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गीता चन्द्रन के भरतनाट्यम से चहका दुर्गा मंदिर का प्रांगण
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वाराणसी। मां कूष्मांडा का दरबार संगीत की स्वरलहरियों से झंकृत हो उठा। गुुरुवार को दूसरी निशा में गायन, वादन और नृत्य की त्रिवेणी में संगीत के रसिकों ने रात भर डुबकी लगाई। छह दिवसीय शृंगार महोत्सव एवं संगीत समारोह की दूसरी निशा प्रख्यात भरतनाट्यम नृत्यांगना पद्मश्री गीता चंद्रन ने जैसे ही मंच संभाला दर्शक उनकी भाव भंगिमाओं के मुरीद हो उठे। मृदंगम की थाप पर घुंघरुओं की झंकार से दुर्गाकुंड स्थित मंदिर प्रांगण झंकृत हो उठा।
गीता चंद्रन ने सबसे पहले मदुरई के शिव पर आधारित तमिल में शिव कवित्त प्रस्तुत कर मां कूष्मांडा को नमन किया। तत्पश्चात उन्होंने राग मलिक में देवी पर आधारित श्लोक अम्बा शाम्भवी... प्रस्तुत किया। उसके बाद गीता चंद्रन ने भरतनाट्यम की प्राचीन विधा प्रस्तुत किया। राग खमास... आदि ताल में निबद्ध चामुण्डेश्वरी देवी पर आधारित नृत्य देख हर कोई मंत्रमुग्ध हो गया। अन्त में उन्होंने आदि शंकराचार्य द्वारा रचित आई गिरी नन्दिनी की प्रस्तुति कर खूब तालियां बटोरीं। उनके साथ बोल पढ़ंत पर गुरू एस. शंकर, गायन पर के .वेंकेटेश्वर, मृदंगम पर एम.वी .चन्द्रशेखर एवं बांसुरी पर रोहित प्रसन्ना ने संगत की।
कार्यक्रम की दूसरी प्रस्तुति शास्त्रीय गायन की रही। काशी की युवा शास्त्रीय गायिका डॉ. शिवानी आचार्य ने सबसे पहले पद्मश्री राजेश्वर आचार्य द्वारा तैयार की गयी राग रागेश्री में विलंबित एकताल में निबद्ध बंदिश धन महिमा तोरी... प्रस्तुत किया। उसके बाद द्रुत तीन ताल में निबद्ध बंदिश पार करो नईया मईया मोरी... पेश किया। अन्त में कजरी से समापन किया। तबले पर पं. नंद किशोर मिश्र एवं हारमोनियम पर कुमार विक्की रहे। कार्यक्रम की तीसरी प्रस्तुति प्रयागराज से आये सितारवादक पं. साहित्य कुमार नाहर एवं डॉ. शोभित नाहर के सितार जुगलबन्दी की रही। समारोह की चौथी प्रस्तुति बनारस के शास्त्रीय गायक पं. गणेश प्रसाद मिश्रा की रही। कार्यक्रम का संचालन सोनू झा एवं सीमा केशरी ने संयुक्त रूप से किया। कलाकारों का स्वागत मंदिर के महंत राजनाथ दुबे ने किया।
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गीता चंद्रन ने सबसे पहले मदुरई के शिव पर आधारित तमिल में शिव कवित्त प्रस्तुत कर मां कूष्मांडा को नमन किया। तत्पश्चात उन्होंने राग मलिक में देवी पर आधारित श्लोक अम्बा शाम्भवी... प्रस्तुत किया। उसके बाद गीता चंद्रन ने भरतनाट्यम की प्राचीन विधा प्रस्तुत किया। राग खमास... आदि ताल में निबद्ध चामुण्डेश्वरी देवी पर आधारित नृत्य देख हर कोई मंत्रमुग्ध हो गया। अन्त में उन्होंने आदि शंकराचार्य द्वारा रचित आई गिरी नन्दिनी की प्रस्तुति कर खूब तालियां बटोरीं। उनके साथ बोल पढ़ंत पर गुरू एस. शंकर, गायन पर के .वेंकेटेश्वर, मृदंगम पर एम.वी .चन्द्रशेखर एवं बांसुरी पर रोहित प्रसन्ना ने संगत की।
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कार्यक्रम की दूसरी प्रस्तुति शास्त्रीय गायन की रही। काशी की युवा शास्त्रीय गायिका डॉ. शिवानी आचार्य ने सबसे पहले पद्मश्री राजेश्वर आचार्य द्वारा तैयार की गयी राग रागेश्री में विलंबित एकताल में निबद्ध बंदिश धन महिमा तोरी... प्रस्तुत किया। उसके बाद द्रुत तीन ताल में निबद्ध बंदिश पार करो नईया मईया मोरी... पेश किया। अन्त में कजरी से समापन किया। तबले पर पं. नंद किशोर मिश्र एवं हारमोनियम पर कुमार विक्की रहे। कार्यक्रम की तीसरी प्रस्तुति प्रयागराज से आये सितारवादक पं. साहित्य कुमार नाहर एवं डॉ. शोभित नाहर के सितार जुगलबन्दी की रही। समारोह की चौथी प्रस्तुति बनारस के शास्त्रीय गायक पं. गणेश प्रसाद मिश्रा की रही। कार्यक्रम का संचालन सोनू झा एवं सीमा केशरी ने संयुक्त रूप से किया। कलाकारों का स्वागत मंदिर के महंत राजनाथ दुबे ने किया।
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