UP News: शिक्षिका की मौत के बाद फर्जी तरीके से मृतक आश्रित बन पाई नौकरी, पिता-पुत्र पर मुकदमा
सतर्कता अधिष्ठान के वाराणसी सेक्टर थाने में मिर्जापुर के लोकापुर गांव निवासी नाथेराम और उसके बेटे कतवारू का पुरा के रहने वाले कृष्णकांत के खिलाफ धोखाधड़ी, कूटरचना और आपराधिक षड्यंत्र सहित अन्य आरोपों में मुकदमा दर्ज किया गया है।
विस्तार
मिर्जापुर में प्राथमिक विद्यालय की एक शिक्षिका की मौत के बाद एक व्यक्ति ने फर्जी तरीके से अपने बेटे को उनका विधिक वारिस घोषित कराकर मृतक आश्रित कोटे के तहत नौकरी दिला दी। प्रकरण की शिकायत होने पर सतर्कता अधिष्ठान ने जांच की। जांच में दोष उजागर होने पर सतर्कता अधिष्ठान के वाराणसी सेक्टर थाने में मिर्जापुर के लोकापुर गांव निवासी नाथेराम और उसके बेटे कतवारू का पुरा के रहने वाले कृष्णकांत के खिलाफ धोखाधड़ी, कूटरचना और आपराधिक षड्यंत्र सहित अन्य आरोपों में मुकदमा दर्ज किया गया है।
सतर्कता अधिष्ठान के वाराणसी सेक्टर की इंस्पेक्टर सुनीता सिंह के अनुसार 22 मार्च 1976 को सुमित्रा देवी की तैनाती सहायक अध्यापिका के पद पर मिर्जापुर में हुई थी। नौकरी के दौरान 16 दिसंबर 1990 को सुमित्रा देवी की मौत हो गई। सुमित्रा देवी की जगह मृतक आश्रित के तौर पर कृष्णकांत को बेसिक शिक्षा विभाग में समायोजित किया गया।
ऐसे बताया खुद को शिक्षिका का वारिस
इस संबंध में शिकायत मिलने पर सतर्कता अनुभाग के निर्देश पर जांच की गई। जांच में सामने आया कि कृष्णकांत के पिता नाथेराम का मूल निवास स्थान लोकापुर है। उसके परिवार रजिस्टर में 13 सदस्यों की सूची में सुमित्रा देवी का नाम नहीं दर्ज है। इसके बावजूद नोटरी शपथ पत्र में नाथेराम ने सुमित्रा देवी को अपनी पत्नी बताते हुए अपने पुत्र कृष्णकांत को उनका विधिक वारिस बताया।
नाथेराम के शपथ पत्र के आधार पर तत्कालीन लेखपाल की रिपोर्ट के आधार पर मिर्जापुर के तहसीलदार सदर ने कृष्णकांत को वारिस प्रमाण पत्र जारी कर दिया। उसी प्रमाण पत्र के आधार पर सुमित्रा देवी के मृतक आश्रित के तौर पर कृष्णकांत बेसिक शिक्षा विभाग में समायोजित हुआ। जांच में पाया गया कि कृष्णकांत न तो सुमित्रा देवी का बेटा है और न विधिक वारिस है।
तत्कालीन लेखपाल और बेसिक शिक्षा अधिकारी की थी मिलीभगत
इंस्पेक्टर सुनीता सिंह के अनुसार कृष्णकांत को मृतक आश्रित के तौर पर बेसिक शिक्षा विभाग में समायोजित कराने में तत्कालीन लेखपाल स्व. शेषमणि और बेसिक शिक्षा अधिकारी स्व. दयाशंकर सिंह की अहम भूमिका रही है। तत्कालीन लेखपाल व बेसिक शिक्षा अधिकारी की कृष्णकांत व नाथेराम से मिलीभगत थी। यह सब छल की नियत से गलत तरीके से लाभ पाने के लिए किया गया था।