फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   Famous poet nazir banarasi birth anniversary special

साहित्य लाइवः ‘हमने तो नमाजें भी पढ़ी हैं अक्सर, गंगा तेरे पानी से वजू करके...’

Mon, 27 Nov 2017 10:30 AM IST
amarujala.com, presented by तबस्सुम
amarujala.com, presented by तबस्सुम Updated Mon, 27 Nov 2017 10:30 AM IST
विज्ञापन
Famous poet nazir banarasi birth anniversary special
शायर नजीर बनारसी - फोटो : file photo
‘सोएंगे तेरी गोद में एक दिन मरके, हम दम भी जो तोड़ेंगे तेरा दम भर के, हमने तो नमाजें भी पढ़ी हैं अक्सर, गंगा तेरे पानी से वजू करके...।’ जिनकी लेखनी का एक-एक शब्द काशी की रूह को थामे हुए था, कलम ने जब भी कोई शेर गढ़ा, देश को सलामी दे गया। गंगा-जमुनी तहजीब को जीने वाले ऐसे शायर थे नजीर बनारसी।
विज्ञापन


देश के बंटवारे का दर्द जिनकी रुबाइयां बनीं, हिंदू-मुसलमान में फर्क को तार-तार करना जिनकी इबादत थी, ऐसे शायर थे नजीर बनारसी। काशी के घाटों-मंदिरों के बीच पले-बढ़े नजीर ने इसे शब्दों में क्या खूब गढ़ा था- ‘मैं वो काशी का मुसलमां हूं कि जिसको ऐ नजीर, अपने घेरे में लिए रहते हैं बुतखाने कई...।’
विज्ञापन


25 नवंबर, 1909 को मदनपुरा में जन्मे नजीर बनारसी का बचपन काशी की गलियों में बीता। घाटों-मंदिरों के इस शहर का असर उन पर गहराई तक था। शेर-ओ-शायरी को उर्दू के दायरे से निकालकर हिंदी के साथ मिलन कराने का फख्र उन्हें ही हासिल है।
विज्ञापन
विज्ञापन


पेशे से कभी हकीम रहे नजीर बनारसी ने अपने कलाम में हिंदी के हर्फों को पिरोया, ऐसी रुबाइयां लिखीं जो आसान थीं, उनमें उर्दू की बंदिश नहीं थी। बनारस, यहां की गलियों और गंगा पर उन्होंने जो लिख दिया, वे रचनाएं आज खुद नजीर बन चुकी हैं। बेबाक शायर नजीर बनारसी सच्चे बनारसी थे।

कहते हैं कि ‘बनारसी’ लफ्ज कुछ ही लोगों पर जंचता है, उनमें से एक थे नजीर। गंगा जिसके बिना बनारस पूरा नहीं होता, जो आठों पहर काशी के पांव पखारती है, भला नजीर और उनकी कलम कैसे इससे दूर रहती। 

कभी गंगा के पानी से वजू कर उन्होंने मजहबी बंदिशों को ठोकर मारी तो कभी घाट पर मंदिरों के साए में थकान उतारकर उन्मादी ताकतों को उनकी हद दिखाई। यही वजह है कि उनके आशियाने को ‘कौमी यकजहती सेंटर’ के नाम से जाना जाता है जहां कभी हजारी प्रसाद द्विवेदी, मजरूह सुलतानपुरी, जिगर मुरादाबादी, कैफी आजमी से लेकर डॉ. संपूर्णानंद, गोपाल व्यास और हरिवंश राय बच्चन तक ने उन्हें ‘नजीर’ माना। 

काशी छोड़ने से साफ इंकार

Famous poet nazir banarasi birth anniversary special
नजीर बनारसी का पुश्तैनी मकान - फोटो : अमर उजाला
उनके बड़े बेटे मोहम्मद जहीर बताते हैं कि जब अब्बा थे तब गोल्डन की प्रतिमा विसर्जन जुलूस को देखने के लिए बहन-बेटियों को भी बुलाया जाता था। जब पाकिस्तान से मनमुटाव हुआ, चीन ने आंखें तरेरी, अब्बा ने सबसे पहले उन पर शेर लिखे।

मंझले बेटे मोहम्मद सगीर बताते हैं कि देश के बंटवारे के समय जब मुसलमानों के लिए पाकिस्तान बना तो अब्बा ने अपने वतन को, काशी को छोड़ने से साफ इंकार कर दिया था। वे इसी मिट्टी में खेले थे और कयामत के दिन के लिए इसी मिट्टी में दफन होना उन्होंने कबूल किया।

कई बार बुलावे के बाद भी कभी लाहौर, इस्लामाबाद, करांची नहीं गए। छोटे बेटे रियाज अहमद कहते हैं कि उनकी शेर-ओ-शायरी को हम आगे नहीं बढ़ा पाए, इसका मलाल हमें नहीं क्योंकि वो फन तो अब्बा को कुदरत से मिला था।

बनारस के जिन ताने बाने को नजीर बनारसी ने अपनी शेर-ओ-शायरी और गजलों से गूंथा, आज उसे ही याद करने वाला कोई नहीं। इस बात गम उनके घरवालों को सालता है।

कहते हैं, जो इस शहर की थाती है, उसे आज कोई पूछने वाला नहीं। उन्हें पद्म पुरस्कार के काबिल भी नहीं समझा गया। ‘हृदय’ योजना में नजीर बनारसी के ‘कौमी यकजहती सेंटर’ को संवारने की भी सुगबुगाहट थी लेकिन हुआ कुछ नहीं।

प्रमुख रचनाएं : गंगोजमुन, जवाहर से लाल तक, गुलामी से आजादी तक, चेतना के स्वर, किताब-ए-गजल, राष्ट्र की अमानत राष्ट के हवाले। 
सम्मान : हिंदू उर्दू अकादमी संस्थानों के मानद सदस्य के साथ ही बीएचयू के कोर्ट मेंबर रहे। 
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed