वाराणसी में कछुए की माैत : प्रदूषण से फेफड़े में हुआ संक्रमण, 40 साल और जिंदा रह सकता था; यहा किया गया दफन
इस प्रजाति के कछुओं के पैर में निशान होते हैं। कछुआ साफ्ट सील टर्टल प्रजाति का था। इसकी उम्र करीब 120 से 150 तक होती है। मरने वाला कछुए की उम्र करीब 80 साल थी।
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फेफड़े में संक्रमण से हुए छेद के कारण शंकुलधारा का कछुआ मरा था। इसे लंग्स इंफेक्शन एंड लंग्स पंचर कहा जाता है। मंगलवार को सारनाथ में कछुआ की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह सामने आया। सारनाथ स्थित मिनी जू के पीछे कछुआ को दफन किया गया।
सारनाथ में वन विभाग और पशु चिकित्सा विभाग के तीन डाक्टरों डॉ. प्रताप नारायण, डॉ. राम आधार चौधरी और डॉ. सुधांशु सिंह ने कछुआ का पोस्टमार्टम किया। डाक्टरों के अनुसार चीनी मांझे से मौत नहीं हुई है।
बताया जा रहा है कि वह अभी 40 साल तक और जीवित रह सकता था। शंकुलधारा पोखरे का पानी केमिकलयुक्त था। उसके फेफड़े में पानी भर गया था और लंग्स पंचर था। इससे सांस नहीं ले पा रहा था।
जांच अधिकारी और उप प्रभागीय अधिकारी राकेश कुमार ने बताया कि स्थानीय लोगों ने मरे कछुआ को द्वारकाधीश मंदिर के पीछे मैदान में दफन कर दिया था। कछुआ को जमीन से निकालकर पोस्टमार्टम कराया गया है। उसे सारनाथ स्थित मिनी जू के पीछे दफन किया गया है।
शंकुलधारा पोखरे सहित कई तालाबों में गंदगी
शंकुलधारा पोखरे में पिंडदान के दौरान लोग सिंदूर, हल्दी सहित केमिकल युक्त सामान डाल देते हैं। इसका असर जलीय जंतुओं पर पड़ता है। शहर में 63 कुंड और तालाब हैं। ज्यादातर कुंडों में गंदगी है।
इससे अक्सर मछलियों और कछुओं की मौत होती है। मूर्ति विसर्जन और पूजा पाठ का सामान डालने से केमिकल चला जाता है। साथ ही लोग कपड़े तालाबों में कपड़े धुलते हैं। इससे भी गंदगी बढ़ती है।
कुंडों और तालाबों से कछुओं को रेस्क्यू किया जाएगा
कछुआ की मौत के बाद वन विभाग ने शहर के सभी तालाबों का सर्वे कराने का योजना बनाई है। विभाग के अधिकारी ने बताया कि कुंडों और तालाबों से कछुआ को रेस्क्यू कर उसे संरक्षित किया जाएगा।