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Ground Report : खेती में पिता का साथ देने ससुराल से आती हैं बेटियां, कट गया था पैर; प्रेरणादायक है ये कहानी

Sat, 19 Oct 2024 01:07 PM IST
अमन विश्वकर्मा अमन विश्वकर्मा, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमन विश्वकर्मा, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Sat, 19 Oct 2024 01:07 PM IST
सार

Varanasi News : वाराणसी के दीनापुर सहित विभिन्न गांवों में फूलों की खेती हो रही है। अलसुबह किसान परिवार खेतों में पसीना बहा रहे हैं। इन्हीं में से एक परिवार है दीनापुर के त्रिलोक राजभर का। हादसे में त्रिलोकी ने अपने पैर गंवा दिए। मालाएं बेचकर लौटते वक्त उन्हें मिर्गी आई, सड़क पर गिरे और अज्ञात वाहन उनके पैर को रौंदकर भाग गया। होश में आए तो उनका एक पैर कट चुका था। तब से अब तक उनकी बेटियां उनका सहारा बनी हुई हैं। आइए जानते हैं आगे की कहानी...

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Daughters come help father farming in varanasi leg cut road accident story is inspiring
घर में फूलों की मालाएं बनातीं त्रिलोकी राजभर की बेटी सावित्री। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जिला मुख्यालय से करीब सात किलोमीटर दूर स्थित दीनापुर गांव की खुशबू पूरे पूर्वांचल और बिहार तक फैल चुकी है। यहां के फूल न सिर्फ मंदिरों की शोभा बढ़ा रहे हैं, बल्कि सैकड़ों परिवारों का पेट भी भर रहे हैं।

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वाराणसी के मुख्यालय से कुछ दूर, कच्ची पगडंडियों से गुजरते हुए जब आप दीनापुर गांव के करीब पहुंचते हैं, तो हवा में फूलों की भीनी खुशबू आपका स्वागत करती है। 
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यह गांव अपनी फूलों की खेती के लिए जाना जाता है, और यहां के मेहनतकश किसान अपने खेतों को बगिया में तब्दील कर चुके हैं। जहां आमतौर पर इस इलाके के गांवों में धान और गेहूं की खेती होती है, वहीं दीनापुर के खेतों में गेंदा, गुलाब, गुड़हल और कुंद जैसे फूल लहलहाते दिखते हैं।

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खेतों में लगे गेंदे और कुंद के फूल। - फोटो : अमर उजाला

होने लगा दोगुना फायदा 
दीनापुर में करीब तीन सौ परिवार इस गांव में फूलों की खेती से जुड़े हैं। फूलों के खेतों में काम कर रहे चमरू बताते हैं कि फूलों की खेती से उनकी जिंदगी में एक बड़ा बदलाव आया है। चमरू, जो पहले धान की खेती किया करते थे, बताते हैं, 'धान से बमुश्किल कुछ हजार रुपये का मुनाफा होता था, लेकिन जब से हमने फूलों की खेती शुरू की है, तब से दोगुना फायदा हो रहा है।'

दीनापुर के आसपास के गांव जैसे धन्नीपुर में भी अब फूलों की खेती की जा रही है, जिससे किसानों को ज्यादा मुनाफा मिल रहा है। यहां रोज़ाना लगभग डेढ़ लाख रुपये का कारोबार होता है। फूलों से सजी मंडियां मलदहिया और बांसफाटक से पूर्वांचल और बिहार के विभिन्न हिस्सों में फूल सप्लाई किए जाते हैं।



त्योहारों और शादी-विवाह के सीजन में इन फूलों की मांग कई गुना बढ़ जाती है। दीनापुर के किसान त्रिलोकी राजभर इस बात का जीता-जागता उदाहरण हैं कि किस प्रकार किसानों को मौसम और अन्य चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। त्रिलोकी कई वर्षों से खेती कर रहे हैं, लेकिन छह साल पहले एक सड़क हादसे में उनका एक पैर कट गया। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी।

वे बताते हैं, 'मैं धूप, गर्मी, बरसात, कड़कती ठंड, सब कुछ खेतों में झेल चुका हूं। ये हादसा भी मेरे लिए कोई बड़ी चीज़ नहीं है।' त्रिलोकी की यह कहानी अकेले उनकी नहीं, बल्कि उन हजारों किसानों की है, जो हर मुश्किल के बावजूद अपने खेतों में दिन-रात मेहनत करते हैं।

पिता का साथ देने मायके से आती हैं बेटियां
त्रिलोकी ने दो साल पहले अपनी पत्नी को भी खो दिया, लेकिन अब उनकी बेटियां उनका साथ दे रही हैं। उनकी बड़ी बेटी सावित्री हर सीजन में अपने पिता की खेती संभालने मायके से आती हैं और फूलों की बिक्री में मदद करती हैं।



सावित्री कहती हैं, 'समय पहले जैसा नहीं रह गया है। अब हम किसानों को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन मुनाफा बिचौलियों के हाथों में चला जाता है।' उनका यह अनुभव दिखाता है कि खेती के साथ-साथ विपणन के क्षेत्र में भी सुधार की जरूरत है, ताकि किसानों को उनकी मेहनत का सही लाभ मिल सके। 

इस गांव में बुनियादी सुविधाओं की कमी है। पक्की सड़कें नहीं हैं और सरकार की ओर से कोई विशेष मदद नहीं मिलती। इसके बावजूद, गांव के लोग अपने हौसले और मेहनत के बल पर खुशहाली की नई इबारत लिख रहे हैं।

बच्चों को शिक्षित भी करना है जरूरी
सुनीता राजभर, जो फूलों की खेती में अपने परिवार का साथ देती हैं, कहती हैं, 'मेहनत बहुत है। पौधों की देखभाल से लेकर फूल तोड़कर माला बनाना और फिर मंडी तक पहुंचाना, हर कदम पर ध्यान देना पड़ता है। लेकिन हमें इससे संतोष है कि हम अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दे पा रहे हैं।'

किसान अनिल, जो पिछले तीस सालों से फूलों की खेती कर रहे हैं, वे बताते हैं, 'पहले गांव में सिर्फ कुछ ही लोग फूलों की खेती करते थे, लेकिन अब हमारा गांव ही नहीं, आसपास के कई गांव भी फूलों की खेती में जुट गए हैं।'

यहां गेंदे के पीले-नारंगी फूल, गुलाब की लाल पंखुड़ियां और गुड़हल की झाड़ियां दूर-दूर तक फैली नजर आती हैं। यह गांव वास्तव में एक विशाल बगिया की तरह दिखता है, जहां हर कोना खुशबू से भरा है।

दीपावली के त्योहार को ध्यान में रखते हुए लगभग तीन महीने पहले से ही किसानों ने गेंदे, कुंद और अन्य फूलों के खेतों में तैयारी शुरू कर दी थी। इन फूलों की मांग दीपावली पर मंदिरों में सजावट और पूजा-अर्चना के लिए काफी बढ़ जाती है। काशी मंदिरों का शहर है, और यहां फूलों की खपत मालाओं के रूप में अधिक होती है।

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बुजुर्ग हो गई हैं लेकिन करती हैं खेती। - फोटो : अमर उजाला

बोले अधिकारी
जिला उद्यान अधिकारी सुभाष कुमार के अनुसार, वाराणसी जिले की करीब 200 एकड़ (800 बीघा) जमीन पर केवल फूलों की खेती होती है। इसमें गेंदा, गुलाब और गुड़हल प्रमुख रूप से उगाए जाते हैं। खासकर गेंदे की खेती सबसे ज्यादा होती है, क्योंकि इसकी मालाएं मंदिरों, घरों और व्यापारिक स्थानों में दीपावली के समय सजावट के लिए खूब इस्तेमाल होती हैं।

गांवों में फूलों की खेती की स्थिति सिर्फ दीनापुर ही नहीं, चिरईगांव, दीनापुर और लखमीपुर जैसे क्षेत्रों के किसान बड़ी मात्रा में गेंदे की खेती कर रहे हैं। फूलों की बिक्री के लिए मलदहिया और चौक स्थित फूल मंडी प्रमुख केंद्र हैं, जहां आसपास के जिलों से भी किसान अपनी मालाएं बेचने आते हैं।

ये मंडियां दीपावली के समय किसानों के लिए बड़ी बाजार साबित होती हैं, जहां वे अपनी मेहनत का फल बेचकर अच्छी कमाई की उम्मीद करते हैं। हालांकि, इस साल मौसम ने किसानों की उम्मीदों पर थोड़ा पानी फेर दिया है।

जब पड़ती है मौसम की मार
मौसम के बदलते मिजाज और असमय बारिश ने किसानों की फूलों की खेती को थोड़ा नुकसान पहुंचाया है। कई जगहों पर फूल तैयार तो हो गए हैं, लेकिन बारिश की वजह से उनकी गुणवत्ता में गिरावट आई है, जिससे उनकी बाजार में मांग कम हो सकती है।

दीपावली के मौके पर फूलों की मांग बढ़ने से किसानों को एक उम्मीद तो है, लेकिन बिचौलियों की भूमिका और बाजार में फसलों की सही कीमत न मिलना, उनकी कमाई में बड़ी रुकावट बनते हैं। सावित्री की तरह कई किसान इस बात की शिकायत करते हैं कि उनकी मेहनत का असल मुनाफा बिचौलियों की जेब में चला जाता है, जो किसानों से सस्ते दामों में फूल खरीदकर बाजार में ऊंचे दामों पर बेचते हैं।

इस दीपावली, वाराणसी और आसपास के क्षेत्रों के किसानों को अपने फूलों की बिक्री से अच्छी कमाई की उम्मीद है, हालांकि मौसम की मार और बिचौलियों की भूमिका जैसी चुनौतियां अभी भी उनके सामने हैं। किसान त्रिलोकी राजभर और उनकी बेटी सावित्री की कहानी इस बात का प्रतीक है कि किस प्रकार किसान हर चुनौती का सामना करते हुए अपनी मेहनत को जारी रखते हैं।

किसानों को भी रहता है त्योहार को इंतजार
फूलों की खेती से लेकर उसकी बिक्री तक की यह पूरी प्रक्रिया किसानों के लिए एक कठिन यात्रा है, लेकिन हर साल की तरह इस बार भी दीपावली उनके लिए उम्मीदों का एक नया मौका लेकर आई है। गौराकलां, घुघुरीपर गांवों के किसान मनोज, संतोष मौर्य, महेंद्र, चंद्रशेखर, ओम प्रकाश, और नरेंद्र शर्मा का मानना है कि दिवाली के त्योहार में उनकी मेहनत रंग लाएगी।

इन किसानों का कहना है कि नवरात्र में किसानों को उम्मीद थी कि उनकी फूलों की फसल से अच्छी आमदनी होगी, लेकिन खराब मौसम और बाजार में कम मांग के कारण उनकी अपेक्षाएं पूरी नहीं हो पाईं। लेकिन अब दिवाली की तैयारी करते हुए ये किसान खासकर गेंदे के फूलों से अच्छी बिक्री की उम्मीद कर रहे हैं, जो इस त्योहार के दौरान अधिक मात्रा में खरीदे जाते हैं। 

गेंदे की मालाएं घरों और मंदिरों की सजावट के लिए मुख्य रूप से इस्तेमाल होती हैं, जिससे दिवाली पर इनकी मांग चरम पर होती है।
हालांकि, इन किसानों के सामने छुट्टा पशुओं, घड़रोज़ (नीलगाय) और वन सुअरों का आतंक एक बड़ी समस्या बनी हुई है। ये जानवर उनकी फूलों की फसलों को बर्बाद कर देते हैं, जिससे उन्हें भारी नुकसान झेलना पड़ता है।

किसान महेंद्र और चंद्रशेखर का कहना है कि 'छुट्टा पशु और नीलगाय हमारी खेती को चौपट कर रहे हैं। रात को फसल की रखवाली के बावजूद कई बार ये जानवर खेतों में घुस जाते हैं और हमारी मेहनत पर पानी फेर देते हैं।”

गौराकला की 80 वर्षीया चमेली देवी के अलावा आद्या प्रसाद भी इस समस्या से जूझ रहे हैं। वे बताते हैं कि पहले इस तरह के जानवरों का इतना आतंक नहीं था, लेकिन अब उनकी संख्या बढ़ गई है, जिससे खेती करना मुश्किल हो गया है।

घड़रोज और वनसुअरों का भी आतंक
बुजुर्ग चमेली कहती हैं कि सरकार घड़रोज और वनसुअरों के आतंक से निजात दिलाने के लिए सख्त कदम उठाए। ओम प्रकाश और नरेंद्र शर्मा का कहना है, 'हमारी फसलें इन जानवरों की वजह से लगातार बर्बाद हो रही हैं। सरकार को चाहिए कि इस दिशा में ठोस कदम उठाए ताकि हम अपनी खेती को सुरक्षित रख सकें और मेहनत का सही फल प्राप्त कर सकें।' बावजूद इसके, किसानों को इस साल दिवाली के बाजार से बहुत उम्मीदें हैं।

किसान मनोज और संतोष मौर्य का कहना है कि 'अगर मौसम ने साथ दिया और मंडी में मांग बढ़ी, तो इस साल दिवाली पर अच्छी कमाई हो सकती है।' फूलों की खेती पर निर्भर ये किसान जानते हैं कि त्योहारों का मौसम उनके लिए सबसे बड़ा अवसर होता है। लेकिन इसके साथ ही उनकी चुनौतियां भी कम नहीं हैं।

आर्थिक और सामाजिक बदलाव पर भी रहता है जोर
छुट्टा जानवरों और वन्य जीवों से बचाव के लिए सरकार की मदद की जरूरत है, ताकि आने वाले वर्षों में उन्हें ऐसे संकटों का सामना न करना पड़े और वे अपनी खेती को सफल बना सकें। वाराणसी और आसपास के गांवों के फूल उत्पादक किसानों के लिए यह दिवाली उम्मीदों और चुनौतियों का मिश्रण लेकर आई है। जहां एक ओर उन्हें बाजार से अच्छे मुनाफे की उम्मीद है, वहीं दूसरी ओर छुट्टा पशुओं और वन्य जानवरों का आतंक उनकी मेहनत पर भारी पड़ रहा है।

इन किसानों की मांग है कि सरकार जल्द से जल्द इस दिशा में कदम उठाए, ताकि उनकी फसलें सुरक्षित रहें और उनकी मेहनत का उचित मोल मिले। दीनापुर की यह कहानी केवल फूलों की खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गांव मेहनत और समर्पण का एक जीता-जागता उदाहरण है। सरकारी तंत्र की कमी के बावजूद यहां के लोग अपनी मेहनत से एक नई दिशा की ओर बढ़ रहे हैं।

दीनापुर के फूल अब न सिर्फ गांव की बल्कि पूरे पूर्वांचल और बिहार की खुशबूदार पहचान बन चुके हैं। यह गांव दिखाता है कि सही दिशा में मेहनत करने से किस तरह से आर्थिक और सामाजिक बदलाव लाए जा सकते हैं।

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