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आश्चे बोछोर आबर होबे: सिंदूर खेला के साथ दी गई मां को विदाई, ढोल-नगाड़ों पर थिरकीं महिलाएं
Thu, 26 Oct 2023 12:48 PM IST
किरन रौतेला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
Published by: किरन रौतेला
Updated Thu, 26 Oct 2023 12:48 PM IST
सार
सनातन परंपरा की विशेषता है कि कोई भी शुभकार्य समाप्त नहीं होता, पुनः होने की उम्मीद के साथ संपन्न होता है। दुर्गा पूजा, छठ, गणपति उत्सव एक बार संपन्न होते ही अगले वर्ष के लिए मन तैयार हो जाता है। मान्यता है कि मां दुर्गा नवरात्र के दौरान मायके आती हैं और 10 दिन रुकने के बाद फिर वापस ससुराल जाती हैं। मां के रुकने के उपलक्ष्य में दुर्गा पूजा का उत्सव मनाया जाता है।
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जंगम बाड़ी स्थित ईगल क्लब में माता दुर्गा के प्रतिमा के समक्ष सिंदूर खेलती महिलाएं। उज्जवल गुप्ता
- फोटो : उज्जवल गुप्ता, संवाद
विस्तार
आश्चे बोछोर आबर होबे... अर्थात ससुराल को विदाई देते हुए दोबारा जल्दी आना का उद्घोष बंगाली समुदाय के पंडालों में गूंज उठा। मंगलवार को भेलूपुर से लेकर दशाश्वमेध तक बंगाली समुदाय ने मां जगदंबा को भीगी पलकों के साथ विदाई दी। बैंड बाजे की धुन पर थिरकती हुए महिलाओं ने सिंदूर खेला की रस्म भी निभाई और जब विदाई का मौका आया तो आंखें भी छलक उठीं।
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दशमी तिथि पर शाम ढलते ही बंगाली पंडालों की रौनक देखते ही बन रही थी। महिलाएं कतारबद्ध होकर माता को सिंदूर अर्पित कर रहीं थीं और एक दूसरे को सिंदूर लगा रही थीं। कई पंडालों में तो सिंदूर की होली ऐसी खेली गई कि हर चेहरे पर माता के सिंदूर की लालिता बिखरी नजर आ रही थी। सिंदूर खेला की समाप्ति के बाद मां को विदाई दी गई। मां का विसर्जन कर उनसे जल्दी दोबारा वापस आने की प्रार्थना की गई। मंगलवार को दोपहर के बाद से ही पंडालों में विदाई की रस्में शुरू हो गईं। पहले सुहागिन महिलाओं ने मां दुर्गा को पान के पत्ते से सिंदूर चढ़ाया और मिठाई खिलाई। इसके बाद सभी महिलाओं ने एक-दूसरे को सिंदूर लगाना शुरू किया। पूरा पंडाल सिंदूरी रंगत में रंगा नजर आ रहा था। इसके बाद धुनुची नृत्य के साथ माता को विदाई दी गई और बोरन की प्रथा भी निभाई गई।
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जंगम बाड़ी स्थित ईगल क्लब में माता दुर्गा के प्रतिमा के समक्ष सिंदूर खेलती महिलाएं।
- फोटो : उज्जवल गुप्ता, संवाद
निभाई गई बोरन की परंपरा
सनातन परंपरा की विशेषता है कि कोई भी शुभकार्य समाप्त नहीं होता, पुनः होने की उम्मीद के साथ संपन्न होता है। दुर्गा पूजा, छठ, गणपति उत्सव एक बार संपन्न होते ही अगले वर्ष के लिए मन तैयार हो जाता है। मान्यता है कि मां दुर्गा नवरात्र के दौरान मायके आती हैं और 10 दिन रुकने के बाद फिर वापस ससुराल जाती हैं। मां के रुकने के उपलक्ष्य में दुर्गा पूजा का उत्सव मनाया जाता है।
अगले साल मां जल्दी आएं
जिस तरह से बेटी अपने मायके से विदा होती है, उसी तरह से आज मां दुर्गा की हमलोग विदाई कर रहे हैं। एक तरफ जहां मां के जाने का गम है, वहीं अगले वर्ष मां दुर्गा जल्दी आए, इसके लिए हमें खुशी भी है। - लता दास, श्रद्धालु
विश्व शांति की कामना से हुआ माता का पूजन
मां दुर्गा से प्रार्थना की है कि आज विश्व में कई देश एक दूसरे से लड़ रहे हैं। पूरे विश्व में शांति आए और लोगों के मन से भय का वातावरण खत्म हो, इसी उद्देश्य के साथ हम लोगों ने पूजा अर्चना की है। - सुदीपा सरकार बोस, श्रद्धालु
सनातन परंपरा की विशेषता है कि कोई भी शुभकार्य समाप्त नहीं होता, पुनः होने की उम्मीद के साथ संपन्न होता है। दुर्गा पूजा, छठ, गणपति उत्सव एक बार संपन्न होते ही अगले वर्ष के लिए मन तैयार हो जाता है। मान्यता है कि मां दुर्गा नवरात्र के दौरान मायके आती हैं और 10 दिन रुकने के बाद फिर वापस ससुराल जाती हैं। मां के रुकने के उपलक्ष्य में दुर्गा पूजा का उत्सव मनाया जाता है।
अगले साल मां जल्दी आएं
जिस तरह से बेटी अपने मायके से विदा होती है, उसी तरह से आज मां दुर्गा की हमलोग विदाई कर रहे हैं। एक तरफ जहां मां के जाने का गम है, वहीं अगले वर्ष मां दुर्गा जल्दी आए, इसके लिए हमें खुशी भी है। - लता दास, श्रद्धालु
विश्व शांति की कामना से हुआ माता का पूजन
मां दुर्गा से प्रार्थना की है कि आज विश्व में कई देश एक दूसरे से लड़ रहे हैं। पूरे विश्व में शांति आए और लोगों के मन से भय का वातावरण खत्म हो, इसी उद्देश्य के साथ हम लोगों ने पूजा अर्चना की है। - सुदीपा सरकार बोस, श्रद्धालु