काशी की बेटी मनु की पुण्यतिथि: स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम वनिता थीं महारानी लक्ष्मीबाई, अंग्रेजों से लड़ते-लड़ते रणयज्ञ में दी थी प्राणों की आहुति
वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1835 को वाराणसी के भदैनी में हुआ था। लक्ष्मीबाई देश की आजादी के लिए लड़ते-लड़ते 17 जून 1858 को मात्र 29 वर्ष की अवस्था में देश के लिए शहीद हो गई थीं। उनका नाम मणिकर्णिका रखा गया था। उन्हें बचपन में प्यार से मनु या छबीली के नाम से बुलाया जाता था।
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चमक उठी सन सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी...। रानी लक्ष्मीबाई मराठा शासित झांसी की रानी और भारत की स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम वनिता थीं। भारत को दासता से मुक्त करने के लिए सन 1857 में बहुत बड़ा प्रयास हुआ। अंग्रेजों के विरुद्ध रणयज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देने वाले योद्धाओं में वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई का नाम सर्वोपरी माना जाता है। उनका जीवन स्वयं में वीरोचित गुणों से भरपूर, अमर देशभक्ति और बलिदान की एक अनुपम गाथा है।
महादेव की नगरी काशी की धरती पर जन्म लेने वाली वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई देश की आजादी के लिए लड़ते-लड़ते 17 जून 1858 को मात्र 29 वर्ष की अवस्था में देश के लिए शहीद हो गई थीं। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रो. रमेश प्रसाद ने बताया कि 19 नवंबर 1835 को भदैनी में रानी लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ था। उनका नाम मणिकर्णिका रखा गया था। उन्हें बचपन में प्यार से मनु या छबीली के नाम से बुलाया जाता था।
मनु की अवस्था अभी चार-पांच वर्ष ही थी कि उसकी मां का देहांत हो गया। पिता मोरोपंत तांबे एक साधारण ब्राह्मण और अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय के सेवक थे। माता भागीरथी बाई सुशील, चतुर और रूपवती महिला थीं। अपनी मां की मृत्यु हो जाने पर वह पिता के साथ बिठूर आ गई थीं। यहीं पर उन्होंने मल्लविद्या, घुड़सवारी और शस्त्र विद्याएं सीखीं। सन 1842 में उनकी विवाह झांसी के मराठा शासक राजा गंगाधर राव के साथ हुआ और वह झांसी की रानी बनीं।
सन 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसकी मात्र चार महीने की आयु में ही मृत्यु हो गई। इसके बाद राजा की गंभीर अवस्था को देखते हुए रानी लक्ष्मीबाई ने एक दत्तक पुत्र गोद ले लिया। परंतु इसको ब्रिटिश सरकार ने नकारते हुए झांसी को ब्रिटिश राज्य में मिलाने की घोषणा की। इस घोषणा से आहत रानी लक्ष्मीबाई ने सन 1857 में विद्रोह कर दिया और तात्या टोपे की सेना के साथ मिलकर ब्रिटिश सेना से मुकाबला किया। ग्वालियर के पास ब्रिटिश सेना से लड़ते हुए रानी लक्ष्मीबाई मातृभूमि की आजादी के लिए शहीद हो गईं।