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UP: कार्बाइड गन से पूर्वांचल में 65 बच्चों की आंखों की रोशनी गई, दीपावली पर 300 रुपये में बिक रही थी बंदूक

Sat, 27 Dec 2025 12:06 PM IST
शाहरुख खान रबीश श्रीवास्तव, अमर उजाला, वाराणसी
रबीश श्रीवास्तव, अमर उजाला, वाराणसी Published by: शाहरुख खान Updated Sat, 27 Dec 2025 12:06 PM IST
सार

पूर्वांचल में कार्बाइड गन से 65 बच्चों की आंखों की रोशनी चली गई। इनमें 30 बच्चे 14 साल से कम उम्र वाले हैं। दिवाली पर कार्बाइड गन का जमकर इस्तेमाल हुआ था। बीएचयू और बनारस के निजी अस्पतालों में इनका इलाज चल रही है। 

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Diwali Accident: Carbide Gun Made from Plastic Pipe Snatches Eyesight of 65 Children in Purvanchal
कार्बाइड गन से बच्चों की आंखों की रोशनी गई - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

दीपावली पर प्लास्टिक से बनी कार्बाइड गन से पूर्वांचल के 65 बच्चों की आंखों की रोशनी चली गई है। इनकी रोशनी वापस लाने का अब सर्जरी ही विकल्प है। यूट्यूब पर देखकर 300 रुपये में प्लास्टिक के पाइप से बनाई इस गन का दो महीने पहले दिवाली पर जमकर उपयोग किया गया। 
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आंखें जख्मी हुईं तो पूर्वांचल और बिहार से बच्चों को बीएचयू, बनारस के बाकी अस्पतालों में इलाज के लिए लाया गया। इनमें से 30 से ज्यादा बच्चों की उम्र 5 से 14 साल है। 18 से 23 साल के 10 युवाओं की आंखों की रोशनी भी गई है।
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कार्बाइड के चलते इन बच्चों के आंखों की काली पुतली आपस में चिपक गई। इन बच्चों का दो महीने से इलाज चल रहा है। कुछ बच्चों की सर्जरी बीएचयू के क्षेत्रीय नेत्र संस्थान में जनवरी के दूसरे हफ्ते में होना है।
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दीपावली पर वाराणसी सहित आजमगढ़, गाजीपुर,मऊ, बलिया, जौनपुर सहित अन्य जिलों में बच्चों ने प्लास्टिक वाली कार्बाइड गन का जमकर इस्तेमाल किया है। बाजार में जहां पटाखे की गोली छोड़ने के लिए बंदूक 500 रुपये और उससे ज्यादा कीमत पर मिलती थी, वहीं बच्चों ने सोशल मीडिया पर कार्बाइड वाली गन बनाने का तरीका देख खुद बनाई है। 
 

इनमें 300 रुपये के समान का इस्तेमाल किया। कुछ छोटे कस्बों में ठेले और छोटे दुकानदारों ने भी इसे बेचा है।
 

बीएचयू में डेढ़ महीने में 40 बच्चों का हुआ इलाज
बीएचयू के क्षेत्रीय नेत्र संस्थान के विभागाध्यक्ष प्रो. आरपी मौर्य ने बताया कि दीपावली के एक सप्ताह पहले और उसके 15 दिन बाद तक ऐसे केस आए। पिछले डेढ़ महीने में करीब पटाखे जलाने से आंख में चोट लगने वाले करीब 40 बच्चों, युवाओं का इलाज किया गया। 
 

इनमें 22 केवल कार्बाइड गन से चोटिल हुए थे। पूर्वांचल के साथ ही कुछ बच्चे बिहार के अलग-अलग जिलों से आए थे। 80 फीसदी ऐसे लोग चोटिल हुए जो कार्बाइड गन चला रहे थे जबकि 20 फीसदी ऐसे लोग भी चोटिल हुए जो कि गन चलाते हुए देख रहे थे। 

 

बीएचयू में ही बाकी नेत्र रोग के डॉक्टरों के पास भी 18 ऐसे मरीज पहुंचे हैं। बीएचयू के ही प्रो. प्रशांत भूषण और डॉ दीपक मिश्रा ने अलग-अलग दिनों में चली ओपीडी में करीब 10 से ज्यादा बच्चों को देखा है। जांच कराई तो पता चला कि बच्चों के आंखों की काली पुतली ही चिपक गई थी।
 

नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ अनुराग टंडन ने दिसंबर में आजमगढ़ के छह साल के बच्चे की सर्जरी की है। अक्तूबर से अब तक तीन ऐसी सर्जरी वो कर चुके हैं। एक बच्चे की उम्र छह साल, एक की 8 और तीसरे बच्चे की उम्र 10 साल है।
 

दो और बच्चों की सर्जरी होनी है। डॉ. टंडन के मुताबिक, आंख में कार्बाइड के कण चले जाने से आंख में काली पुतली खराब हो गई थी। काली पुतली एक पारदर्शी झिल्ली होती है। उसके खराब होने से आंखों की रोशनी चली जाती है। इसके ठीक होने की संभावना बहुत ही कम होती है। ऐसे मामले में नेत्र प्रत्यारोपण ही एक विकल्प होता है।

कहां कितने बच्चों का इलाज
बीएचयू में 40
डॉ अनुराग टंडन के यहां 5
डॉ आर के ओझा के यहां 10
डॉ सुनील शाह के यहां 10
(इसके अलावा भी कुछ बच्चे निजी अस्पतालों में इलाज के लिए पहुंचे हैं)

बीएचयू ने किया शोध, गुवाहाटी के सम्मेलन में भेजा
बीएचयू ने इस पर शोध कराया है जिसको गुवाहाटी में आयोजित दो दिवसीय अखिल भारतीय नेत्र चोट संस्थान के वार्षिक सम्मेलन में रेजिडेंट डॉक्टर प्रेरणा चौधरी शोध पत्र प्रस्तुत करेंगी। क्षेत्रीय नेत्र संस्थान के प्रो. दीपक मिश्रा ने बताया कि दीपावली के बाद से ही कार्बाइड वाली गन से चोटिल बच्चों के आने का सिलसिला शुरू हुआ था।
 

नेत्र चिकित्सकों की संस्था भारतीय नेत्र संगठन (इंडियन आप्थोलोमाजिकल सोसाइटी) की ओर से देश के 20 डॉक्टरों की टीम गठित की गई है। डॉक्टर कार्बाइड गन के प्रयोग से लगने वाली चोट आदि का अध्ययन कर रहे हैं।
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