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रोज बह रहा आठ क्विंटल फूल, चालीस करोड़ लीटर गंदा पानी

Fri, 05 Jun 2015 01:50 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, वाराणसी
अमर उजाला ब्यूरो, वाराणसी Updated Fri, 05 Jun 2015 01:50 AM IST
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Daily swept eight quintals of flowers, four hundred million liters of dirty water
काशी में गंगा प्रदूषण से कराह रही है। हाल ही में नेशनल मिशन फार क्लीन गंगा के निदेशक टीवीएसएन प्रसाद ने नालों को बंद करने और एक बूंद भी गंदा पानी गंगा में न जाने देने की हिदायत दी थी लेकिन हकीकत कुछ और है। अकेले घरेलू और औद्योगिक नालों से 40 करोड़ लीटर गंदा पानी प्रतिदिन गंगा में बहाया जा रहा है। मंदिरों से निकलने वाला करीब आठ कुंतल फूलमाला तो किनारों पर सड़ता ही है, श्मशान घाटों की राख और शव भी धड़ल्ले से गंगा में बहा दिए जा रहे हैं। अगर इस पर अंकुश नहीं लगाया गया तो करोड़ों रुपये खर्च के बाद भी निर्मलीकरण का सपना अधूरा रह जाएगा।
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केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता संभालने के बाद से अब तक गंगा को निर्मल बनाने के लिए मंत्रियों, अफसरों के दौरे के अलावा कुछ भी सतह पर नहीं आ सका है। अलबत्ता अफसरों के निर्देश को ठेंगा दिखाते हुए स्लाटर हाउस, साड़ी रंगाई के कारखानों के अलावा अन्य उद्योगों और घरेलू उपयोग के बाद निकलने वाले गंदा पानी को गंगा में धड़ल्ले से बहाया जा रहा है। राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण (एनजीआरबीए) के सदस्य प्रो. बीडी त्रिपाठी ने गंगा में रोज फैलने वाले प्रदूषण का जो आंकड़ा प्रस्तुत किया है, वह बेहद चिंताजनक है।
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प्रो. त्रिपाठी बताते हैं कि प्रतिदिन 30 करोड़ लीटर से अधिक घरेलू और 10 करोड़ लीटर से अधिक औद्योगिक डिस्चार्ज गंगा में सीधे जा रहा है। अस्सी से राज घाट के बीच गंगा के किनारों पर आठ कुंतल से अधिक फूलमाला भी प्रतिदिन फेंका जा रहा है। इसमें कुछ तो छाना जाता है लेकिन अधिकतर सड़ता रहता है। मणिकर्णिका घाट, हरिश्चंद्र घाट पर प्रतिदिन सौ से अधिक शवों के अंतिम संस्कार में 900 मन से अधिक लकड़ी जलाई जाती है और इसकी राख भी गंगा में ही बहा दी जा रही है। इसमें रोक के बावजूद जानवरों और मनुष्यों के लावारिस शवों को भी बहा दिया जा रहा है।
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