉक्टर फैमिली में पैदा होकर हमनें शुरू से दादा जी, ताऊ जी और बुआ को पेशेंट की सेवा करते हुए ही देखा था। पापा के मार्गदर्शन की बदौलत हम आज सफ ल मुकाम हासिल कर पाए हैं। डॉ. कीर्ति अग्रवाल, दंत चिकित्सक
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कठिन परिस्थितियों का सामना करना पिता से सीखा
मैंने पिताजी से कठिन परिस्थितियों में हिम्मत न खोना और मजबूती से उनका सामना करना सीखा है। जीवन के हर क्षेत्र में ईमानदारी से जीना स्वच्छता से जीवन को स्वीकार करके संतुष्ट होना और धैर्य रखना यह पिताजी की विशेषताएं रहीं। कार्य क्षेत्र में उनकी वाकपटुता, कार्यकुशलता और भावभंगिमा को आज भी उनके साथ काम करने वाले याद करते हैं। यह मुझे अच्छा काम करने की और एक अच्छा इंसान बनने की प्रेरणा देता है। डॉ. श्वेता गौतम, चिकित्सक
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जीवन भर की पूंजी बन गए पिताजी के संस्कार
पिताजी से जो संस्कार मिले वह जीवन भर की पूंजी बन गए। सादगी, सरलता और ईमानदारी का पाठ बचपन से ही उन्होंने पढ़ाया। पृष्ठभूमि ग्रामीण थी तो सख्ती भी थोड़ी ज्यादा थी, लेकिन विश्वास और प्रेम तो हमेशा अनंत रहा। पिताजी ने सिखाया कि कभी भी जीवन में कठिन परिस्थितियों में हार ना मानना। कैसी की स्थिति हो, विपरीत परिस्थिति हो खुद पर भरोसा रखना। पिताजी के दिए संस्कार आज भी साथ चलते हैं। प्रज्ञा पांडेय, मिसेज इंडिया ईस्ट

वह सजा बन गई जीवन भर का मार्गदर्शन
बचपन से पिताजी की कार्यशैली को देखा था। हर काम अनुशासित और व्यवस्थित था उनका। बचपन में बस एक बार उन्होंने गलती पर सजा दी थी। उनकी वह सजा मेरे लिए जीवन भर का मार्गदर्शन बन गई। आज भी उनके मूल्यों का पालन कर रहा हूं। उनके संस्कारों, आदर्शों और जीवन दर्शन पर चलकर बेहतर करने का प्रयास जारी है। भले ही पिताजी हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनका प्रेम, अहसास, आदर्श और संस्कार हमारे अंदर जीवित है। आरकेपाठक, समाजसेवी
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