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झूला लागल कदम की डारी, झूले कृष्ण मुरारी...
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वाराणसी। बरसात जब आती है तो उसके साथ प्रकृति का संगीत भी धरती पर बरसता है। बारिश की बूंदों का संगीत पूरी प्रकृति को अपनी मधुरता से सिक्त कर देता है। तप्त हृदयों में बरखा केसंगीत की हिलोरें उठने लगती है। मन मयूर हो उठता है और हर ताल पर नाच उठने का मन करता है। विरह और प्रेम की ज्वाला भी बरसात में मन को भावन लगती है। चेतना राग विहाग में रचित कजरी गुनगुनाती हैं कि झूला लागल कदम की डारी, झूले कृष्ण मुरारी ना। राधा झूले, कान्हा झुलावे कान्हा झूले, राधा झुलावे...।
कदंब केपेड़ पर झूला डाल दिया गया है। गांव की सोंधी-सोंधी माटी में सभी गोपियां और स्वयं राधा जी अपने कृष्ण की बाट जोह रही हैं। वह इस मनभावन बरखा ऋ तु में अपने प्रियतम के साथ नृत्य के लिए मगन हो रही हैं। वह आगे राग जयजयवंती में गुनगाती हैं कि सखिया श्याम नहीं घर आए, बरखा बरसन लागे ना, बादल गरजे, बिजुरी चमके, जियरा धड़के ना। प्रियतम के इंतजार की भी एक सीमा होती है ना। भला कब तक राधा रानी बाट जोहती रहे। सोने के थाल में परोसे गए व्यंजन सब कुछ भीग गया। कुछ बरसात की बूंदों से तो कुछ नयनों से टपकते विरह के मोतियों से। बूंदों की रिमझिम में संगीत का सरगम होता है। इस मौसम में हवा बादल, पेड़, पपीहे सब झूमते-गाते हुए से लगते हैं। यह उल्लास, लोककंठ से बारहमासी, कजरी, झूलागीतों के रूपों में फूटता है। मेघ-मल्हार का आदि राग कवि हृदय में भी गीत के रूप में उतरता है।
ग्वालियर घराने से हुई है संगीत की शिक्षा
चेतना नागर मूलत: बनारस की रहने वाली हैं। संगीत की शिक्षा ग्वालियर घराने की डॉ. सीमा वर्मा से हुई है। वर्तमान में अग्रसेन कन्या पीजी कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। संगीत के शिक्षण के साथ ही मंच पर आयोजनों में भी लगातार हिस्सा लेती हैं।
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कदंब केपेड़ पर झूला डाल दिया गया है। गांव की सोंधी-सोंधी माटी में सभी गोपियां और स्वयं राधा जी अपने कृष्ण की बाट जोह रही हैं। वह इस मनभावन बरखा ऋ तु में अपने प्रियतम के साथ नृत्य के लिए मगन हो रही हैं। वह आगे राग जयजयवंती में गुनगाती हैं कि सखिया श्याम नहीं घर आए, बरखा बरसन लागे ना, बादल गरजे, बिजुरी चमके, जियरा धड़के ना। प्रियतम के इंतजार की भी एक सीमा होती है ना। भला कब तक राधा रानी बाट जोहती रहे। सोने के थाल में परोसे गए व्यंजन सब कुछ भीग गया। कुछ बरसात की बूंदों से तो कुछ नयनों से टपकते विरह के मोतियों से। बूंदों की रिमझिम में संगीत का सरगम होता है। इस मौसम में हवा बादल, पेड़, पपीहे सब झूमते-गाते हुए से लगते हैं। यह उल्लास, लोककंठ से बारहमासी, कजरी, झूलागीतों के रूपों में फूटता है। मेघ-मल्हार का आदि राग कवि हृदय में भी गीत के रूप में उतरता है।
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ग्वालियर घराने से हुई है संगीत की शिक्षा
चेतना नागर मूलत: बनारस की रहने वाली हैं। संगीत की शिक्षा ग्वालियर घराने की डॉ. सीमा वर्मा से हुई है। वर्तमान में अग्रसेन कन्या पीजी कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। संगीत के शिक्षण के साथ ही मंच पर आयोजनों में भी लगातार हिस्सा लेती हैं।
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